सोमवार, 24 नवंबर 2014

दलित संवेदना की कविता - विजेंद्र प्रताप



दलित संवेदना की कविता
-       विजेंद्र प्रताप

तेवरी काव्यांदोलन के प्रणेता ऋषभदेव शर्मा की कविताओं में वैसे तो राजनीतिक, समाजिक, धार्मिक, ग्रामीण परिवेश आदि को पर्याप्त अभिव्यक्ति मिली है। इसके साथ ही उनकी कुछ कविताओं में भारतीय समाज को आदिकाल से वर्तमान काल तक प्रभावित करने वाली वर्णभेद व्यवस्था का पुट देखने को भी मिलता है। लेकिन उन्होंने दलित शीर्षक से कोई कविता नहीं लिखी पर उनकी कविताओं में इसकी चेतना अवश्य झलकती है।



(तेवरी कविता के कवि – ऋषभदेव शर्मा)

भारतीय समाज मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित रहा है, एक उच्च वर्ग सवर्णों का और दूसरा निम्नवर्ग दलित, दास और हरिजनों का। यह कटु सत्य है कि दलितों के प्रति भारत के उच्च वर्गीय समाज का व्यवहार अत्यंत अमानवीय और पाशविक रहा है। हरिजनों, चमारों की बस्ती सवर्णों से अलग रहती थी और आज भी है। गांवों में दलितों को गांव के एक ओर रखा जाता है, कस्बों, शहरों में दलित मुहल्ला, हरिजन मुहल्ला अलग ही होते हैं।
विगत कुछ वर्षों से दलित, दलित चेतना, दलित आंदोलन और दलित साहित्य ने विचारकों, सामाजिक चिंतकों, साहित्यकारों और आलोचकों का ध्यान आकृष्ट किया है। इधर हिंदी में भी दलित साहित्य एक स्थापित धारा बन चुकी है। दलित साहित्य आंदोलन के प्रमुख धारा बनने के बावजूद दलित और दलित चेतना पर बहस अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है, खासतौर से इस बात पर विवाद बना हुआ है कि दलित कौन है? दलित चेतना का स्वरूप क्या है? और दलित साहित्य को कैसे परिभाषित किया जाए। जिसका दलन किया गया हो वही दलित है, यदि इस अवधारणा को माना जाए तो दलित शब्द के अंतर्गत आर्थिक रूप से निम्न सभी वर्णों के लोगों को समाहित कर लिया जाना चाहिए। लेकिन यहाँ स्पष्ट कर देना उचित होगा कि आर्थिक रूप से सभी वंचित लोगों की सामाजिक प्रस्थिति समान नहीं होती। यदि कोई ब्राह्मण, ठाकुर या वैश्य आर्थिक रूप से विपन्न है तो उसे लोग गरीब कहकर सहानुभूति प्रकट कर देते हैं परंतु पूर्व से घोषित अस्पृश्य दलित समाज तो आज भी आर्थिक दृष्टि से पूरी तरह दलित है और आज भी समाजिक रूप से उसका दलन हो ही रहा है किंतु कोई उसके प्रति उस तरह से सहानुभूति नहीं प्रकट करता है जिस तरह से एक सवर्ण गरीब के साथ। यदि आर्थिक रूप कमजोर व्यक्ति को दलित माना जाए तो हमारे समाज में एक गरीब ब्राह्मण की सामाजिक प्रस्थिति वह नहीं होगी जो कि एक गरीब अछूत जाति के व्यक्ति की। परंपरागत रूप से धन, शक्ति, यश एवं गुण से हीन ब्राह्मण भी धनवान, शक्तिशाली, गुणवान अछूत से सामाजिक स्तर पर उच्च माना जाता है। यहां तक कि एक अनपढ़, निरक्षर सवर्ण किसी बुद्धिमान, शिक्षित शूद्र को अपने बराबर मानने को तैयार नहीं होता है। तुलसीदास की ये पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं – ‘पूजिय विप्रासील गुन हीनासूद्र न गुन गन ग्यान प्रवीना।’ आज के आधुनिक समाज में जातीय विभाजन एक दम निरर्थक है। बल्कि बदलते हुए समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था और पूंजीवादी दैत्य ने अपने पाँव चारों तरफ पसारन लिये हैं उसमें जातिविरोधी समतामूलक दृष्टिकोण की उपयोगिता और सार्थकता निश्चित रूप से बढ़ जाती है।
समकालीन कविता का कैनवास काफी विस्तृत है। समकालीन कवियों ने अपनी कविता में केवल प्रेम, सौंदर्य और प्रकृति को ही महत्त्व नहीं दिया है, बल्कि उन्होंने समय के अनुरूप आम आदमी की स्थिति को भी परखने का पूरा-पूरा प्रयत्न किया है। आज के कवियों द्वारा आज की हिंदी कविता में स्त्री की संवेदना, दलितों पर किये गये अत्याचार एवं आदिवासी जन-जीवन को महत्त्व दिया जा रहा है। सत्य है कि काल एवं समय के अनुरूप समकालीन काव्य लेखन के संदर्भ भी परिवर्तित हो रहे हैं। ऐसा कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। लेकिन मेरी दृष्टि से साहित्य केवल विशिष्ट वर्ग का ही प्रतिनिधित्त्व कर रहा है। इसलिए साहित्य के अन्तर्गत दलित यथार्थ का सत्य, आदिवासी का जीवन और वनों-जंगलों में घुमकर अपना जीवन बिताने वाली घुमंतू जैसी जनजातियों का चित्रण उस मात्रा में नहीं है जितना होना चाहिए। यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो ये चीजें उस दर्पण में नहीं के बराबर क्यों हैं, यह विचारणीय है। लेकिन आज के दौर दलित एवं आदिवासी पर लेखन किया जा रहा है । उसी प्रकार घुमंतू जनजातियों पर भी लेखन किया जाना आवश्यक है।
प्राचीन काल से ही उच्चवर्गीय समाज द्वारा दलित एवं पिछड़े हुए समाज का शोषण होता आया है। मराठी एवं हिंदी के कुछ कवियों ने अपनी लेखनी के माध्यम से छुआछूत एवं अस्पृश्यता की जड़ों को उखाड़ने का प्रयास किया है। मराठी के कुछ कवियों ने दलित और बंजारा, कैकाड़ी, वडर आदि जनजातियों की स्थितियों का चित्रण किया है। प्राचीन कवियों ने भी अपने काव्य में जातियता एवं अस्पृश्यता को मिटाने के लिए समाज में जनजागृति का कार्य किया। मराठी में तुकाराम, ज्ञानेश्वर, नामदेव,चोखामेळा, एकनाथ समर्थ रामदास आदि संत कवि मराठी दलित साहित्य के आदर्श माने जाते हैं। उसी प्रकार हिंदी में कबीर, रविदास, मीराबाई, रैदास आदि भक्त कवि हिंदी दलित साहित्य के प्रेरणा स्रोत बने। इन कवियों ने तत्कालीन सामाजिक उँच-नीच के भेदभाव को मिटाने का संदेश जनसमान्य को दिया। कबीर का साहित्य जाति-पाती एवं अन्याय के खिलाफ हस्तक्षेप करके सभी समाज के वर्गों का नेतृत्व करता है। कबीर ने जातीय व्यवस्था व सामन्तवाद का विरोध किया है। इसलिए उनके काव्य में हिंदू-मुसलमान, ब्राह्मणों और शूद्रों आदि के उल्लेख के रूप में वर्ण व्यवस्था के विरोध के संकेत मिलते हैं -
जन्मत शूद्र, भये पुनि शूद्रा ।
कृत्रिम जनेउ, घालि जंग दुंद्रा ।।
तथा
जाति-पाँति पूछे न कोई
हरि का भजे से हरि का होई ।

