सोमवार, 24 नवंबर 2014

नारीवादी आलोचना: अर्थ और विकास - प्रियंका शर्मा

नारीवादी आलोचना: अर्थ और विकास - प्रियंका शर्मा

नारीवादी आलोचना: अर्थ और विकास
-          प्रियंका शर्मा

पुरुषसत्तात्मक समाज व्यवस्था में स्त्रीत्वऔर पुरुषत्वकी इन विशेषताओं का प्रयोग ही किसी चरित्र को लैंगिक स्तरीकरण सहित महिला अथवा पुरुष बनाता है जिसमें महिला अधीन और पुरुष वर्चस्व की स्थिति में रहता है। ऐसे साहित्य में महिलाओं के अनुभवों और सोच को अभिव्यक्ति नहीं मिलती। और महिला लगातार अधीनता का शिकार होती रहती है। इसलिए महिलाओं के प्रतिनिधित्व को पितृसत्तात्मक मूल्यों से संघर्ष कर के मुक्त होना होगा। आगे, नारीवादियों ने साहित्य आलोचना को स्त्री केंद्रित’ (Gyno Criticism) आलोचना बनाने की बात कही।







लोचना और रचना के अंतरसंबंध और उनके बीच के दायित्वों को लेकर चली बहस में मार्क्सवादी आलोचक टेरी ईगलटन ने अपनी किताब ‘Function of Criticism’ में लिखा था है कि अब तक का साहित्य एक वर्ग केंद्रित साहित्य रहा है। और इसमें सामान्य जन के लिए जगह नहीं है। इसलिए आलोचना का दायित्व साहित्य में जनता के लिए जगह बनाना है। और उनके अनुभवों को साहित्य में अभिव्यक्ति देने को लेकर सवाल करना है। कुल मिलाकर टेरी ईगलटन का कहना है कि आलोचना का दायित्व साहित्य को बुर्जुआ वर्ग के दायरे से निकालकर सर्वहारा जनता के दायरे तक लाना है। लेकिन इस पुरुषवादी व्यवस्था के पूरे नजरिए में जनता की जो छवि थी, वह पुरुष द्वारा संचालित समाज की थी। इसलिए, जनता के दायरे में आने के बावजूद साहित्य में महिलाओं की भागीदारी और अभिव्यक्ति छूट गई और साहित्य के केंद्र में पुरुष बना रहा। पुरुषवादी व्यवस्था के साहित्य की पुरुष केंद्रीयता को दूसरी लहर के नारीवादियों ने प्रश्नांकित किया। और इसमें महिलाओं की भागीदारी का आग्रह किया।  
       70 के दशक में आयी नारीवाद की दूसरी लहर में, अभी तक के चले आ रहे हर तरह के साहित्य लेखन पर नारीवादियों ने इस पूरे लेखन में से महिला के गायब होने और पुरुष द्वारा रचे गए साहित्य में दिखाई गई महिला छवि को लेकर सवाल उठाए। इस लहर में केट मिलेट ने एक किताब ‘Sexual Politics’ में अब तक के शास्त्रीय लेखन में पुरुषों द्वारा गढ़ी गई स्त्री छवि को नारीवादी नजरिए से उजागर किया। इस अध्ययन में केट मिलेट ने लिंगों के बीच के शक्ति संबंध और इनकी राजनीति को दिखाया और इन शास्त्रीय पुरुष लेखकों की कड़ी आलोचना की। इस अध्ययन ने साहित्य जगत में अब तक वर्चस्व की स्थिति में चली आ रही साहित्यिक आलोचना विशेषकर अमेरिका की नई आलोचना पर भी विरोध जताया। इसके प्रभाव ने आगे की नारीवादी आलोचकों को एक रास्ता दिया।[1]
शुरुआत में, नारीवादियों द्वारा पुरुष केंद्रित साहित्य की नारीवादी आलोचना से यह बात सामने आई कि महिलाओं को मुख्य धारा में शामिल करने के लिए मुख्य धारा के साहित्य में महिला लेखन को शामिल करना होगा। इसके साथ ही यह भी माना गया कि महिला लेखन जरूरी तौर पर नारीवादी ही होगा। लेकिन महिला लेखन के आँकलन में यह बात सामने आई कि प्रत्येक महिला द्वारा लिखे गए साहित्य को नारीवादी साहित्य नहीं माना जा सकता।
