सोमवार, 24 नवंबर 2014

बाज़ारवाद, संस्कृति और राष्ट्र का तानाबाना: चेन्नई एक्सप्रेस - चारू गोयल

बाज़ारवाद, संस्कृति और राष्ट्र का तानाबाना: चेन्नई एक्सप्रेस - चारू गोयल

बाज़ारवाद, संस्कृति और राष्ट्र का तानाबाना: चेन्नई एक्सप्रेस
- चारू गोयल

चेन्नई एक्सप्रेस में बाज़ारवाद के दबाव में आकर उत्तर और दक्षिण का मिलाप तो हुआ है लेकिन यह भरत मिलाप नहीं बन पाया है जहां दोनों संस्कृतियां अपने-अपने पूर्वाग्रहों को परे रखकर सच्चे दिल से गलबाहीं कर पातीं। चेन्नई एक्सप्रेस में उत्तर और दक्षिण की संस्कृतियों के डिब्बे एक-दूसरे से जुड़े तो हैं लेकिन जोड़ और गांठ साफ नजर आती है। और यहीं बाज़ार की तमाम ताकत के बावजूद जातीय-सांस्कृतिक पूर्वाग्रह सांस्कृतिक समन्वय की ऊपरी सतह को फोड़कर बाहर फूट पड़ते हैं। यह फिल्म तो एक ऐसा पनीला रसम है जिसमें सहजने का फजी अलग तैर रही है और टमाटर की फांक अलग नजर आ रही है। यथार्थ और संवेदनशीलता को ताक पर रखकर नस्लीय पक्षपात के साथ सांस्कृतिक वैभिन्नय को यहां दिखाया गया है। यद्यपि 21 वीं सदी में कदम रखते-रखते हिंदी सिनेमा का कॉरपोरेटीकरण हो चुका है लेकिन प्रोफेशनल एथिक (पेशेगत नैतिकता-ईमानदारी) से वह अभी भी कोसों दूर है। हिंदी सिनेमा के लिए दक्षिण का मतलब आज भी मद्रासी ही बना हुआ है। इस भ्रामक मिथ को तोड़ने की कोई पहल भी यह फिल्म नहीं करती। तमिल संस्कृति को उसकी पूरी विविधता और प्रमाणिकता के साथ दिखाने की माथापच्ची से निर्देशक महोदय साफ बचते नजर आते हैं।


धुनिकता की पश्चिमी अवधारणा एकरूपता और समरूपता पर आधारित रही है क्योंकि जिस पश्चिमी राष्ट्र राज्य से इसकी उत्पत्ति हुई है, वह एक धर्म, एक संस्कृति, एक भाषा और एक नस्ल पर आधारित राष्ट्र राज्य है। लेकिन भारत जैसे बहुधर्मी, बहुसांस्कृतिक, बहुभाषायी और बहुनस्लीय राष्ट्र में यूरोपीयन आधुनिकता की एकांगिता और एकरूपता की अपनी सीमाएं और समस्याएं हैं। तर्क और भैतिक विज्ञान की सार्वभौमिक निष्पत्तियों में विश्वास करने वाली पश्चिमी आधुनिकता संविधान और संस्कृति की एकीकृत सांचाबद्धता को पूरे राष्ट्र राज्य पर लागू करने में विश्वास करती है जबकि भारतीय समाज की विविधता और विषमता की अवहेलना करके एक वर्णीय आधुनिकता के चश्मे से उसे देखना उसकी मूल प्रकृति के साथ अन्याय ही कहा जायेगा। धर्म, भाषा, नस्ल और संविधान की इकहरी पहचान पर आधारित राष्ट्रवाद भारत के संदर्भ में अप्रासंगिक और अव्यावहारिक रहा है। और इसीलिए साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन के समय से ही हमारे यहां विविधता में एकता का मूलमंत्र स्वीकृत रहा है। धर्म के आधार पर वतन का विभाजन होने पर भी