डॉ. सुमन सिंह कबीर के योगदान को रेखांकित करते हुए कहती हैं कि, “मराठी एवं हिंदी के संत साहित्य में सभी संत कवियों ने वर्ण-व्यवस्था, जाति-पाँति, ब्राह्मण-शूद्र, मूर्ति पूजा और पाखंड का विरोध किया है। इन्होंने अपनी बात अपनी भाषा, भजन और दोहों के माध्यम से कही है । संत नामदेव, संत कबीर, नाभादास, दादू दयाल, सुंदरदास आदि सभी संत कवियों की वाणी में दलित चेतना के स्वर देखे जा सकते हैं ।[1]
दलित कविता का आरंभ आधुनिक काल से माना जा सकता है। महावीरप्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित ‘सरस्वती’ पत्रिका में ‘हीराडोमनाम की भोजपूरी कविता ‘अछूत की शिकायत’ नाम से छपी थी। यह हिंदी कविता में प्रथम दलित कविता मानी जाती है। उसके पश्चात् हिंदी के कुछ कवियों ने अपनी कविता में दलित चेतना का स्पर्श करने का प्रयास किया। लेकिन उससे विमर्श प्रारंभ नहीं हो पाया क्योंकि उनकी दृष्टि सीमित ही रही है। उन्होंने केवल दलितों को ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखायके रूप में ही देखा। नागार्जुन, निराला जैसे कवियों ने दलितों एवं पिछड़े हुए समाज के शोषितों के विविध रूपों को चित्रित किया है। निराला ने ‘शिवाजी का पत्रकविता में शूद्रों की दयनीय स्थिति पर चिंता व्यक्त की है। निराला की दृष्टि से भारत में जब तक शूद्रों की स्थिति दयनीय रहेगी, तब तक भारत देश का भविष्य अंधकारपूर्ण ही बना रहेगा।
जारी रहेगी यदि/इसी तरह आपस में/उच्च जातियों की घृणा /द्वंद कलह, वैमनस्य”[2]
इक्कीसवीं सदी के दौर में दलितों के जीवन-परिवर्तन को लेकर कविताएँ लिखी जा रही है। इन कविताओं में दलितों का संघर्ष, मुक्ति आंदोलन, अज्ञानता, दरिद्रता, सामाजिक गुलामी से मुक्ति, अछूतों के लिए आजादी, दलितों की पीड़ा औरव्यथा आदि को महत्त्व दिया जा रहा है।  बहुत से दलित साहित्यकार न सिर्फ गद्य बल्कि पद्य में भी अपनी उत्तम से उत्तम रचनाएं प्रस्तुत कर इस विमर्श को आगे बढ़ा रहे हैं।
दो-तीन दशकों से समाज का काफी हद तक कुछ अलग तरह का सांप्रदायीकरण और जातिवादीकरण हुआ है जो कि परंपरागत जातिवाद से कुछ अलग प्रतीत होता है। समाज का जातिवादीकरण वैसे कुछ नया नहीं है इसकी जड़े तो भारतीय संस्कृति में सदियों से हैं परंतु विगत दशक में इसका मुखौटा परिवर्तित सा हो चला है, जहां एक ओर सवर्ण समानता के नाम पर दलित समुदाय के लोगों के साथ मित्रता कर रहे हैं, वहीं कहीं न कहीं उनके प्राचीन संस्कार भी जोर मारते रहते हैं। ऊपर से दिखावा अवश्य किया जाता है कि आपस में हम भाई-भाई हैं परंतु कथनी और करनी में बहुत अंतर होता है। राजनीतिक पार्टियाँ वोट के लिए जातिवादी भावनाओं का ही सहारा लेती हैं। उत्तर प्रदेश तो प्रमुख उदाहरण है। कभी दलित समर्थित बहुजनसमाज पार्टी को प्रमुखता मिल जाती है तो कभी यादव समर्थित समाजवादी पार्टी को। ऐसा ही हाल लगभग भारत के सभी राज्यों का है। विकास और प्रगति कोई विशेष मुद्दा नहीं बन पाया है हमारे देश में। जातिवाद ही हावी रहता है। देश का सवर्ण नेतृत्व इस अलगाववादी भावना को संपोषित करने के लिए अन्य लोगों की तुलना में ज्यादा जिम्मेदार है। लेकिन हिंदी की कविता इस पूरे दौर में सांप्रदायिकता के खिलाफ खड़ी रही। हिंदी कविता ने सांप्रदायिकता के विरुद्ध सिर्फ नारा नहीं लगाया बल्कि हिंदी के कवियों ने इस दौर को पूरी जटिलताओं के साथ सांप्रदायिकता के विविध रूपों को अपनी पूरी रचनात्मक समझ से साथ देखा, परखा और जांचा। हिंदी कविता का संसार कितना बड़ा है, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अगर किसी एक विषय को लेकर हिंदी की श्रेष्ठतम समकालीन कविता का चयन किया जाए तो उसके लिए कविताओं का एक संचयन काफी नहीं होगा। इसी तरह हम देखते हैं कि स्त्रियों को लेकर पुरुषों ने और खुद कवयित्रियों ने जो कविताएं लिखी हैं, वे अपने आप में एक सामाजिक, राजनीतिक दस्तावेज तो हैं ही, वह हिंदी की श्रेष्ठतम कविता का उदाहरण भी है। इसी तरह पिछले वर्षों में वैश्वीकरण का पूरे समाज पर किन-किन रूपों में प्रभाव पड़ा है, उसका जो रचनात्मक आकलन हमारे हिंदी के कवियों ने किया है, वह हमारे अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों द्वारा किए गए आकलनों से कहीं आगे का है और उसके दुष्प्रभाव की एक संपूर्ण रपट भी है जो शायद अन्य कहीं न मिले। वर्तमान दौर में जिस तरह गरीबों, दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों की अनदेखी हो रही है, जिस तरह उनकी आवाज को कहीं भी दर्ज न करने देने की जबर्दस्त कोशिशें हो रही हैं। किंतु इन लोगों के संघर्षों, दुखों, पीड़ाओं, अकेलेपन की अनेक तस्वीरें हिंदी कविता ने दर्ज की हैं। यानी हमारे समय के भारत की जिस सच्चाई की उपेक्षा हमारे अकादमीशियन, हमारे विचारक, हमारे पत्रकार, हमारे नेता, हमारा मीडिया कर रहा है, वे हिंदी की कविता में दर्ज मिलेंगी। इसीलिए ऐसी कविता जो अपने समाज के पूरे ढांचे को बारीकी से देखने-समझने का प्रयास कर रही है, उसमें अंतनिर्हित यातना और पीड़ाओं को दर्ज कर रही है, उसकी आशाओं-आकांक्षाओं को रेखांकित कर रही है, वह निश्चय ही दुनिया की श्रेष्ठ कविताओं में गिने जाने योग्य है। 
तेवरी काव्यांदोलन के प्रणेता ऋषभदेव शर्मा की कविताओं में वैसे तो राजनीतिक, समाजिक, धार्मिक, ग्रामीण परिवेश आदि को पर्याप्त अभिव्यक्ति मिली है। इसके साथ ही उनकी कुछ कविताओं में भारतीय समाज को आदिकाल से वर्तमान काल तक प्रभावित करने वाली वर्णभेद व्यवस्था का पुट देखने को भी मिलता है। लेकिन उन्होंने दलित शीर्षक से कोई कविता नहीं लिखी पर उनकी कविताओं में इसकी चेतना अवश्य झलकती है। प्रस्तुत विवेचन में इसी को रेखांकित करने का प्रयत्न किया जा रहा है -
सवर्ण बीती अनगिनत पीढि़यों से दलितों के रक्त से अपने हितों का सिंचन करते आए हैं। शोषकों के जीवन का हर तथ्य किसी न किसी रूप में किसी न किसी दलित की गाढ़ी मेहनत, गुलामी, शोषण और उसकी आंतरिक वेदना का चिट्ठा होता है जिसका लेखा जोखा किसी के पास नहीं क्योंकि शोषक को दलितों पर किए गए अपने जुल्म याद रखने की कोई जरूरत ही नहीं और दलित किसी लायक रहा ही नहीं। उसे तो न पढ़ने दिया गया, न सुनने दिया गया और उसने अपने निजी कौशल से कुछ सीख लिया तो उसका अंगूठा कटवा लिया गया। एक दलित का अंगूठा कटवा लिया जाना भले ही उदाहरण बन गया परंतु असंख्य दलितों की आवाज तो कभी भी ठाकुर, ब्राह्मणों के घरों की चार-दीवारों से बाहर ही नहीं आ पाई। दलित सवर्णों के हाथों का खिलौना बना रहा और खुद को मिटाकर दूसरों को जीवन देता रहा है-
“रक्त पीकर पल रही है रक्तजीवी एक पीढ़ी
जबकि अपनी देह की हम आप हड़डी काटते हैं।”[3]

सवर्ण अपनी शक्ति एवं इच्छा से दलितों के आदेशदाता एवं कर्णहार बन गए, उन्हें किसी से इजाजत लेने या पूछने की जरूरत थी ही नहीं और दलित उसी को अपना भाग्य मानते रहे हैं। अत्याचार के विरूद्ध आवाज उठाने तक की इजाजत नहीं दी गई। धर्मशास्त्रों को सुनकर उनसे ज्ञान लेने की कोशिश तो दूर, यदि कभी गलती से किसी दलित के कान में इनका कोई वाक्य पड़ गया तो उसके कानों में गर्म तेल डलवा दिया गया। जुवान खोलने की कोशिश की तो उसे तकुए से छेद दिया गया या जीभ ही काट ली गई। अपने ही पीडि़तों की आवाज सुनने से भी प्रतिबंधित कर दिया गया ताकि उनकी आवाज सुनकर मन में दर्द या पीड़ा न हो और आवाज उठाने का प्रयास ही न किया जा सके -
“जो पिता की भूमिका में/ मंच पर उतरे/ विधाता हो गए वे/जीभ में तकुए पिरोए/आंख कस दी पट्टियों से/कान में जयघोष डाला/आह सुनने पर लगे प्रतिबंध/पीडि़तों से कट गए संबंध/चीख के होठों पड़ा ताला[4]
सवर्ण होली दीवाली तथा अन्य त्योहारों पर सकुटुंब खुशियां मनाते हैं पर गरीब, दलित, शोषित जनों का न तो कभी कोई त्योहारा होता है और न ही कोई खुशी वो तो हर मौसम में हर रोज एक कार्य में डूबे रहते हैं सवर्णों की बेगार में। वे तो बस दूसरों को देखकर ही मन मसोस कर रहे जाते हैं अपने जीवन और उसमें नीहित कमियों के भंवरजाल को मन ही मन कोसते हुए।
“हो गए है आप तो ऋतुराज होली में
वे तरसते रंगी को भी आज होली में”[5]

दलित दबा रहता है और दलन उसकी नीयति बन चुकी है, वह जब भी अपनी आवाज उठाना चाहता है तो उसका बड़ी ही निर्दयता के साथ दमन कर दिया जाता है। यहां तक उसे अपने जख्मों में हो रहे दर्द पर कराहने का भी हक नहीं होता, वह कराहता भी है तो उस पर और अधिक अत्याचार होता है पर उसकी अंतरआत्मा कह उठती है -

“मौन हम निर्दोष कब तक मार कोड़ों की सहेंगे
जबकि दबती आह पर वे शोषितों को डांटते हैं।”[6]  

पूंजीपति, ठाकुर, जागीरदार, ब्राह्मण, वैश्य ने सदा से ही दलितों को दबाए रखा और जरा सा अनाज या कोई सामान दे एक दलित को न जाने कितनी पीढि़यों के लिए गुलाम बनाया जाता रहा है। इतिहास साक्षी है भारत में बहुजुठाई जैसी प्रथा भी रही है। इस प्रथा में किसी भी दलित की स्त्री को सर्वप्रथम उस गांव का मुखिया, जमींदार या ठाकुर जूठा करता था उसके बाद जब ठाकुर का मन भर जाता था तब दलित को उसकी स्त्री दया के रूप में लौटा दी जाती थी। यदि उस दौरान दलित स्त्री यदि गर्भवती हो जाती थी उसका दलित पति उस रसूखदार ठाकुर के बच्चे को आजन्म अपना कर पालता था। इसप्रकार पैदा हआ बच्चा क्योंकि वह दलित कोख में पलता था, दलित ही रहता था । बड़ी विडंबनात्मक स्थिति रही है दलित समाज की। दलित स्त्रियों को आज भी उच्च वर्ग के लोग अपनी बपौती समझते हैं। दलित पैसे से गरीब तो होते ही हैं और जिसके पास पूंजी होती है उसके समक्ष अनादिकाल से अन्य लोग झुकते आए हैं। दलित भी कर्ज लेते है और बदले में उनकी स्त्रियां समाज में सूदखोरों और तथाकथित समाज के सभ्य ठेकेदारों का शोषण झेलने के लिए सबसे नरम चारा बनती आई हैं। भूखे, नंगे और मजबूर दलित घर की औरत को वैसे तो ये सभ्य समाज के ठेकेदार कभी देखना भी पसंद नहीं करते परंतु जैसे ही इनकी नजर उसके शारीरिक कटाव-छटांव पर जाती है वह गंदी नहीं रह जाती है और उस स्त्री का परिवार कर्जे में डूबा हो तो वह सूदखोर, जमींदार या फिर उसका मुनीम गरीब के घर की इज्जत को अपने पैरों की दासी और सबसे आसानी से उपलब्ध हो सकने वाले जिंदा मांस की दृष्टि से ही देखता है। और यह तक नहीं सोचता कि जिस गरीब स्त्री के उरोजों पर उसकी गंदी निगाहें टकटकी बांधे हुए हैं उन्हें देखकर उसके मजबूर पति, भाई या पिता के ह्रदय पर क्या गुजरती होगी। वे बेचारे तो सिर्फ मन में ही घुटकर रह जाते हैं परंतु उनका ह्रदय कह उठता है -
भूख के उरोज पर सेठ या मुनीम
औेर ना धरें नजर भूमि की पुकार”[7]