सन्‌ 1986 में Toril Moi ने अपने निबंध ‘Feminist Literary Theory’ में साहित्य और महिला लेखन को रेखांकित करते हुए कहा कि हर एक महिला का लेखन नारीवादी लेखन नहीं कहा जा सकता। उन्होंने साहित्य में महिला, स्त्रीत्व और नारीवाद को लेकर एक नजरिया प्रस्तुत किया। और कहा कि नारीवादी लेखन वह है, जिसे पितृसत्ता विरोधी और यौनिक स्थिति के विरोधी के रूप में पहचाना जा सके।[2] लेकिन मैरी वॉल्सनक्राफ्ट या वर्जीनिया वुल्फ जैसी महिलाओं के लेखन को ध्यान में रखते हुए यह संभावना भी जताई गई कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के द्वारा लिखे गए साहित्य में नारीवाद के अवयव ज्यादा हो सकते हैं।
इसीलिए केट मिलेट के बाद की नारीवादियों ने उनके अध्ययन की कमी को रेखांकित किया और कहा कि सारे पुरुषों का लेखन हर तरह से स्त्री विरोधी नहीं होता। यानि कि अब यह माना गया कि नारीवादी लेखन के लिए व्यक्ति का स्त्री या पुरुष होना मायने नहीं रखता। बल्कि नारीवादी लेखन या आलोचना के लिए पितृसत्तात्मक व्यवस्था प्रदत्त पुरुषवादी वर्चस्व की अवधारणा को रेखांकित करना और इसके अंदर गढ़ी जाने वाली महिला और पुरुष की स्त्रीत्व और पुरुषत्व छवि की पड़ताल करना है। ताकि अब तक महिला के अधीनीकरण को समझा जा सके और महिलाओं के अनुभवों और अभिव्यक्तियों को मुख्यधारा में शामिल कर समता आधारित समाज की तरफ बढ़ा जा सके।  
 इसलिए नारीवादियों ने पुरुषवादी व्यवस्था द्वारा दी गई महिला और पुरुष की विशेषताओं को भी चिह्नित किया। ‘Thinking about Women’ (1968) किताब में Mary Ellmann ने स्त्रीत्व की परंपरागत विशेषताओं को सूचीबद्ध किया है, कि सामान्यत: महिलाओं को निष्क्रियता, अस्थायित्व, असमरूप, दया, मातृत्व, धोखेबाज, आध्यात्मिक, सम्मति/स्वीकृति, अतार्किकता, और दो अशुभ रूपों - डायन और झगड़ालू के रूप में भी देखा जाता है।[3]
इसी तरह Helen Cixouc अपनी किताब ‘The newly born Women’ (1986) में लिखती हैं कि द्विगणीतीय जोड़े में स्त्रीत्व को निष्क्रिय, चाँद, प्रकृति, रात, माँ, भावनात्मक, संवेदनशील, करुण समझा जाता है। पितृसत्तात्मक सोच में महिला और स्त्रीत्व के बीच में एक ऐसी कड़ी है जिस पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया गया है। स्त्रीत्व महिला की प्राकृतिक विशेषता के रूप में देखा जाता है और पुरुष के साथ जुड़ने वाली पुरुषत्व विशेषताओं से कमतर आँका जाता है।[4] महिला और पुरुष की इन तुलनाओं के विरोधाभास में पितृसत्तात्मक व्यवस्था के मूल्यों को, प्रत्येक विरोधी जोड़े को स्तरीकृत करके विश्लेषित किया जा सकता है, जहाँ स्त्रीत्व को हमेशा नकारात्मक और कमजोर के रूप में देखा जाता है।[5] सामान्यत: ये गुण और विशेषताएँ एक युद्धक्षेत्र सी बन जाती हैं, जहाँ सर्वोच्चता को हमेशा ही संकेतित किया जाता है। और अंत में, जीत सक्रियता के साथ होती है और निष्क्रियता हारती है, पितृसत्ता में पुरुष हमेशा विजयी होता है।[6]