हमने स्वयं को इस्लाम आधारित पाकिस्तान के जवाब में एक हिंदू राष्ट्र के रूप में परिभाषित करने की गलती नहीं की। आजादी के बाद से लेकर आज तक हम भाषा, धर्म, जाति और नस्ल के साथ-साथ संस्कृति के नाम पर हिंदुस्तान की राष्ट्रीयता को मिलने वाली चुनौतियों से पार पा सके हैं, तो उसका श्रेय हमारे दूरदर्शी कर्णधारों को जाता है जिन्होंने विविधताओं का पूरा सम्मान करते हुए और विषमताओं के निवारणार्थ सकारात्मक विभेद की नीतियां अपनाते हुए पंथ निरपेक्षता के सिद्धांत के आधार पर भारतीय लोकतंत्र की नींव रखी थी। लेकिन संविधान में अल्पसंख्यक समुदायों और संस्कृतियों के संरक्षण और विकास का जो वायदा किया गया है, वह नब्बे के बाद आरंभ हुए बाज़ारवाद और वैश्वीकरण के इस वर्तमान दौर में पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। बाज़ारवाद में जहां संस्कृति भी एक पण्य वस्तु बन चुकी है, वहां बहुसंख्यक या मुख्यधारा की आर्य संस्कृति के लिए अपने उपभोक्ताओं का संख्याबल और क्रय क्षमता फायदे का सौदा साबित हो रहा है। बाज़ार जहां इन संस्कृतियों के प्रचार-प्रसार का माध्यम है, वहीं वह उन्हें नियंत्रित-अनुरूपित कर उपभोक्तावाद के अश्वमेध अश्व को खुला सांड बन उपभोक्ताओं की जेब चट कर जाने का अवसर भी मुहैया कराता है। किंतु दूसरी ओर अल्पसंख्यक और गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली बीपीएल संस्कृति बाज़ार के लिए कोई महत्व नहीं रखती। दूसरी ओर बहुसंख्यक संस्कृति बाज़ार के रथ पर सवार अल्पसंख्यक संस्कृतियों को कुचलने या उन्हें पृष्ठभूमि में धकेल देने का जाने-अनजाने प्रयास करती रहती है।
भारतीय राष्ट्रवाद, संस्कृति और नब्बे के साथ आये वर्तमान बाज़ारवादी दौर के बीच हिंदी सिनेमा के बदलते चरित्र की प्रतिनिधि फिल्म है - चेन्नई एक्सप्रेस। लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष संविधान के आदर्शों की बाध्यता और विविधतामूलक सिनेमाई दर्शकों के बाज़ार के दबाव के बीच ऐतिहासिक कारणों से हिंदी सिनेमा का चरित्र समावेशी रहा है। यह भारत का राष्ट्रीय सिनेमा होने का दावा करता आया है। विविधताओं के बीच समन्वय का जो आदर्श लोक स्थापित करके तुलसी अपने लोकधर्म का पालन करते हैं, उसी लोक को जोड़ने का महत्ती कार्य हिंदी सिनेमा करता आया है। परस्पर वैभिन्नता और यहां तक कि वैमनस्यता रखने वाले विभिन्न संप्रदायों और समूहों को एक प्लेटफॉर्म पर लाने की गुरू जिम्मेदारी हिंदी सिनेमा उठाता आया है। हिंदू-मुस्लिम, ग्रामीण-शहरी, सवर्ण-अवर्ण, अमीर-गरीब, देशी-विदेशी और युवा-बुजुर्ग, इन सबको एक गुलदस्ते में सजाकर दर्शकों को सहृदय बनाते हुए उनका मनोरंजन करना ही हिंदी