दलित अपने जीवन की गाड़ी को चलाने के लिए सुबह से शाम तक शरीर तोड़ मेहनत करता है परंतु ठेकेदार उतने पर भी खुश नहीं होता है। दलित को बीच-बीच में सुस्ताने का भी हक नहीं । जरा सा बैठ जाए तो उसका स्वागत गालियों एवं हंटरों, कोड़ों से होता है। यदि वेदना उजागर करती हैं निम्नलिखित पंक्तियां –

“पीठ पर नीले निशानों की उगी है बस्तियां
बोझ कितने ही गधों का ढो गया मेरा शहर।”[8]  

दलितों की माली हालत कभी भी ठीक नहीं रहती है। आज कमा लिया तो खा लिया नहीं तो फांके। यहाँ तक कि ओढ़ने के लिए उनके गुदड़े भी नहीं होते है और जब गुदड़ी फटने लगती है तो चिंतातुल गरीब मां जहां तहां से मिल जाने वाले चिथड़ों से उस गुदड़ी की मरम्मत करती है ताकि सर्दी के मौसम में उसे अपने बच्चों को ओढ़ सके। गरीब दलित और उसका परिवार दिल्ली की सड़कों पर बदहाल जिंदगी जी रहा होता है तो उसके गांव, मोहल्ले वाले तथा रिश्तेदार यही सोचते हैं कि फलाना तो दिल्ली में कमाने गया है और उसकी जिंदगी वहां बड़े मजे से गुजर रही होगी। परंतु उसका वहां क्या हाल है, वह तो सिर्फ वही जानता है –

“रग्घू की मां तो चिथड़ों से गुदड़ी सीती
शोषण की साड़ी में दिल्ली रानी है।”[9]

जहां पुराने जमाने में ठाकुरों, जमींदारों, साहूकारों द्वारा जी भरकर दलितों का शोषण किया गया, वहीं वर्तमान राजनीति साहूकार जो कल तक उन्हीं के बीच का इंसान होता था, वह भी खुद को जिताने के लिए जातिवादी भावनाओं को भड़काता है और लोगों को अपने पक्ष में कर जीत भी जाता है। वह चुनावी दंगल जीत जाता है, उसे कुर्सी मिल जाती है परंतु जो दलित पहले से भूखे थे और बेहतरी की आस में छले गए उनकी हालत सदियों पुरानी अवस्था में रहती है। उसे तो कल भी रक्त बहाना पड़ता था जिंदा रहने के लिए और चुनाव के बाद भी रक्त ही बहाना पड़ता है। चुनाव के दौरान अपनी जातिगत भावनाओं के चलते जब भी दलित अपने समर्थक के लिए लहुलुहान होता है तो वह यही सोचता है अपना आदमी जब नेता बन जाएगा तब उसके और उसके समाज के दिन फिरेंगे पर ऐसा कुछ भी नहीं होता है। उसके रक्त से सनी कुर्सी पर उनका ही आदमी जब बैठ जाता है तो वह सवर्ण बन जाता है और दलित दलित ही बना रहता है ।
“सूखी आंतों, भूखे पेटों को रोटी तो मिल न सकी,पर
रक्त आदमी का कुर्सी के होठों का सिंगार हो गया।”[10]

दलितों के जीवन में राजनीति भी अहम हिस्सा होती है क्योंकि वह चाहे-अनचाहे राजनीति का शिकार होता हैं। स्वतंत्र भारत में भी दलितों की चारों ओर से घेराबंदी की जा रही है। आजादी के साठ साल बाद भी दलितों को राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा जाता है। अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए संघर्ष करनेवाले दलितों को पोलिंग बूथ तक भी जाने नहीं दिया जाता है। उनको डरा-धमकाकर अपने पक्ष में मतदान करने के लिए मजबूर किया जाता है। उनके लिए राजनीति एक बेईमानी से ज्यादा कुछ नहीं है। मुखिया नाम का प्राणी जो हम में से ही एक होता तो है परंतु मुखियागिरी आते ही वह जिनके कारण मुखिया है, उन्हें ही सबसे पहले भूल जाता है और उसे यह भी याद नहीं रहता कि वह जिन पर अत्याचार कर रहा है, वे तो उसी के अपने हैं और आज वह जो कुछ भी है, उन्हीं की बदौलत है। वह आदमखोरी करता है और स्वयं के द्वारा किए गए गलत कार्यों को अशिक्षित, अनपढ़, अनगढ़ भोले-भाले दलितों के सिर पर मढ़ देता है, चूंकि वह रसूखदार हो चुका होता है लोग और प्रशासन उसी पर विश्वास करते हुए और बहुत हद तक मिलीभगत के कारण निर्दोष लोगों को फंसा देता है -
“मुखिया आदिमखोरों का
कब तक करता संतोश पलंग
साफ बरी होता मढ़कर
औरों के सिर दोश पलंग”[11]

सवर्ण हमेंशा दलितों को हिकारत की नजर से देखते रहे हैं। उन्हें कभी इंसान माना ही नहीं, यहां तक कोई दलित किसी कारण से सवर्ण के दरवाजे पर पहुँच गया तो उसे दुत्कार के अलावा और कुछ नहीं मिला और कभी कुछ मिला भी तो उसे उससे ज्यादा चुकाना पड़ा -
“आपकी डयोढ़ी रही, दुत्कारती जिनको
स्पर्शवर्जित झोंपड़ी,महतर गुलेलें हैं।”[12]

बलपूवर्क सवर्णों ने दलितों पर शासन किया क्योंकि वे निर्धन और निर्बल थे। भूखे पेट बल आ भी कहां से सकता है और जिस समुदाय की नसों में भूख और गरीबी समाई हो उससे उम्मीद भी कितनी की जा सकती है परंतु सवर्णों के अत्याचार कभी भी रूके ही नहीं। परंतु किसी भी अत्याचार की हद होती है। किसी न किसी दिन प्रतिरोध के स्वर सुनाई देने लगते हैं और जब दलित सजग होने लगत है तो  वह भूख और गरीबी से समझौता करने से इंकार कर देता है। और तब उसकी हालत कम से कम बेगारों वाली तो नहीं रह जाती। मजदूरी तो वे पहले भी करते रहे पर बिना पारिश्रिमिक के। जब दलितों ने ठाकुरों और अत्याचारियों की गुलामी छोड़कर पारिश्रमिक पर मजदूरी मांगनी आरंभ की तो अत्याचारियों की भौंहे तन गई। और उसे प्रताड़ित करने के नए तरीके अपनाए जाने लगे, ऐसे में दलित कह उठा -
“बन गए मालिक उठा, तुम हाथ में हंटर
अब नकहना चैंककर, नौकर गुलेलें हैं।”[13]
*                 *                       *
“धर्म भाषा जाति दल का आजकल आतंक है
इन सभी का दुर्ग टूटे एक ऐसा युद्ध हो।
रंग के या नस्ल के हित, जो कि नक्शा नोंच दे
क्रूर वह नाखून टूटे, एक ऐसा युद्ध हो।”[14]

पेट की आग व्यक्ति से क्या न करवाती है। अनगिनत वर्षों तक दलितों के शोषण का मुख्य कारण ये पेट ही तो रहा। वैसे भी सर्वमान्य सत्य है कि पेट ही सारी समस्याओं की जड़ है। यदि पेट न होता तो व्यक्ति संभवतः किसी के आगे न झुकता। दो वक्त की रोटियां ही शोषण का कारण बनती रही हैं, यही कवि कहता है –

“शक्ति का अवतार हैं ये रोटियां
शिव स्वयं साकार है ये रोटियां।
भूख में होता भजन, यारो नहीं
भक्ति का आधार है ये रोटियां।”[15]                     
   
भूखा व्यक्ति जब कभी किस्मत से रोटी के दर्शन कर पाता है तो उसे विश्वास ही नहीं होता है। उसे लगता है जैसे उसने दुनिया की सबसे नायाब वस्तु के दर्शन कर लिए हों। परंतु जब अति हो जाती है तो वह उसकी शक्ल तक भूल जाता है। गरीब की जिह्वा उसका स्वाद कभी का भूल चुकी होती है -
“भूख ने इतना तपाया भीड़ को
हो गया पत्थर निवाला देख लो।”[16]
दलितों को हमेंशा झूठे व लुभावने वादे कर छला गया। कभी पुचकार कर तो कभी दुत्कार कर। पुचकार और दुत्कार ही दलितों की नियति रही है, लेकिन आज का दलित समझ चुका है वह पुचकार झूठी है और उसे अब उनके फरेब में नहीं आना है –

“कुल गालियां देकर कभी, कुछ बांट गोलियां
तुल छल चुके हमको,सुनो अब तक अनेक दिन।”[17]