स्त्रीत्व को इन विशेषताओं से जोड़े जाने के कारण, पितृसत्ता द्वारा महिलाओं को दमित और उत्पीड़ित होना पड़ता है। इसकी जबाबदेही पर नारीवाद स्त्रीत्व की इन विशेषताओं को और स्थिति को नकारता है और मानता है कि महिला भी पुरुष की तरह ही योग्य है, समान अवसर के लायक है। वह महिला की भावुकता और संवेदनशीलता को समाज प्रदत्त जीवनगत देन मानता है।[7] पितृसत्ता को चुनौती के रूप में ही सिमोन द बोउआर जैसी नारीवादियों ने औरत पैदा नहीं होती, बना दी जाती है का नारा दिया।
नारीवाद कीदूसरी लहर के उदय के साथ ही नारीवादी आलोचकों ने पितृसत्तात्मक व्यवस्था के साहित्य लेखन को पुरुषवादी घोषित किया। Mary Ellmann ने कहा कि पुराने साहित्य लेखन में सत्तात्मक रुख को पुरुष से ज्यादा जोड़ा गया है, और महिला को संवेदना की अभिव्यक्ति के साथ जोड़ा गया है, इसलिए इसे पुरुषवादी माना जाना चाहिए।[8]
पुरुषसत्तात्मक समाज व्यवस्था में स्त्रीत्व और पुरुषत्व की इन विशेषताओं का प्रयोग ही किसी चरित्र को लैंगिक स्तरीकरण सहित महिला अथवा पुरुष बनाता है जिसमें महिला अधीन और पुरुष वर्चस्व की स्थिति में रहता है। ऐसे साहित्य में महिलाओं के अनुभवों और सोच को अभिव्यक्ति नहीं मिलती। और महिला लगातार अधीनता का शिकार होती रहती है। इसलिए महिलाओं के प्रतिनिधित्व को पितृसत्तात्मक मूल्यों से संघर्ष कर के मुक्त होना होगा। आगे, नारीवादियों ने साहित्य आलोचना को स्त्री केंद्रित (Gyno Criticism) आलोचना बनाने की बात कही।
टॉरिल मोई का महिला, स्त्रीत्व और नारीवादका समीकरण यहीं पर उपयोगी है, यह पितृसत्ता और यौनिकता विरोधी स्थिति को बनाने में, हाशिये के (दमित और मौन) लोगों की आवाज बन कर उनका नेतृत्व करता है। स्त्रीत्व और पुरुषत्व के बीच स्तरीकरण में नस्ल’, ‘वर्ग’, जाति और यौनिकता भी हमेशा अंतर्गुथित रहते हैं।[9] और निर्णायक की भूमिका निभाते हैं। महिलाओं के लिए पुरुषसत्तात्मक समाज व्यवस्था द्वारा बनाई गई इन्हीं विशेषताओं की आलोचना और अतिक्रमण करने के उद्देश्य से नारीवादी आलोचना से साहित्य को परिचित कराया गया।
1960 के अंत और 70 के दशक से नारीवादी साहित्यिक आलोचना के लिए महिला और पुरुष दोनों ही मुद्दे अपर्याप्त थे, वास्तव में पुरुष के पाठ में स्त्री के प्रतिनिधित्व में स्त्री द्वेष था। लेकिन नारीवादी साहित्यिक आलोचना की प्रेरणा आश्चर्यजनक रूप से मजबूत हुई। इनकी मुख्य चिंता पुरुष लेखक नहीं थे, बल्कि साहित्य में दिखाई गई वह महिला थी जो अक्सर यहाँ खोई, चुपचुप, छिपी-सी, पुरुष वर्चस्व को स्थापित करती दरबान-सी चित्रित की जाती थी।[10] वर्जीनिया वुल्फ के ‘अपना कमरा’ के बाद लगभग आधी सदी तक जगह खाली रही, जिसमें महिला लेखन ढूढ़ने की जरूरत है।
इसप्रकार नारीवादी आलोचकों ने अभी तक  के मुख्य धारा के साहित्य की पड़ताल करते हुए कहा कि अभी तक पुरुषों ने साहित्य में महिलाओं के लिए दरबानी का काम किया है। और उन्हें साहित्य में जगह लेने से रोके रखा है। पुरुषों के वर्चस्व को देखते हुए साहित्य में महिलाओं की असमान भागीदारी और प्रतिनिधित्व अब प्रतिकार कर रहा है।[11]