सिनेमा का मूलभूत चरित्र रहा है। लेकिन इस समन्वय के प्रयास में कई बार चीजों का सरलीकरण कर दिया जाता है और कई बार निर्माता-निर्देशक-अभिनेता के जातीय पूर्वाग्रह भी फिल्म विशेष पर हावी हो जाते हैं। और कभी-कभी भाषा की सीमा या पूंजी की सत्ता उस गंगा-जमुनी संस्कृति के प्रवाह के सामने अवरोधक दीवार बनकर खड़ी हो जाती है। उत्तर और दक्षिण को जोड़ने वाली दुतरफा सेतु बनने में हिंदी सिनेमा प्रायः हाल-फिलहाल तक ज्यादा सफल नहीं हो पाता था क्योंकि एक तो तमिल प्रदेश का डीएमके प्रेरित-संचालित हिंदी विरोधी चरित्र दक्षिण में हिंदी फिल्मों के प्रदर्शन में वैध-अवैध अड़ंग्गे लगाता रहा है और दूसरे, आर्य-द्रविड़ संस्कृतियों का परस्पर पूर्वाग्रह और अलगाव भी हिंदी सिनेमा के दक्षिणागमन में रूकावतें डालता रहा है। इसीलिए एक दूजे के लिए’ (1981) और पड़ौसन’ (1968) जैसी फिल्मों को छोड़ दें, तो बड़े पर्दे पर से दक्षिण की संस्कृति प्रायः ओझल ही रही है। लेकिन नब्बे के बाद ज्यों-ज्यों राजनीति और बाज़ार में उत्तर-दक्षिण के बीच की दूरियां सिमटने लगी हैं, वैसे-वैसे हिंदी और तमिल सिनेमा के बीच मैत्री भी परवान चढ़ती जा रही है। हां, यह अलग बात है कि अभी यह मैत्री बराबर के स्तर पर नहीं आई है। परस्पर एक-दूसरे को लेकर पूर्वाग्रह अभी भी जीवित हैं। लेकिन फिर भी हिंदी सिनेमा तमिल संस्कृति और वहां के तमिल सिनेमा के प्रति अपने रिश्तों में गर्माहट लाने लगा है। तमिल और अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों का बड़ा सिनेमा बाज़ार हिंदी सिनेमा को अपनी ओर ललचा रहा है। तमिल संस्कृति और तमिल सिनेमाई संस्कारों से आबद्ध दक्षिण के सिने दर्शकों को आकर्षित करने के लिए हिंदी सिनेमा लोकप्रिय तमिल सिनेमा के लटकों-झटकों तक को आगे बढ़कर गले लगा रहा है। ओम शांति ओम (2007), ‘सिंघम् (2011), ‘राउडी राठौड़ (2012), ‘रावन (2010) और डर्टी पिक्चर (2011) की श्रृंखला में अब चेन्नई एक्सप्रेस (2013) एक प्रतिनिधि नाम बन चुका है। हिंदी और तमिल जातियों की भाषाओं और संस्कृतियों को जोड़ने वाली चेन्नई एक्सप्रेस बाज़ारवादी नवउदारीकरण की बहुसंस्कृति की अवधारणा को हिंदी सिनेमा का सलाम कहा जा सकता है।
फिल्म का नायक उत्तर भारतीय रोहित है जिसका मुंबई में हलवाई की मिठाई का पैतृक कारोबार है जबकि नायिका मीनाम्मा ठेठ तमिल लड़की है। महानगर में दुकानदारी जैसे बाज़ार संबद्ध व्यवसाय से जुड़े होने के कारण रोहित फिल्म में आधुनिक महानगरीय युवक के रूप में दिखाया गया है जिसे कुलमिलाकर अपनी संस्कृति से नॉस्टेलियाई लगाव नहीं है। इसके उलट नायिका मीनाम्मा तमिल सभ्यता-संस्कृति में रची-बसी परंपरागत दक्षिण भारतीय