जीने का हक सभी को होता है। जो जीव दुनियां में परमपिता परमेश्वर के प्रताप से इस संसार में अवतरित हुआ है उसे सभी के समान जीने का हक है परंतु दलितों से सवर्णों ने जीने का हक छीन लिया और उन्हें इसका भान भी जाता रहा कि उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व भी है परंतु प्रकृति तो अपना रंग हर व्यक्ति के अंदर जोर मारती ही है और उसी के फलस्वरूप दलित के अंदर से भी पुकार उठती है जीने की, उसके कुछ होने की -
“घुलते चले जाते हैं..../घुलते चले जाते हैं..../हमारे अस्तित्व के रंग/और फिर/हौले से /आ जाते हैं सपनों में!/सताते हैं प्राणों को/हो जाते हैं विलीन/छूने का बढ़ते ही/टूटते हैं स्वप्न/कलपती हैं उंगलियां/तरसते हैं पोर-पोर/छूने को रंग/सपनों के रंग।”[18]   
दलितों ने भी समाज के उत्थान में सदा ही सकारात्मक भूमिका का निर्वहन  किया। उन्होंने भी हर संघर्ष को अपना मानते हुए उसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया परंतु सवर्णों ने उनके बलिदानों को कभी आकलित करने का प्रयास तो दूर की बात है, उसका ग्रंथों में उल्लेख करना तक मुनासिब नहीं समझा -
तुम्हारे अंधे इतिहास में/तुम्हारी सभ्यता के विकास में/मेरा गला जला जा रहा है/मेरी पीठ सुलग रही है/ तेरी आंखों में चिंगारी धधक रही है/मेरे कानो में जलन भर रही है/और मेरी जीभ में चुभन हो रही है/ तुम्हारे अंधे इतिहास में/ अंकित हे/ मेरी हत्या का षडयंत्र।[19]
दलित समुदाय के लोगों को भेदभाव बचपन से ही झेलना पड़ता है भले ही आज समाज ये कहे कि अब पहले जैसी स्थिति नहीं रही है परंतु मानसिकता में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया है और यदि आया भी है तो बस इतना कि किसी दलित के सामने न कह कर लोग उसके मुंह फेरते ही अपनी भावनाओं को प्रकट करने से नहीं रोक पाते हैं। महानगरों में भले ही स्थिति कुछ बदली हो परंतु छोटे शहरों, कस्बों तथा गांवों में अभी भी स्थिति पहले जैसी ही है। बचपन में दलित को उसके वर्ण का अहसास दिला दिया जाता है -
बचपन......./सपनों से भरा तुम्हारा बचपन/निर्दोष भोलाभाला तुम्हारा बचपन/स्पर्शवर्जित कुंआरा तुम्हारा बचपन/दुधमुहां श्वेतवर्ण तुम्हारा बचपन।[20]
भारतीय समाज तो जातिवाद का उदाहरण है। अपराधियों, राजनीतिक माफियाओं, देश के गुप्त दस्तावेजों को बेचने वालों घोटालेबाजों और मक्कारों के साथ-साथ गंदे पशुओं और पक्षियों तक को मंदिरों में प्रवेश प्राप्त है, पर ईमानदार, कर्मठ और शान्ति प्रेमी दलित को नहीं। आज संपूर्ण देश भ्रष्टाचार और मुनाफाखोरी की समस्याओं से ग्रस्त है। छोटे-से छोटे काम से लेकर बड़े से बडे काम पैसे के सिवाय पूर्ण नहीं हो रहे है। चुनाव के लिए करोडों रुपये खर्च करनेवाला उम्मीदवार जीतने के बाद शासन तथा जनता को लूट रहा है। गरीब और दलित जनता उनकी जीत के लिए मतदान करती है। लेकिन जीत कर आने के बाद नेता उनकी बस्तियों में कदम तक नहीं रखता है। वैसे विश्व में ऐसा कोई देश नहीं जहां जातिवाद हावी न रहा हो परंतु हमारे देश का जातिवाद बहुत खंडों में विभाजित है। प्राचीन काल से वर्तमान तक इसके अनगनित उदाहरणों से हम सब अच्छी तरह से परिचित हैं इसलिए विशेष रूप से उन्हें उल्लेखित करने के स्थान पर विषयानुसार हम यदि हिंदी कविता की बात करें तो ज्यादा समीचीन होगा। दलित आंदोलन से संबंधित साहित्य में जहां दलित लेखकों का पूरा-पूरा योगदान है वहीं गैर दलित लेखकों का बहुत योगदान है। यहां वही चिरपरित प्रश्न आता है कि क्या गैरदलित साहित्यकारों के साहित्य को दलित साहित्य माना जाए तो इतना तो अवश्य कहा जा सकता है कि पूर्णतः दलित साहित्य न भी मानें तो इसे दलित संवदेना का साहित्य को कहा ही जा सकता है। हिंदी में एक कहावत है कि ‘जा के पांव फटी न बिबाई वो क्या जाने पीर पराई।’ यह सत्य है कि जिसे दर्द होता है, वही उसकी सघनता को ज्यादा अच्छी तरह से जानता है परंतु अन्य लोग भी उसके हाव-भाव से उसकी पीड़ा का कुछ अहसास अवश्य कर सकते हैं। ऐसे ही अहसास के फलस्वरूप गैर दलित सवर्ण लेखकों की लेखनी से जो साहित्य निस्रित होता है, उसे दलित संवेदना का साहित्य तो कहा ही जा सकता है, वह दलित साहित्य भले ही न हो। ऋषभदेव शर्मा मूलतः ग्रामीण परिवेश से संबंधित हैं और उन्होंने भी दलित, गरीब लोगों का शोषण होते देखा है। ऐसे में एक सहृदय लेखक होने के नाते उनका मन भी द्रवित होता है, और उसी द्रवण के कारण उनकी कविताओं में हमें गरीबों, दलितों, स्त्रियों का दुख दर्द झकलता है।
संपर्क - -  विजेंद्र प्रताप, ईमेल पता - vickysingh4675@gmail.com
संदर्भ -
1. डॉ. सुमन सिंह, समकालीन हिंदी कविता में दलित चेतना, सामयिक प्रकाशन, दिल्ली
2. निराला, राग-विराग (काव्य-संकलन)
3. ऋषभदेव शर्मा, तेवरी,1982, तेवरी प्रकाशन, खतौली
4. ऋषभदेव शर्मा, ताकि सनद रहे, 2002,तेवरी प्रकाशन,हैदराबाद
5. ऋषभदेव शर्मा, तरकश,1996, तेवरी प्रकाशन, खतौली











      (ऋषभदेव शर्मा के चर्चित काव्य संग्रह)


[1] डॉ. सुमन सिंह, समकालीन हिंदी कविता में दलित चेतना, पृ. संख्या 77
[2]  निराला, राग-विराग (काव्य-संकलन), पृ. 132
[3] तेवरी ,पृष्ठ सं. 74
[4]  ताकि सनद रहे, पृष्ठ सं. 27
[5] तेवरी, पृष्ठ सं. 75
[6] तेवरी, पृष्ठ सं. 74
[7] तेवरी,पृष्ठ सं. 77
[8]  तेवरी,पृष्ठ सं. 79
[9]  तेवरी, पृष्ठ सं. 87
[10] तेवरी,पृष्ठ सं. 88
[11]  तेवरी, पृष्ठ सं. 106
[12] तेवरी, पृष्ठ सं. 112
[13] तेवरी, पृष्ठ सं. 112
[14] तरकश,पृष्ठ सं. 71
[15] तरकश, पृष्ठ सं. 20
[16] तरकश, पृष्ठ सं. 21
[17] तरकश, पृष्ठ सं. 24
[18] ताकि सनद रहे, पृष्ठ सं. 43
[19] ताकि सनद रहे, पृष्ठ सं. 56
[20] ताकि सनद रहे, पृष्ठ सं. 109
मूक आवाज़ हिंदी र्नल
अंक-7 (जुलाई-सितंबर 2014)                                                                              ISSN   2320 – 835X
Website: https://sites-google-com/site/mookaawazhindijournal/
 

भूमण्डलीकृत हिंदी सिनेमा का अतियथार्थवादी चेहरा - डॉ. पुखराज जाँगिड़



भूमण्डलीकृत हिंदी सिनेमा का अतियथार्थवादी चेहरा
-       डॉ. पुखराज जाँगिड़

यह गंभीरता से सोचने की बात है कि वह जीवन और समाज कितना अमानवीय होगा, जहाँ के बच्चे हिंसा को रोजमर्रा की गतिविधियों के रूप में देखते हुए बड़े हो रहे हों? इस तरह देखा जाए तो वासेपुर हम सबके भीतर है। वह हम सबके भीतर इसलिए भी है कि हम अन्याय का प्रतिकार करना भूल गए हैं। फिल्म बड़ी बारीकी से इसे विश्लेषित करती है, हालांकि रास्ता उसका भी हिंसा से होकर जाता है। एक पुत्र के सामने उसी के पिता को कटवाकर, उसके खून से उसी के बेटे का तिलक करके यह कहना कि तुम्हारे पिताजी बहुत बड़े आदमी थेमनुष्यता की सारे हदें पार कर जाता है। यह कैसा समाज है, जहाँ कोई भी सरदार / सुलतान / फैजल / डेफिनेट सरे राह किसी को भी मारकर चला जाए और लोग उप्फ तक न करें!