       साहित्य में महिलाओं की भागीदारी और प्रतिनिधित्व को लेकर भी बाद के नारीवादी आलोचकों ने यह माना कि यह प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण नहीं है। बल्कि महत्वपूर्ण यह जानना हैकि यह प्रतिनिधित्व किस रूप में किसके द्वारा महिला को दिया गया -
नारीवादी आलोचकों के लिए मुख्य सवाल यह नहीं है कि किसने प्रतिनिधित्व पाया, बल्कि सवाल यह है कि किसके द्वारा किसने प्रतिनिधित्व पाया, कैसे पाया, किन विमर्शों और शक्ति विभाजन के बीच और किस परिणाम के साथ पाया।[12] साहित्यिक नारीवादी आलोचना का उदय इसी पड़ताल का परिणाम रहा। नारीवादियों का उद्देश्य इसके जरिए साहित्य में महिलाओं के प्रतिनिधित्व, उनका चित्रण, और उस चित्रित महिला छवि के विमर्शों को खंगालना और उनकी पड़ताल करना है। कि इस साहित्य लेखन ने अब तक महिलाओं को पुरुषसत्ता के अधीन बनाए रखने में कैसे और क्या काम किया। पुराने पुरुषवादी साहित्य में चित्रित की गई महिला की निष्क्रिय, कामुक, अस्थायी और अनुकरणशील छवि के पीछे काम कर विचारों की पड़ताल करना साहित्यिक नारीवादी आलोचना का प्रमुख उद्देश्य रहा है।
अब तक साहित्यिक विचारकों और चिंतकों ने साहित्य और कला से कला समाज के लिए के विचार तले सामाजिक गतिविधियों में प्रगतिशील तत्वों का साथ देने का आग्रह किया है। भारत में भी हिंदी आलोचक शुरुआत से रचना को समाज के प्रगतिशील तत्वों की सहयोगी बनाने की मुहिम चलाते आये हैं। लेकिन समाज को समझने का उनका दृष्टिकोण पितृसत्तात्मक होने के कारण, महिलाओं की भागीदारी और प्रतिनिधित्व साहित्य की आलोचना में नहीं रहा।
संपर्क - प्रियंका शर्मा, परफॉर्मिंग आर्ट्स विभाग, पांडिचेरी विश्विद्यालय, पांडिचेरी,




[1] Toril Moi, Sexual/Texual Politicts, Routledge, 2002, page no. 24
[2] Edi. By Mary Eagleton, ‘A concise Companion to Feminist Theory’, Wiley-Blackwell, June 2003, page no. 153
[3] Edi. By Mary Eagleton, ‘A concise Companion to Feminist Theory’, Wiley-Blackwell, June 2003, page no.155
[4] Ibid, page no. 155
[5] Toril Moi, Sexual/Texual Politicts, Routledge, 2002, page no.102
[6] Ibid, page no. 104
[7] Edi. By Mary Eagleton, ‘A concise Companion to Feminist Theory’, Wiley-Blackwell, June 2003, page no.155
[8] Ibid, page no. 156
[9] Edi. By Mary Eagleton, ‘A concise Companion to Feminist Theory’, Wiley-Blackwell, June 2003, page. No.156
[10] Ibid, page no. 157
[11] Edi. By Mary Eagleton, ‘A concise Companion to Feminist Theory’, Wiley-Blackwell, June 2003, page no. 170
[12] Ibid,, page no. 170


मूक आवाज़ हिंदी र्नल
अंक-7 (जुलाई-सितंबर 2014)                                                                         ISSN   2320 – 835X
Website: https://sites-google-com/site/mookaawazhindijournal/
 

साम्प्रदायिकता का प्रतिरोध करती नमिता सिंह की कहानियाँ - डॉ. धर्मेन्द्र प्रताप सिंह