      (‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ – सिनेमाई पोस्टर)
भूमण्डलीकृत हिंदी सिनेमा की एक बड़ी खासियत अपराधियों में नायकत्व की खोज के रूप में विकसित हुई है। आज जिस तरह की फिल्में बन रही है, उसमें अधिकांश फिल्में इसी तरह की है और ये पहले के डाकूओं के हृदय-परिवर्तन पर आधारित फिल्मों से एकदम भिन्न है। भले ही आज के सिनेमा में भी ऐसी चालाक कोशिशें दिखाई देती हों पर इन सबके बावजूद इनमें हृदय-परिवर्तन खोजना आसान नहीं होता। हालांकि आज के परिवेश में मसाला सिनेमा के स्थान पर यथार्थवादी सिनेमा का बनना हिंदी सिनेमा के लिए अत्यंत सुखद घटना माना जा सकता है/माना भी जाता है। फिर यह जरूरी तो नहीं कि हर फिल्म में सामाजिक सरोकार अनिवार्यतः हो ही हो। आज का सिनेमा बदलाव के दौर से गुजर रहा है और यह बदलाव नयी पीढ़ी के फिल्मकारों के कारण संभव हुआ है। बदलाव के समय का यह सिनेमा क्षेत्रीय सिनेमा के लिए जगह बनाता है। इसके कारण अरसे बाद परदे पर वास्तविक घर और घर का आँगन दिखायी पड़ रहा है, वरना यहाँ तो सिर्फ महल, हवेलियां और बंगलें ही अधिक दिखते हैं। यहाँ गली-मुहल्ले की दुकानें और दुकानदार दोनों मौजूद हैं और उनके बीच की बातचील भी सहज-स्वाभाविक ढंग से होती है, न कि औपचारिक ढंग से। नयी पीढ़ी के फिल्मकारों में अनुराग कश्यप ऐसी फिल्में बनाने के लिए ख्यात और कुख्यात दोनों रहे हैं। वायकॉम 18 मोशन पिक्चर्स के बैनर तले बनी अनुराग कश्यप की पाँच घंटे और बीस मिनट की दो भागों की फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर (निर्माता : अनुराग कश्यप, सुनील बोहरा, गुनीत मोंगा) ऐसी ही एक फिल्म है।
गैंग्स ऑफ वासेपुर के केंद्र में अपराध और अपराधीकरण की एक सुनियोजित प्रक्रिया का हिस्सा बनते अपराधियों और फिर आजीवन ही नहीं बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसका अंजाम भुगतते लोगों की कहानी है। औसत भारतीय फिल्मों की तरह गैंग्स ऑफ वासेपुर के पहले भाग के नायक (जो असल में है तो खलनायक पर फिल्म में उसे नायकत्व प्रदान किया गया है) सरदार खान की जिंदगी का भी एक ही मकसद है - बदला! बदला भारतीय सिनेमा की एक अत्यंत लोकप्रिय कथारूढ़ि है, जो प्रायः सभी फिल्मों में समाहित रहती है। फिल्म का शीर्षक मार्टिन स्कार्सी की न्यूयॉर्क शहर को आधार बनाकर बनायी गयी गैंग्स ऑफ न्यूयार्क (2002) फिल्म की याद दिलाता है, जिसमें लियोनार्डो डी-कार्पियों, डेनियल डे-लेविस और केमरून डियाज ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थीं। अनुराग कश्यप की इस फिल्म ने कान फिल्म समारोह के साथ-साथ कई अन्य ऐसे फिल्म समारोहों में भी सराहना प्राप्त की, जहाँ अब तक प्रवासी भारतीयों को ध्यान में रखकर बनायी जाने वाली हिंदी फिल्में अधिक ध्यान खींचती थी। विदेशों में भारतीय फिल्मों के भविष्य के लिहाज से देखें तो यह एक अच्छी शुरूआत है कि अब भारत से बाहर भी ठेठ भारतीय आस्वाद वाली फिल्में पसंद की जाने लगी हैं।
बहरहाल, गैंग्स ऑफ वासेपुर की पटकथा खुद अनुराग कश्यप ने सैयद ज़िशान कादरी, अखिलेश जायसवाल, सचिन लाडिया और ऋत्विक ओझा के साथ मिलकर लिखी है। फिल्म के दोनों भाग बिहार और झारखण्ड में कोयले और लोहे की माफियागिरि तथा उसके पीछे की राजनीति को सामने लाते हैं। इस बीच कोयले की दलाली पर आई कैग की रपट के बाद कई ऐसे चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं, अप्रत्यक्षतः जिनका उपयोग इस फिल्म में भी हुआ है। जो हो, इन सबके बीच एक फिल्म यह सब दिखा रही है, यह अपने आप में राहत प्रदान करने वाला है। फिर गालियों और गोलियों के बीच नये कलाकारों का उभार जहाँ एक और डराता है, वहीं उनकी अभिनेयता तसल्ली देने वाली है। कई बार फिल्म के संवाद और स्थितियाँ इस अपराध थ्रिलर को हास्य का रूप देती प्रतीत होती है। हास्य भी ऐसा जिस पर सिर्फ रोया जा सकता है। गैंग्स ऑफ वासेपुर का पहला भाग 2 घंटे 39 मिनट 30 सेकण्ड का है। समयावधि के लिहाज से फिल्म काफी लंबी है और इसकी विषयवस्तु और प्रस्तुतिकरण को देखते हुए सेंसर बोर्ड ने इसे श्रेणी प्रदान की है।
गैंग्स ऑफ वासेपुर दो बाहुबली परिवारों की आपसी कलह पर आधारित है। कलह के केंद्र में कोयले और लोहे की अनैतिक चोर-बाजारी तथा माफियागिरि है। बात सिर्फ गुंडागर्दी तक सीमित नहीं है, इससे भी आगे जाकर वह राजनीतिक रोटियाँ भी सेंकती है। कुलमिलाकर कहानी सन् 1941 से 2009 के बीच के वासेपुर की है। इसमें बदला, खून-खराबा, लूटमार और प्यार सबकुछ है। धनबाद झारखण्ड का एक प्रमुख औद्योगिक शहर है। यह काले सोने के लिए जाना जाता है। काला सोना यानी कोयला। वासेपुर इसी धनबाद का प्रमुख मुस्लिम बहुत इलाका है। धनबाद के इतिहास को देखें तो धनबाद पहले बंगाल का हिस्सा रहा, फिर बिहार और अब झारखण्ड। कोयले की श्रेष्ठ गुणवत्ता के लिए जाना जाने वाला वासेपुर आज धनबाद का सर्वाधिक आबादी वाला मौहल्ला है। सन् 1956 में बिल्‍डर वासे साहब ने इसे वहाँ के जंगलों को काटकर बसाया था। कोयला यहाँ के लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन है पर नयी पीढ़ी पढ़ने-लिखने में भी अच्छा करने लगी है और विविध सेवा क्षेत्रों में भी अपना नाम कमा रही हैं, इन सबके बावजूद अतीत है कि पीछा ही नहीं छोड़ता। कोयले के कारण इस क्षेत्र का अच्छा-खासा विकास हुआ है, जिसके इर्द-गिर्द विभिन्न कोयला माफिया अपनी लठैती चलाते हैं। लठैती के सहारे इतिहास बनाने में लगे कई परिवार अपना सबकुछ दाँव पर लगा देते है, जो बाद में उनकी और उनकी आने वाली पीढ़ी के लिए अपने अस्तित्व को बनाए रखने की मजबूरी बन जाता है। नतीजतन कोयला माफियाओं के विभिन्न गुटों के बीच का खून-खराबा पीढ़ी-दर-पीढ़ी जारी रहता है। हर साल कोई-न-कोई कोयला माफिया/व्यवसायी मारा जाता है। फिल्म के प्रदर्शन के बाद वहाँ चली आ रही कोयले और लोहे की माफियागिरी एक बार फिर से चर्चा के केंद्र में आ गयी। इन सबके चलते फिल्म को वासेपुर के लोगों की नाराजगी का भी सामना करना पड़ा। वे इसे मुसलमानों को बदनाम करने की साजिशके रूप में देखते हैं। मामला राँची उच्च न्यायालय में भी गया।
फिल्म सैयद ज़िशान कादरी द्वारा लिखी गयी उस किताब पर आधारित है, जिसके केंद्र में फहीम खान और शाबिर अंसारी की वर्चस्व की लड़ाई है। वैसे वासेपुर से अधिक कोयला माफियागिरि धनबाद और झरिया में रही है और उस परिवेश पर इसके अधिक जीवंत फिल्मों की संभावना भी बनती है पर फिल्मकार इसके लिए वासेपुर को चुनते है। ऐसे में वासेपुर पर ही फिल्म क्यों? संभव है वासेपुर उन्हें धनबाद और झरिया से अधिक सुरक्षित लगा हो! जो हो, लोग सैयद ज़िशान कादरी के वासेपुर के फहीम खान और शबीर खान के परिवारों के बीच की लड़ाई से वाकिफ रहे हैं (और मजे की बात यह है कि दोनों अभी जिंदा हैं), लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि वे कोयला माफिया नहीं थे। ऐसा ही अंतर्विरोध फिल्म में भी है। कोयला माफियाओं पर आधारित होने के बावजूद फिल्म में न तो कोयला मजदूरों का जीवन है और न खदानों के बारीक ब्यौरे (पहले भाग के शुरूआती दृश्यों को छोड़कर कोयला मजदूरों का शोषणपरक जीवन कहीं नहीं दिखाई पड़ता), हालांकि फिल्म में इसकी कमी कई अनछूए सामाजिक पात्र और उनका विविधरूपी जीवन पूरा करता है।
फिल्म पूर्वदीप्ति (फ्लेशबैक) में चलती है और क्योंकि सास भी कभी बहू थी (2000-2008) से शुरू हुई कहानी अचानक गोलीबारी और बमबारी में बदल जाती है। गोलीबारी की यह घटना हमें बिहार के पूर्व रूप से परिचित कराती है। समय के साथ इन स्थितियों में बदलाव आता है। पहले चाकू-छूरी और अब बम-पिस्तौल। असल शुरूआत शाहिद खान (जयदीप अहलावत) द्वारा उस दौर के एक खुँखार डाकू सुल्ताना के नाम से अँग्रेजों की रेल पर की गयी अनाज की डकैती से होती है। सुल्ताना डाकू को जब इसका पता चलता है तो वह शाहिद खान की पूरी गैंग का खात्मा कर देता है। यहाँ भी मामला असल में सैयदों और पसमान्दों का निकलता है यानी अगड़ों और पिछड़ों का। हालांकि फिल्म उसकी बारीकी में नहीं जाती पर वह उस ओर संकेत अवश्य करती है।  बचते है तो सिर्फ शाहिद खान और उसका एक साथी, जिन्हें सुल्ताना डाकू वासेपुर छोड़ (धनबाद) चले जाने के लिए मजबूर कर देता है। धनबाद आकर वह रामधीर सिंह (तिग्मांशु धुलिया) की खदान में पहले तो एक मज़दूर के रूप में काम करने लगता है पर बाद में वह कोयला माफियागिरि को गहराई से समझने के लिए उसका लठैत बन जाता है। खदान में आने के बाद वह सुल्ताना डाकू से अपनी दुश्मनी को छोड़, रामधीर सिंह को मारकर उसकी खदान हथियाने की महत्त्वाकांक्षी कोशिश में जुट जाता है लेकिन होता इसका उल्टा है। आजादी के बाद भी कोयला खदानों की लूट पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए रामधीर सिंह शाहिद खान की तो हत्या करवाने में तो सफल होता है, लेकिन उसका एक मित्र उसके बेटे सरदार को बचा ले जाता है (सरदार खान को मारने का काम सुल्ताना डाकू के परिवार सौंपा गया था)। नतीजतन अकेले सरदार खान (मनोज वाजपेयी) को रामधीर सिंह और सुलतान खान की दोहरी दुश्मनी झेलनी पड़ती है। फिल्म में इसके चलते उसका किरदार खासा महत्त्वपूर्ण हो उठता है।