            ज स्त्री विमर्श के रूप में महिला रचनाकार जिस रूप में अपनी आत्माभिव्यक्ति कर रहीं हैं, नमिता सिंह ने उससे अलग हट कर देश की बुनियादी समस्याओं को अपनी कहानियों का विषय बनाया है। इसका आशय यह कदापि नहीं है कि स्त्री के मुद्दों से उन्होंने स्वयं को अलग कर लिया है। उनके लेखन में स्त्रियों की बुनियादी समस्याएँ, जैसे निरंतर हो रहे मजदूरों का शोषण और मजदूर आंदोलनों को कमजोर करते उनके अपने ही लोग, हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य के मूल कारणों की गहन पड़ताल आदि सभी कलात्मक ढ़ंग से मिलते हैं। राजा का चौकसंग्रह की सम्पूर्ण कहानियाँ साम्प्रदायिक दंगों में जलते शहर, कराहती मानवता और मजदूर वर्ग की समस्याओं को बड़े ही बेबाक अंदाज में बयाँ करती हैं। पूँजीपति मजदूरों को आपस में लड़ाकर किस प्रकार अपना उल्लू सीधा करते हैं, यह भी देखने को मिलता है। इस संग्रह में राजा का चौक’, ‘समाधान’, ‘बसंती काकी’, ‘यह नहीं’, ‘सैलाब’, ‘क्रासिंग’, ‘रक्षकऔर अपने लोगकहानियाँ संकलित हैं। राजा का चौकमें नमिता जी ने दिखाया है कि किस प्रकार भोले-भाले मजदूरों को आपस में लड़ाकर उसे दंगे के रूप में प्रचारित कर अत्यंत भयानक शक्ल में बदल दिया जाता है। कहानी के पात्र छोटका और बड़का इसी के उदाहरण हैं। छोटका नौकरी के लिए बच्चू खाँ बन जाता है और होटल की चैकीदारी में बड़का के हाथों मारा जाता है। दुर्गासरन इसे साम्प्रदायिक दंगा कहकर पूरा फायदा उठाने का प्रयास करता है और सफल भी होता है। कहानी के मूल में यह है कि पूँजीपतियों के स्वार्थों के समक्ष गरीब हमेशा से सताया और मारा जाता रहा है।
            समाधानकहानी मजदूरों की संघर्षरत जीवन शैली को प्रस्तुत करने वाली है। मजदूर अपनी जायज मांगों को लेकर हड़ताल करते हैं लेकिन स्वार्थी मजदूर नेता कालीचरण सेठ से मिलकर पूरे आंदोलन की दिशा ही मोड़ देता हैं। अल्लाबक्श और उसके मजदूर साथी एक ऐसे अस्पताल की माँग सेठ के समक्ष रखते हैं जिससे मजदूरों का अच्छा इलाज और उनकी जीवन शैली में सुधार हो सके- ‘‘हम बेहतर हालात चाहते हैं। हमारे मालिक बहुत बड़े सेठ लोग हैं। हजारों रूपये दान देते हैं, लाखों का चंदा देते हैं सरकार को। एक साल की ही चंदा रोक दें। उससे अच्छा-बड़ा हस्पताल बन जायेगा। लेकिन नहीं। इससे क्या फायदा होगा? मजदूर बिना इलाज के मर जायेगा तो दूसरा मजदूर आ जायेगा बल्कि और सस्ता मिलेगा।’’(राजा का चौक, पृष्ठ-30) मजदूरों की इस जायज माँग के आगे सेठ अपनी चाल चलता है। सेठ के कहने पर कालीचरण अस्पताल की जगह एक मंदिर की माँग रख देता है और अनपढ़-भोले मजदूर धर्म के नाम पर दो भागों फाड़ में बँट जाते हैं। अस्पाताल की माँग पीछे रह जाती है और उसकी जगह मंदिर बनाने का निर्णय लिया जाता है। मजदूरों की स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी समस्या जस-की-तस बनी रह जाती है।
            आज के समय में निरंतर ह्रास होती मानवीय संवेदना, टूटते-बिखरते परिवार, स्वार्थी बेटों के द्वारा बुजुर्गों की दुर्दशा आदि सभी विषयों को बसंती काकीके माध्यम से उठाया गया है जो निरंतर अपने बेटे की प्रताड़ना का शिकार होती है। इस कहानी में स्त्री जीवन के मर्म को उद्घाटित किया गया है। समय के साथ-साथ माँ, बाप और बेटे के रिश्तों में स्वार्थपन आ जाता है, इसका रेखांकन उक्त कहानी में किया गया है। वीरपाल अपने माँ और बाप को शहर यह कहते हुए बुला लेता है कि गाँव में क्या रखा है? जरूरत पड़ी तो जमीन बेच देगें। उसके यह कहने पर माँ-बाप दोनों शहर में आकर रहने लगते हैं लेकिन समय के साथ वीरपाल का मन भी बदल जाता है। उम्र बढ़ने के साथ ही पिता जी बीमार रहने लगते हैं और उनकी दवा का खर्च बढ़ने पर माँ को अकेले ही खेती करवाने के लिए गाँव भिजवा देता है। उसकी माँ का मन गाँव मे इसलिए नहीं लगता क्योंकि शहर में बेटे वीरपाल के पास उसका पति सदैव ही बीमार बिस्तर पर पड़ा रहता है। ऐसे दंपति जो जीवन भर साथ रहते हैं और एक बेटे को जन्म देकर न जाने कितने कष्ट उठाते हुए उनकी परवरिश के साथ-साथ पढ़ाते-लिखाते हैं, वही बेटा बड़ा होने पर स्वार्थ के वशीभूत होकर उन्हें अलग कर देता है। वीरपाल उन बच्चों का प्रतीक है जो अपने स्वार्थ के लिए अपने माँ-बाप की भावनाओं को नहीं समझते और उन्हें मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना देते हैं।
            यह नहींके माध्यम नमिता जी ने यह बताने का प्रयास किया है कि शोषक की न तो कोई जाति होती है और न ही कोई धर्म। हाजी साहब अपने ही धर्म के शकूर को मजदूरी के पश्चात् मेहनताना नहीं देते जबकि काम देते समय धर्म के नाम पर ही उसे काम पर रखते हैं। शंकर की हत्या एक हिंदू द्वारा भरे बाजार में सबके सामने कर दी जाती है और उसे जबरन मुस्लिम घोषित कर शहर में दंगा भड़का दिया जाता है। शंकर से सब डरते हैं और धर्म के नाम पर इस कुख्यात अपराधी का साथ भी देते हैं। पूरा शहर एक गलत अफवाह से दहक उठता है और सभी धर्म के नाम पर अपनी मूक सहमति प्रदान करते हैं। शहर में जब भी दंगा भड़कता है तो लोग भले-से-भले आदमी को भी शंका की दृष्टि से देखना शुरू कर देते हैं। कहानी का नायक रिक्शा चालक शकूर भी इसी का शिकार होता है जिसकी दंगों के दिनों में रोजी-रोटी तक बंद हो जाती है। बबली की माँ इसलिए अपनी बच्ची को उसके साथ नहीं भेजती क्योंकि वह मुसलमान है। कारखाने में काम करने वाला बशीरा भी काम पर जाना सिर्फ इसलिए बंद कर देता है क्योंकि कारखाने में ज्यादातर हिंदू मजदूर काम करते हैं। स्त्रियाँ हमेशा ही उत्पीड़न और हिंसा का शिकार होती रही हैं। नमिता जी इस मुद्दे से भली-भाँति परिचित हैं और कहानी के माध्यम से इसे स्वर प्रदान करती हैं। रज्जों उनके द्वारा गढ़ा गया ऐसा ही स्त्री चरित्र है जो अपना एक छोटा सा घर चाहती है जिसमें पति नाम के देवता का वास हो। उसका बचपन बहुत ही डरावना था क्योंकि उसका सौतेला शराबी बाप उसकी जब चाहे तब पिटाई कर देता था और माँ भी बात-बात पर गालियाँ दिया करती थी। शकूरा ही उसे इस नरक से निकालकर बाहर लाता है।