सातवें दशक में कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बाद स्थितियाँ बदलती है और रामधीर सिंह जैसे अपराधी राजनीति में आ धमकते हैं। यहाँ फिल्म समकालीन राजनीतिक व्यवस्था पर चोट करती नजर आती है। वह उन कारणों को चिह्नने में सफल हुई है, जिसके कारण दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र पस्त होने लगा था। राजनीति में अपराधियों के प्रवेश से लोकतंत्र कमजोर हुआ और राजनेताओं और अपराधियों ने नौकरशाही के साथ मिलकर जनता को दोनों हाथों से लूटा। परिस्थितियों में आए इस बदलाव का लाभ सरदार खान खुद को मजबूत करने में करता है और वह अपने एकमात्र मकसद अपने पिता की हत्या का बदला लेनेके साथ वासेपुर में धमाकेदार वापसी करता है। फिल्मकार ने बदले की इस कार्यवाही को मानवीय रूप देने के लिए सरदार खान और उसके बेटों दानिश और फैजल की प्रेमकहानियां भी गढ़ी है। पर दिक्कत यह है कि उसके दोनों बड़े बेटे (दानिश और फैजल) अपने दुश्मन सुल्तान खान की ही बहनों से प्रेम करने लगते हैं। उनके सच्चे प्रेम का असर यह होता है कि वे दोनों भाई दोनों परिवारों के बीच की दुश्मनी को हमेशा के लिए खत्म करने की कोशिशों में जुट जाते है और अपने पिता सरदार खान को इसके लिए राजी कर लेते हैं, लेकिन अपराधिक बदले और हृदय-परिवर्तन की यह कहानी वास्तविक जीवन की तरह कोई मुकाम हासिल नहीं कर पाती। दोनों परिवार रामाधीर सिंह की कूटनीति का शिकार बनते हैं और इनकी लड़ाई में सारा शहर मूकदर्शक बना बैठा है, जैसे – उनकी गालियाँ और ज्यादतियाँ शहर भर के लिए दहशत और मनोरंजन का जरिया हो। सरदार खान खुलेआम जीप में माइक्रोफोन पर एक मंत्री को चुनौती देता है। जैसे फिल्मकार हमें चेता रहा हो कि ऐसी घटनाएं कभी भी सांप्रदायिक रूप ग्रहण कर सकती हैं। इस तरह अँग्रेजी शासन के आखिरी दशक से शुरू हुई फिल्म की कहानी वर्तमान को छूने लगती है। फिल्म का पहला भाग दर्शकों के मन में कई सवाल छोड़ जाता है जिसके जवाब दूसरे भाग में मिलते है। जैसे - गौरी बंगालन ने किसे फोन किया और किसने सरदार खान को मारा? क्या दान‌िश और फैजल अपने पिता सरदार खान की मौत का बदला ले सकेंगे? सरदार खान के चार बेटे है - तीन जायज (दानिश, फैजल और परपेण्डीकूलर) और एक नाजायज (डेफिनेट)। अंत में बचता है तो डेफिनेट। वह भी अपनी माँ की कूटनीति के कारण। फिर बदलते भारतीय समाज का सच भी तो इससे बहुत अलहदा नहीं है।
सबसे पहले तो यह कि बाल मनोविज्ञान की दृष्टि से यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण फिल्म है। एक बच्चे का भविष्य उन परिस्थितियों पर निर्भर करता है, जिनसे जूझते हुए वह बड़ा होता है। फिल्म के नायकों (मूलतः खलनायकों) ने लूट का पूरा समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र तो बचपन में ही अपने पालनहारों से सीख लिया था। सरदार खान, फैजल खान और डेफिनेट का भविष्य उनके बचपन की कब्र पर तैयार हुआ था, जिसकी नियति छल के सिवाय कुछ और हो ही नहीं सकती। सरदार देख रहा था कि अपने लालच के कारण उसका पिता अपने ही लोगों को छल रहे हैं। फैजल देख रहा था कि उसके पिता पराई औरत के साथ गुलछर्रे उड़ा रहे हैं और उसका एक नाजायज भाई भी है। पिता की ऐय्याशी के विपरित अपनी माँ को बहकने देख उसे जलकर कोयला ही होना था। अपने भाई दानिश के साथ रेलगाड़ी के डिब्बे में झाड़ू लगाना और पाखाना साफ करना फैजल कहानी में विस्तार की माँग करता है। अगर फिल्मकार यहाँ रूकते तो फिल्म का यह हिस्सा अत्यंत प्रभावशाली हिस्सों में होता। नजमा और फरहान के बीच का जो रिश्ता बनते-बनते रह गया था, भले ही एक अधूरा सच साबित हुआ हो (खासकर तब, जब नगमा को प्रतिनिधि भारतीय चरित्र के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती है), लेकिन उसने एक बच्चे के जीवन को ही बदलकर रख दिया। हालांकि फिल्मकार अपनी अन्य फिल्मों में इस गणित को उलट चुका है, लेकिन यहाँ वह ऐसा नहीं करता। फिर जरूरी तो नहीं कि हर फिल्म या हर जीवन में ऐसा ही हो। यह गंभीरता से सोचने की बात है कि वह जीवन और समाज कितना अमानवीय होगा, जहाँ के बच्चे हिंसा को रोजमर्रा की गतिविधियों के रूप में देखते हुए बड़े हो रहे हों? इस तरह देखा जाए तो वासेपुर हम सबके भीतर है। वह हम सबके भीतर इसलिए भी है कि हम अन्याय का प्रतिकार करना भूल गए हैं। फिल्म बड़ी बारीकी से इसे विश्लेषित करती है, हालांकि रास्ता उसका भी हिंसा से होकर जाता है। एक पुत्र के सामने उसी के पिता को कटवाकर, उसके खून से उसी के बेटे का तिलक करके यह कहना कि तुम्हारे पिताजी बहुत बड़े आदमी थेमनुष्यता की सारे हदें पार कर जाता है। यह कैसा समाज है, जहाँ कोई भी सरदार / सुलतान / फैजल / डेफिनेट सरे राह किसी को भी मारकर चला जाए और लोग उप्फ तक न करें! ऐसा क्यों है कि कोई सवाल ही नहीं करता कि आखिरकार कोयला खदानों पर वर्चस्व स्थापित करने से शुरू हुई लड़ाई क्योंकर कई पीढ़ियों तक चलती जाती है? या फिर यह कि फिल्म बदले की भावना को एक सहज मानवीय प्रकृति के रूप में कैसे चिह्नित कर सकती है? फिल्म सवाल तो उठाती है पर उसका रास्ता बहसतलब तो है ही, दिक्कततलब भी है।
फिल्म की सफलता उन ब्यौरों में निहित है, जो विस्तार भले ही न पा सके पर उन्होंने दर्शकों के मानस को झंझोड़ने में सफलता प्राप्त की है। जैसे वह सब हमारे अपने ही जीवन की प्रतिकृति हो। यह ठीक वैसी ही है कि हम खुद तो हिंसक बने रहत हैं पर अपने और अपने परिवार के लिए शान्ति की कामना करते हैं। इस तरह यह फिल्म हमारे सामाजिक दोगलेपन पर करारा तमाचा जड़ती है पर गालियों और गोलियों के बीच कई बार हम उस फिल्म के वास्तविक मंतव्य को समझने में भूल कर देते है। फिल्मकार भी वहाँ ठहरता नहीं, इसलिए भूलें तो होनी ही है पर ऐसे मुद्दों पर भूलें फिल्मकार की सामाजिक जवाबदेही पर सवाल तो उठाती ही है और उठाना भी चाहिए। ऐसा लगता है कि कोयले की कालिमा जैसे सब और व्याप्त होती जा रही हो और हम चाहकर भी उसे पौंछने में असमर्थ सिद्ध हो रहे हों। हो भी क्यों नहीं, क्योंकि वे हम ही हैं जिन्होंने मजदूर विकास पार्टीको मजदूरों के शोषण का जरिया बनने दिया। आजादी के बाद के भारत में प्राकृतिक संसाधनों पर देशी पूँजीपतियों की न्यूनतम देकर अधिकतम लाभ कमाने की अत्यंत घिनौनी और स्वार्थी नीतियों ने मजदूरों को जीने के मूलभूत अधिकारों तक से महरूम कर दिया था। जैसा कि फिल्म बताती है कि आजादी से पहले अँग्रेज तनख़्वाह भी देते थे और छत भी’, लेकिन आजादी के बाद तो भारतीय पूँजीपतियों ने उनसे उनका घर भी छीन लिया। स्वातंत्रयोत्तर भारत और विशेषकर भूमण्डलीकृत भारत की इससे कड़ी आलोचना और क्या होगी कि आज हम अपने पूर्व-आक्रान्ताओं से भी अधिक हिंसक और अमानवीय हो गये हैं और जिस तरह की व्यवस्था हमने निर्मित की है/कर रहे हैं, उसने हमें इसकी खबर तक न होने दी?  