            सैलाबमजदूरों की दिनचर्या की सशक्त अभिव्यक्ति है। गज्जू दादा कहानी के मुख्य और सोमनाथ सहायक पात्र हैं। कहानी में दैनिक यात्रियों को होने वाली असुविधाओं एवं मजदूरों की समस्याओं को उठाया गया है। काम की तलाश में वे घर से दूर जाते हैं और एकता का अभाव होने के कारण पूँजीपतियों द्वारा उनका निरंतर शोषण होता है। सोमनाथ उन्हें संगठित होने का गुरुमंत्र देता है। जीवन यापन के लिए युवा मजदूर दैनिक मजदूरी की तलाश में बिना टिकट ही ट्रेनों के आरक्षित डिब्बे में सवार होकर शहर जाते हैं और शाम को वापस लौटते हैं। यात्री इन मजदूरों को घृणा और तिरस्कार भरी नजरों से देखते हैं। नमिता जी ने उनके सैलाब पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि- ‘‘वे लड़के उस समय सबकी नजरों में बहुत खतरनाक जीव थे। जितनी जल्दी उतर जायें उतना ही अच्छा हो- सब यही मान रहे थे।’’( राजा का चौक, पृ0-72)  गज्जू दादा और सोमनाथ के माध्यम से कथा को विस्तार दिया गया है। एक दिन गज्जू दादा की एक यात्री से सीट को लेकर बहस हो जाती है और वह अपने साथियों के साथ मिलकर यात्री की जमकर पिटाई कर देता है। इसी दौरान महादेवा मौके का फायदा उठाते हुए यात्रियों की अंगूठी और घडि़याँ छीन लेता है। महादेवा का यह कृत्य यात्रियों के दिल में मजदूरों के प्रति घृणा पैदा करता है।
            क्रासिंगशहर की भाग-दौड़ भरी जीवन-शैली को रेखांकित करने वाली महत्त्वपूर्ण कहानी है। शहर के मध्य पड़ने वाली रेलवे क्रासिंग से स्कूली बच्चे, शिक्षक, मजदूर आदि सभी को दिन में कई बार गुजरना पड़ता है। सुबह स्कूल और ऑफिस जाते समय अक्सर वहाँ कोई न कोई दुर्घटना हो जाती है जिसमें बेगुनाह लोग मारे जाते हैं। क्रासिंग पर पुल न बनने का मुख्य कारण पुल के दायरे में आने वाली अमीरों और पूंजीपतियों की दुकानें हैं। पूंजीपतियों की राजनीतिक पकड़ हर बार पुल बनने के प्रयास पर पानी फेर देती है। दिनोंदिन कमजोर होती मानवीय संवेदना को यह कहानी गहरे से उद्घाटित करती है। ढकेल वाले खान बहादुर की रेलवे ट्रक पर कटकर मौत के पश्चात् अध्यापिका और स्कूली बच्चों के वक्तव्य इस बात की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त है- ‘‘मेरी समझ में नहीं आता, क्यों इन ढकेल वालों को सबसे जल्दी पड़ती है लाइन पार करने की। अरे न दफ्तर जाना है तुम्हें, न कॉलेज। काहे की जल्दी है।... और क्या? खुद लापरवाही करो और फिर सरकार को गालियाँ दो।’’(राजा का चौक, पृ0-85) अमीर घराने की लड़की की मौत के बाद पुल बनने की उम्मीद बनी लेकिन उसी समय शहर में दंगा भड़क जाने के कारण जनता और सरकार का दिमाग वहाँ से हट गया या यह भी हो सकता है कि पुल बनने की माँग से जनता का ध्यान हटाने के लिए शहर में दंगा भड़का दिया गया। कहानी में दिखाया गया है कि अमीरों के स्वार्थ देश की प्रगति में बाधा उत्पन्न करते हैं और सरकार उनके सम्मुख घुटने टेके पड़ी रहती है।
            रक्षककहानी शहर में हो रहे साम्प्रदायिक दंगों की आंतरिक संरचना का प्रभावशाली ढंग से चित्रांकन करती है। इन दंगों का मूल कारण गलत सूचनाएँ और अफवाह है। मास्टर साहब कहानी के मुख्य पात्र हैं या यूं भी कह सकते हैं कि कहानी के मुख्य वक्ता हैं। कर्फ्यू की वजह से नगरवासियों की दैनिक दिनचर्या बुरी तरह से प्रभावित होती है और खाने-पीने की वस्तुओं की कीमत में भारी बढ़ोत्तरी हो जाती है जिससे गरीबों का जीना दूभर हो जाता है। कहानी में कादिर, बदरू और भगत एक व्यापारी की हत्या कर उसके पैसे की थैली छीन ले जाते हैं। इस कृत्य में शहर का पुलिस-प्रशासन भी बराबर का हिस्सेदार है जिसे 50 हजार रूपये देकर मामला शान्त कर दिया जाता है। दंगे में पुलिस द्वारा न ही कोई आरोपी पकड़ा जाता है और न ही किसी को सजा मिलती है। कहानी में स्त्रियों की मूल समस्या को भी नमिता जी ने उठाता है। स्त्री को बच्चा न होने से उसे घर-समाज में तिरस्कृत एवं अपमानित किया जाता है, चाहे कमी पुरुष में ही क्यों न हो। कहानी का यह वक्तव्य इस बात की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त है- ‘‘मेरी सास अपने लड़का की दूसरी शादी करने की बात कह रही हैं। हमने तो सास से कहा कि लड़का तुम्हारा घर में पैर न रखे, बहू का मुंह न देखे तो बच्चा कहाँ से होवेगा? लेकिन तुम जानो अब उसे अपने लड़का की गलती थोड़े ही दिखेगी। सारी कमी बहू में ही दिखेगी। कहे, बहू समझदार होती तो लड़का को बांधकर रख सकती थी।’’(96)
            संग्रह की अन्तिम कहानी अपने लोगशहरों में काम करने वाले मजदूरों की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करती है। दलित आंदोलन को अपने ही दलित नेता किस प्रकार विपक्ष से मिलकर कमजोर कर रहे हैं, इसे नमिता जी ने बड़े ही बेबाकी से उठाया है। शहरी जीवन में आम लोगों को नित-प्रति होने वाली समस्याएँ कहानी के केन्द्र में हैं। कहानी के नामकरण के लिए नमिता जी विशेष रूप से धन्यवाद की पात्र हैं। कहानी का नाम इससे बेहतर हो ही नहीं सकता। पैसे की भूख हर किसी को है। दलित अधिकारी और नेता पैसा लेकर अपने वर्ग के साथ अन्याय करते हैं और उनकी लड़ाई को कमजोर बनाते हैं। गिरधारी बाबू, उमेश, जगतराम आदि पात्रों के माध्यम से अपने लोगकहानी कथ्य की अभिव्यक्ति में पूर्णतः सफल सिद्ध हुई है।
            निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि नमिता सिंह ने राजा का चौककहानी संग्रह में शहरी जीवन का रेशा-रेशा उधेड़ कर रख दिया है। हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य, मजदूर जीवन की समस्या, स्त्री के माँ न बन पाने की पीड़ा और सामाजिक दंश, पुरुषों द्वारा स्त्रियों पर हो रहे अत्याचार आदि सभी राजा का चौककी कहानियों के केन्द्र में हैं और इसी के आधार पर कथा को विस्तार दिया गया है। नमिता सिंह की कहानियाँ पाठकों के अंतर्मन को उद्वेलित करती हुई समाज के सभी वर्ग को एकता के सूत्र में पिरोने का सार्थक प्रयास है।
संपर्क - डॉ. धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, शोध सहायक, हिन्दी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ, मोबाइल-09453476741

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