फिल्म का हास्यबोध कथानक की जटिलता के तनाव को कम करता है। कहानी की जटिलता और चरित्रों की अधिकता को देखते हुए फिल्म एकाग्रता की माँग करती है। फिर दूसरे भाग की कहानी तो बिना किसी भूमिका/रिकेप के शुरू होती है। फिल्म में धनबाद और वासेपुर के परिवेश को जीवंत बनाने के लिए फिल्मकार द्वारा किए गए कल्पना और यथार्थ के सहमिश्रण ने उसे और अधिक द्रुत बना दिया है। तीन पीढ़ियों की इस कहानी में परिस्थितियाँ एक पीढ़ी द्वारा की गयी गलती को सुधारने का कोई मौका दूसरी पीढ़ी को नहीं देती। हालांकि सरदार खान के दोनों बेटे दानिश और फैजल सुधार की कोशिश करते हैं, लेकिन उनके हाथ असफलता ही आती है। मछलीपालन शुरू करके खुद सरदार खान ऐसी कोशिश करता है, लेकिन मारा जाता है। पूरा भारतीय समाज और तमाम पुरानी भारतीय फिल्में इसी कथारूढ़ि पर चलती रही हैं। फिल्म के सबसे मजबूक पक्ष वे हैं जहाँ वे समकालीन समय और समाज की आलोचना करती है और मनुष्यता के पक्ष में खड़े होने की कोशिश करती है। फिल्म के लिए जो कथानक चुना गया, उसमें यह संभव न था। जो हो, पहला भाग मनोज वाजपेयी तो दूसरा भाग नवाजुद्दीन सिद्दिकी के अभिनय के लिये याद किया जाएगा, जिनके केंद्र में तिग्मांशु धुलिया है, कई बार तो वे अकेले ही दोनों पर भारी पड़ते हैं। हमारे यहाँ कई अच्छे फिल्मकार अच्छे अभिनय के लिए खुद अभिनेता बने और बेहतर किया। तिग्मांशु धुलिया अच्छे फिल्मकार तो है ही, इस फिल्म में उन्होंने हमें अपने अभिनय की क्षमताओं से रूबरू करवाया है। संभव है यह सिलसिला आगे भी जारी रहे। जो हो, फिल्म का दूसरा भाग पहले भाग का दोहराव प्रतीत होता है और कई बार तो बासी सा लगने लगता है। अंतर पीढ़ीगत बदलाव और खून-खराबे के तरीकों का है। दर्शक सबकुछ पहले से जानता है, लेकिन वह तो उसे परदे पर घटित होते हुए देखने के लिए परदे पर खिंचा चला आता है और खुद को ठगा सा महसूस करता है। इसका फायदा उठाते हुए फिल्मकार एक ही कहानी के लिए दो बार पैसा वसूलने में सफल रहते हैं। अन्यत्र कहीं कुछ नया है तो वह है – हास्य और रोमांच का मेल और यह मेल फिल्म में रूचि जगाता है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी और हुमा कुरैशी पर फिल्माए प्रणय-दृश्य ध्यान खींचते है। पहले भाग में सरदार खान और दूसरे भाग में फैजल खान पर फिल्माए दृश्य इसके अच्छे उदाहरण है। विशेषकर दूसरे भाग में। फिल्मकार ने छोटे से छोटे ब्यौरे पर गंभीरता से काम किया है। इससे न केवल शहर का परिवेश बल्कि वहाँ के रहवासियों के बीच के रिश्तों का व्याकरण भी खुलकर सामने आया है। इसमें भी अक्सर छोटे दृश्य वो काम कर जाते है जो कई लम्बे दृश्य मिलकर भी नहीं कर पाते। फिल्म में आए छोटे-छोटे ब्यौरे इसे प्रभावशाली बनाते हैं। फिल्मकार ने इसके लिए डेढ़ साल लम्बे शोध का भी दावा किया है। बात चाहे खदानों के लाइसेंस की हो या मछलीपालन की या खोखली खदानों के लिए रेत ढुलाई की। कई दृश्य तो अतार्किक और जबरन लगते हैं, जिनसे बचा जा सकता था। जैसे फिल्म में पहले तो बंगाली बाला दुर्गा खुद ही सरदार खान को सम्भोग के लिए न्यौतती है और फिर जब वह उसके किसी काम का नहीं रहता तो उसे मरवा देती है।
सन् 1940 से 1990 तक के समय को दर्शाते पहले भाग में वासेपुर में कोयला माफिया और संगठित अपराध की शुरूआत को दिखाया गया है तो दूसरे भाग में भ्रष्ट व्यवस्था (राजनीति और नौकरशाही की मिलीभगत) द्वारा की गयी लोकतंत्र की हत्या पर ध्यान केन्द्रित किया गया है, जिसके केंद्र में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया है, जहाँ हर तरह के अवैध व्यापारों के लिए स्थान है। सरदार खान और दानिश खान की हत्या के बाद फैजल खान मौर्चा पर आता है और अपने पिता और भाई के हत्यारों को चुन-चुन कर मारता है (उसके चरित्र में बदले और प्रेम में से किसकी अधिकता है, कहा नहीं जा सकता)। वही दूसरे भाग में रामधीर सिंह और सरदार खान की दुश्मनी को आगे बढाता है। उसके समय में मुनाफाखोरी और अवैध हथियारों का व्यापार तो चरम पर है। दूसरा भाग (1990 से 2009) भूमण्डलीकरण के प्रसार को दिखाता है। जहाँ मौकापरस्ती चरम पर है। हर कोई शक्तिशाली बनना चाहता है, शक्तिशाली की छाँव में रहना और उससे जुड़ना चाहता है। वासेपुर में मजदूर-अत्याचार और माफियागिरी चरम पर है तथा नेताओं की सरपरस्ती के कारण पुलिस भी डरी-सहमी रहती है। पहले भाग में सरदार खान कसम खाने के बावजूद रामधीर सिंह को मारता नहीं है, वहीं दूसरे भाग में फैजल अपने पिता के हत्यारे से समझौता कर लेता है। अपराध के क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम गठजोड़ सिर्फ माफियागिरी तक ही सीमित नहीं है बल्कि पूरी हिंदी पट्टी में व्याप्त यह गठजोड़ हमारे समय एक बड़ा सच है। ऐसी कई गुत्थियाँ फिल्म को जटिल बनाती है (फिर डेफिनेट (ज़ीशान कादरी), परपेण्डीकुलर (आदित्य कुमार) और टेनजेंट जैसे कॉमिक नामों का गणित चौंकाने वाला है) और ऐसे तथ्य फिल्म को एक राजनीतिक फिल्म का रूप देते हैं।
एक ओर तो फिल्म में सीधे टाटा और थापर जैसे कई बड़े नामों का उल्लेख किया गया है, जो व्यवसाइयों और अपराधियों के गठजोड़ को दिखाते हैं, तो दूसरी ओर घर पधारे सुलतान का अपनी पत्नी से परिचय करवाते समय रामधीर और उनकी पत्नी के बीच हुए मौन-संकेत-प्रसंग में निहित पति-पत्नी का कांईयापन और फिर भोजन के लिए चीनी मिट्टी वाले बर्तन का प्रसंग बिहार और झारखण्ड ही क्यूँ राजस्थान तक में आज भी एक सामान्य बात है। आप सब भूल सकते हैं पर जाति नहीं भूल सकते। सरदार खान के दोनों बेटों के साथ-साथ सुलतान के चाचा और भाई भी इसे समझ जाते हैं कि रामधीर सरदार के खिलाफ हमारा इस्तेमाल कर रहा है पर अफसोस कि मोटी बुद्धि का सुलतान इसे नहीं समझ पाता और अंततः दोनों पक्षों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है! महत्वाकांक्षा और मौकापरस्ती ने खुद के परिवार तक को न बख़्शा। सुलतान और दुर्गा दोनों ही अपनी-अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के कारण अपने ही परिवार की बर्बादी का कारण बनते हैं। फिर कोई सामान्य आदमी यूँ ही तो अपराधी नहीं बनता। शाहिद, सरदार और फैजल सामान्य आदमी हैं लेकिन परिस्थितियाँ उन्हें असामान्य बना देती है और फिर वे चाहकर भी सामान्य नहीं बन पाते। कोशिश करते हैं पर असफल रहते हैं। उनकी कमीनगी के भी कई किस्से हैं, जिन्हें परदे पर फिल्माने से पहले कड़ी चुनौतियों से गुजरना पड़ा होगा। इनके पीछे भी सैकड़ों कहानियां रही होगी! फिर आमजन की जरूरतों ने माफियाओं के अत्याचारों के बीच ही पेट पालने के नये रास्ते ईजाद कर लिए। अब मजदूर भी कोयले और लोहे की चोरी करने लगे। नतीतजन सरदार खान जैसे दुर्दांत माफियाओं तक को मछलियां पालनी पड़ी। इन सबके बीच जो खास खास बात है, वह है जीवन जीने की अपराधियों की मजबूरी, जो पूरी फिल्म पर छायी रहती है। अपराध उनके लिए शौक से अधिक जिंदा रहने की मजबूरी है। रामधीर सिंह जैसे सत्ता के दलाल जिस तरह अपना उल्लू सीधा करते हैं, वह रौंगटे खड़े करने वाला है। अपने हितों के लिए वह सरदार और सुलतान के परिवारों के बीच हुई संधि को फिर से जंग का रूप दे देता है। है।
आर्थिक परिस्थितियाँ सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों से संबद्ध होती है। इन्हें एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता और ये तीनों मिलकर एक मजबूत सांस्कृतिक संरचना का निर्माण करते हैं, जो फिल्म में काफी भयावह बन जाती है। फिल्म में दो बातें काफी निराश करती हैं। एक तो मुसलमानों की हिंसक प्रवृत्ति का चित्रण (चाहें तो आप इसे मुस्लिम सवर्ण (खान/पठान) और पसमांदा (कुरैशी/कसाई) के आचरणगत व्यवहार के प्रतीक रूप में भी देख सकते हैं, जिसमें एक नायक है और दूसरा खलनायक! हालांकि फिल्म के अनुसार पहले स्थितियां अलहदा थी, जहाँ कुरैशी दबाते थे और सब दबते थे।’ (जो किसी भी माने में हजम नहीं होती)
और दूसरा, स्त्री-पुरूष संबंधों के दृष्टिकोण से औरत को घर की दहलीज या देह तक सीमित करना। भोजपुरिया समाज घर के भीतर किस तरह बर्ताव करता है, इसे परदे पर देखना कमाल का अनुभव है। स्त्री-पुरूष संबंधों की दृष्टि से भी फिल्म प्रभावित करती है। पहले सरदार और फिर फैजल। दो पीढ़ियों के बीच समाज में काफी कुछ बदला है और उस बदलाव के चिह्न इसमें दिखाई पड़ते हैं। फिल्म औरत और मर्द के रिश्ते का एक नया व्याकरण रचती चलती है। इसका सीधा असर बच्चों पर पड़ता है। फैजल और डेफिनेट इसके अच्छे उदाहरण हैं। कुछ भी अवास्तविक नहीं है। पूरी फिल्म भी फिल्म और टी.वी. देखते हुए ही आगे बढ़ती है। टी.वी. धारावाहिक और फिल्म का इस्तेमाल काफी महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक हस्तक्षेप है। इसके बगैर फिल्म की कल्पना ही नहीं की जा सकती। फैजल की पत्नी तो पूरी तरह से फिल्ममें डूबी है। एक फिल्म को कई-कई बार देखने के लिए वो कितनी चिरौरियां करती है। सरदार के लिए गौरी का वजूद उसकी देह तक सीमित है। सरदार जब वापस अपने घर लौटता है तो वह उसके साथ घात करती है। इस घात की वजह हमारे सामाजिक ढाँचे में हैं, जिसकी अपनी एक सोची-समझी राजनीति है। फिर गाली-गलौज की भी तो अपनी राजनीति है। फिल्म में बहुत सी गालियां तो सीधे स्त्री की देह पर वार करती है, मानो उसे उसकी औकात बताती है! क्या बिना गाली-गलौज के वास्तविक फिल्म नहीं बनायी जा सकती? फिल्म के पोस्टर तक पर गालियाँ अनिवार्यतः मौजूद रही। इस लिहाज से स्त्रियों के देखने/सुनने लायक इसमें गालियों और सेक्स के अलावा कुछ नहीं हैं। स्त्री-चरित्रों, यथा – नगमा (रिचा चड्ढा) और गौरी (राइमा सेन) ने अपना काम किया है। पुरूषवादी फिल्म में स्त्री पात्रों के लिए अधिक करने को कुछ बचता नहीं है पर इसके बावजूद उसकी मर्जी के बिना कोई उन्हें छू नहीं सकता। गाँजे के नशे में डूबे फैजल गोलियां बरसाते समय किसी से नहीं डरता पर अपनी प्रेमिका/पत्नी से वह भी खौपजदा है, यही हालत उसके पिता की भी है। अभिनय के लिहाज से ये दोनों दृश्य उल्लेखनीय हैं। नगमा बाहर मुँह काला कराने वाले अपने पति को भी खूब खिला-पिलाकर भेजती है, ताकि वह शर्मशार होकर न लौटे। इसके विपरित स्त्री एक ओर तो राह चलते अपहृत और बलत्कृत होने के लिए अभिशप्त है, तो दूसरी जातिवादी मानस के कीचड़ को ढोने और चीनी बर्तनोंमें खान परोसने के लिए। बॉलीवुड से प्रभावित मोहसिना खुद को माधुरी से कम नहीं समझती और न उस फिल्मीपन से बाहर निकल पाती है। छोटे शहरों की गली-मौहल्ले में किस तरह धोखाधड़ी के जाल बुने रहते है, फिल्म इसे बखूबी दिखाती है। रात में वहाँ कोई सुरक्षित नहीं, औरतें तो बिल्कुल नहीं। सरदार खान को जन्म देकर मर जाने वाली माँ अंतिम समय में अपने पति (शाहिद खान) की उदासी भरी एक निगाह तक न पा सकी। पति की निगाह नवजात बच्चे (लड़के) पर है और अगर वह लड़की होती तो?
फिल्म तेज गति में चलती है, ठहरने/सोचने का मौका वह कम ही देती है। फिल्मकार की कोशिश हर पात्र के साथ न्याय करने की रही है। यह सत्य घटना पर आधारित एक यथार्थवादी फिल्म है, जिसमें कल्पना का अतिशय प्रयोग मिलता है। माफियाओं, राजनेताओं और नौकरशाहों की मिलीभगत आमजन के लिए त्रासद स्थितियाँ उत्पन्न कर देती है। अच्छी बात यह है कि फिल्म मुम्बइया फिल्मों के ग्लैमर और स्टारडम के आगे घुटने नहीं टेकती, बल्कि भारतीय लोक के साथ खड़ी होती है, भले ही वह अतियथार्थ ही क्यों न हो। फिल्म में आया कसाईखाने का दृश्य जुगुप्साजनक लगता है पर एक समाज ऐसा भी है जिसका जीवन उसी पर केन्द्रित है किंतु ऐसे दृश्यों की एक सीमा होती है। यह सच है पिछले कुछ दशकों में सामाजिक अराजकता और हिंसक अपराधों में खासी बढ़ोतरी हुई है। कई घटनाएं मनुष्यता पर से हमारे विश्वास तक को डिगा देती है। आज का अति-महत्त्वाकांक्षी, लालची और स्वार्थी आदमी मनुष्यता के सारे गुण खोता जा रहा है। मानवीय रिश्तों का गणित बिगड़ने लगा है। रामधीर सिंह का अंत बुरा ही होना था पर बावजूद इसके उसके लिए लम्बे हिंसक दृश्य की कोई जरूरत न थी। हालांकि कई जगह, विशेषकर सार्वजनिक स्थलों पर फिल्मांकन के दौरान फिल्मकार सचेत दिखलाई पड़े हैं। जमीन से उठे अपराधी सरदार खान को भी अंततः रिक्शा ही नशीब हुआ। रिक्शा यहाँ मेहनतकश मजदूरों का प्रतीक बन जाता है, जिसके जीवन में सिर्फ छलनाएँ ही छलनाएँ है। फिर सरदार जैसे अपराधी की मौत पर मनोज तिवारी द्वारा गाया जिया तू बिहार के लालाजैसे हिंसा और संगीत के सम्मिश्रित गीतात्मक प्रयोग काफी डरावना लगता हैं (भले ही फिल्म में उसके अंत को बिहार में अपराधियों में नायकत्व की खोज के अंतिम हिस्से के रूप में देखा गया हो। क्योंकि फैजल के अंत पर फिल्मकार ऐसे कोई संकेत नहीं देता)।
दो भागों में बनी करीब साढ़े पाँच घंटे की इस फिल्म में वरुण गोविल और पीयूष मिश्रा द्वारा लिखे पच्चीस गाने (पहले में चौदह और दूसरे में ग्यारह) हैं, जिन पर भोजपुरिया लोक की धमक साफ सुनाई देती है। फिल्म का संगीत स्नेहा खानवलकर ने तैयार किया है। वे जद्दन बाई, सरस्वती देवी और ऊषा खन्ना के बाद चौथी भारतीय महिला फिल्म संगीतकार है। इस फिल्म में उन्होंने खासतौर पर कैरेबियाई द्वीपों पर प्रचलित भोजपुरी लोकसंगीत (कैरेबियाई और भोजपुरी संगीत का मिश्रण, जिसे चटनी म्युजिककहा जाता है) को फिल्म में स्थान दिया है।हम हैं शिकारी, इतनी लंबी गन...इसका अच्छा उदाहरण है। पीयुष मिश्रा का लिखा "इक बगल में चाँद होगा, इक बगल में रोटियां..." फिल्म का आधार-गीत है। यहाँ चाँद और रोटी के प्रतीकार्थ बहुत दूर तक जाते हैं पर कोई ठहरे तो। "तार बिजली से पतले..." और "काला रे...", “ओ वूमनिया..” और आई एम ए हण्टर…” गाने नयापन लिए हुए हैं।सैंय्या काला रे...”, फ्रस्टरेटियाओ नहीं मोडा... जैसे गीत भरे-पूरे जीवन की लालसा को और अधिक गहराते हैं। कहानी की माँग को देखते हुए स्नेहा खानवल्कर ने प्रभावशाली पृष्ठभूमि संगीत तैयार किया है। लोक संगीत और पाश्चात्य संगीत की धुनों पर आधारित गाने कथानक को स्वाभाविक गति प्रदान करते है। अरसे बाद सिनेमा में हारमोनियम और ढोलक की ढेढ़ थाप सुनने को मिलती है। ऐसी ही मेहनत सिनेमैटोग्राफी में राजीव रवि और संपादन में श्वेता वैंकट ने की है। कोयले की खान में मारपीट, जैसे कई दृश्य बेहद प्रभावशाली है। शाहिद खान (जयदीप अहलावत), मनोज वाजपेयी (सरदार खान), नवाजुद्दीन सिद्दीकी (फैज़ल खान), ऋचा चड्ढा (नगमा खातून), राइमा सेन (गौरी) और पंकज त्रिपाठी (सुल्तान) ने बेहतर अभिनय किया है। फिल्म में जितना समय शाहिद खान पात्र के लिए जयदीप अहलावत को दिया गया, उसमें उन्होंने फिल्म को दृढ़ आधार प्रदान किया। उन पर फिल्माया प्रत्येक दृश्य अभिनय के लिहाज से फिल्म की बड़ी उपलब्धि है। मनोज वाजपेयी स्त्री-पुरूष संबंधों की नयी अभिनय-भाषा लेकर उपस्थित हुए हैं। नये जमाने के आशिक के रूप में नवाजुद्दीन सिद्दकी और हुमा कुरैशी को सबने पसंद किया। तिगमांशु धूलिया फिल्म की शुरूआत में चालीस साल की उम्र में नजर आते हैं और फिल्म के अंत में नब्बे साल की उम्र दिखाई देते है। इस बीच कई पीढ़ियों को वे अपने काईंयापन और कमीनगी का शिकार बनाते नजर आते हैं। शाहिद खान, सरदार खान और दानिश खान, ये तीन पीढियां उनकी साजिश का शिकार होती है। वे पहले तो क्रूर व चालाक माफिया और फिर शांत, संयत और घाघ नेता के रूप में परदे पर दिखाई पड़ते हैं। पचास साल के लम्बे आयु-अंतराल को परदे पर सफलतापूर्वक अभिनित करना आसान नहीं होता।
बेटा तुमसे हो नहीं पायेगा (सरदार खान), “उसे ये सब तो नहीं करना था” (फैज़ल खान) जैसे अनौपचारिक और अर्थपरक संवाद फिल्म को जीवंतता देते हैं। पीयूष मिश्रा के बोल गागर में सागर सरीखे हैं, हालांकि कहीं-कहीं ये वृत्तचित्र लगते हैं तो कहीं आपराधिक उपन्यास। गाली और गोली दोनों अनौपचारिक ढंग से सामने आती है - जब मन किया भौंक दी/चला दी। प्रस्तुतिकरण में फिल्मकार ने बने-बनाए फार्मूलों से दूर रहने की कोशिश की है, ताकि दर्शकों के कौतुहल को बनाए रख सके। कहानी भले ही नयी न हो पर प्रस्तुतिकरण नया है। बॉलीवुड में यथार्थपरक स‌िक्वल फिल्मों के लिहाज से यह प्रयोग खासा महत्त्वपूर्ण है। वैसे फिल्म अभी खत्म नहीं हुई है? सरदार खान का सौतेला बेटा डेफिनेट और रामधीर का बेटा अजय सिंह अभी जिंदा है। कुलमिलाकर यह अनुराग कश्यप की विशुद्ध व्यावसायिक फिल्म है, जो सत्तर और अस्सी के दशक की बीऔर सीग्रेड की अपराध फिल्मों की याद दिलाती है। बावजूद इसके हिंसा में मनोरंजन खोजने वाली इस फिल्म के कलाकारों ने फिल्म-अभिनय की ऊँचाईयों को छुआ है।
       संपर्क – डॉ. पुखराज जांगिड़, कालिंदी महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली। दूरभाष – 9968636833, ईमेल पता – pukhraj.jnu"@gmail.com



मूक आवाज़ हिंदी र्नल
अंक-7 (जुलाई-सितंबर 2014)                                                                     भूमण्डलीकृत हिंदी सिनेमा का अतियथार्थवादी चेहरा - डॉ. पुखराज जाँगिड़   ISSN   2320 – 835X
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