पोशाक में नजर आती है। फिल्म की कहानी मुंबई से प्रारंभ होकर वाया चेन्नई एक्सप्रेस रामेश्वरम् तक जाती है। फिल्म का फिल्मांकन मुन्नार और कोडाइकनाल में किया गया है। तमिलनाडु और दक्षिण की प्राकृतिक भूदृश्यावली फिल्म का एक आकर्षण रही है। सथ्याराज और मनोरमा जैसे तमिल सिनेमा के मंजे हुए कलाकारों को इसमें लिया गया है। तमिल शब्दावली न केवल कोड मिश्रण के स्तर पर है बल्कि बहुधा पूरे के पूरे संवाद तक बिना हिंदी उल्था के तमिल में ही दे दिये गये हैं। कथकली और दक्षिण के स्थानीय लोनृत्यों का कॉलाज सा फिल्म में है। तमिल के महानायक रजनीकांत को पूरा सम्मान देते हुए फिल्म के अंत में एक आइटम गीत-नृत्य लुंगी डांसउन्हें ही समर्पित है। तमिल सिनेमाई षैली की अतिनाटकीय मारपीट के दृश्यों से लेकर तमिल मंदिर का एक पूरा सिक्वेंस तक फिल्म में रखा गया है। वासत्व में पूरी फिल्म ही तमिल सिनेमा के सांचे में ढली हिंदी फिल्म बन गयी है। नायिका मीनाम्मा का पिता एक मद्रासी डॉन है जिसके आतंक के सामने उत्तर भारतीय सींकिया नायक डर से थरथर कांपता है। दक्षिण और उत्तर की परस्पर भिन्न भाषाओं और संस्कृतियों का अलगाव, अपरिचय और गलतफहमियां हास्य का सृजन करती हैं। लेकिन भाषा और संस्कृति का यह अंतर उत्तर और दक्षिण का मेल-मिलाप होने से नहीं रोक पाता। फिल्म में हिंदी सिनेमा नायक-नायिका के बीच संवाद की कड़ी के रूप में आता है। हिंदी सिनेमा के पुराने गानों और संवादों के माध्यम से उत्तर और दक्षिण की भाषाओं का, संस्कृतियों का और नायक-नायिका को संयोजन हो जाता है। मीनाम्मा और रोहित के मंडपम (विवाह) की स्वीकृति मीनाम्मा के अप्पा गॉडफादर द्वारा दी जाना मानों दक्षिण की संस्कृति द्वारा अतीत के गिले-शिकवों को भूल उत्तर की संस्कृति को गले लगाना है।
चेन्नई एक्सप्रेस में बाज़ारवाद के दबाव में आकर उत्तर और दक्षिण का मिलाप तो हुआ है लेकिन यह भरत मिलाप नहीं बन पाया है जहां दोनों संस्कृतियां अपने-अपने पूर्वाग्रहों को परे रखकर सच्चे दिल से गलबाहीं कर पातीं। चेन्नई एक्सप्रेस में उत्तर और दक्षिण की संस्कृतियों के डिब्बे एक-दूसरे से जुड़े तो हैं लेकिन जोड़ और गांठ साफ नजर आती है। और यहीं बाज़ार की तमाम ताकत के बावजूद जातीय-सांस्कृतिक पूर्वाग्रह सांस्कृतिक समन्वय की ऊपरी सतह को फोड़कर बाहर फूट पड़ते हैं। यह फिल्म तो एक ऐसा पनीला रसम है जिसमें सहजने का फजी अलग तैर रही है और टमाटर की फांक अलग नजर आ रही है। यथार्थ और संवेदनशीलता को ताक पर रखकर नस्लीय पक्षपात के साथ सांस्कृतिक वैभिन्नय को यहां दिखाया गया है। यद्यपि 21 वीं सदी में कदम रखते-रखते हिंदी सिनेमा का कॉरपोरेटीकरण हो चुका है लेकिन प्रोफेशनल एथिक (पेशेगत नैतिकता-ईमानदारी) से वह अभी भी कोसों दूर है। हिंदी सिनेमा के लिए दक्षिण का मतलब आज भी मद्रासी ही बना हुआ है। इस भ्रामक मिथ को तोड़ने की कोई पहल भी यह फिल्म नहीं करती। तमिल संस्कृति को उसकी पूरी विविधता और प्रमाणिकता के साथ दिखाने की माथापच्ची से निर्देशक महोदय साफ बचते नजर आते हैं। तमिल जातीयता के नाम पर तमिल सिनेमा द्वारा प्रस्तुत बाजारू सरलीकरण को ज्यों का त्यों इस हिंदी फिल्म में उठाया गया है। तमिल के नाम पर घिसी-पिटी भद्दी अवधारणाओं, फॉर्मूलों और भ्रमों को लेकर चलने वाली इस फिल्म में निर्देशक सांस्कृतिक सौहार्द्र और समन्वय स्थापित करने के अवसर चूक गया है। आज के जिस दौर में पहचान और प्रतिनिधित्व की राजनीति बहुत महत्वपूर्ण हो चुकी है, वहां इसप्रकार की बड़ी फिल्म में तमिल संस्कृति को भ्रामक और फूहड़ ढंग से प्रस्तुत करना अन्य संस्कृतियों के प्रति वर्चस्वशील आर्य संस्कृति का अलोकतांत्रिक नजरिया ही कहा जायेगा। फिल्म का कथानक उत्तर भारतीय आर्य संस्कृति की उन परंपरागत रूढ़ मान्यताओं पर पुनः बल देता है जो जुगुप्साजनक है। मद्रासियों को पूरे दक्षिण का प्रतिनिधि मानने वाले उत्तर भारतीय इस धारणा से आमतौर पर ग्रस्त हैं कि दक्षिण के लोग श्याम वर्ण के होते हैं और श्याम वर्ण राक्षसी सभ्यता-संस्कृति का परिचायक है। दक्षिण के विपरीत उत्तर के लोग स्वयं को दैवीय गौर वर्ण का मालिक मानते आये हैं। चेन्नई एक्सप्रेस न केवल इस भ्रांत धारणा का पोषण करती है अपितु रंग-रूप को लेकर इन काले-कलूटे भयावहदिखते मद्रासियों का मजाक भी बनाती है। फिल्म में नायिका और उसके पिता को छोड़कर प्रायः शेष मद्रासी पात्रों को काली चमड़ी का और भद्दे-फूहड़ चेहरे-मोहरे वाला बताया गया है। विशेषतः नायिका के डॉन पिता के गुंडों को। नायक रोहित ट्रेन में इन लोगों के चेहरों और भाव-भंगिमाओं की हास्यास्पद चिढ़ाऊ नकल उतारकर अपनी असभ्यता का ही परिचय देता है।
रंग के बाद भाषा तमिल और आर्यों में दूसरा भेदक तत्व रही है। तमिल भाषी लोगों का त्रुटिपूर्ण हिंदी उच्चारण सदैव से हिंदी सिनेमा के लिए सस्ते मनोरंजन का मसाला बनता आया है। तमिल पात्रों की हिंदी चेन्नई एक्सप्रेस में भी अपने उच्चारण की विचित्रता को लेकर हिंदी भाषी नायक के लिए चिढ़ का विषय बनती है गोया वह स्वयं संस्कृतनिष्ठ शुद्ध हिंदी ही बोलता हो। वास्तव में जब आज की वैष्विक दुनिया में अंग्रेजी के एकरूप सटीक उच्चारण पर भी बल नहीं दिया जाता अपितु स्थान विशेष की अंग्रेजी की अपनी विशिष्ट षैलियां विकसित हो गयी हैं जो अंग्रेजी को समृद्ध ही बना रही हैं। तब ऐसे में हिंदी के प्रति तमिल हिंदी के संदर्भ में हिंदी सिनेमा वालों का यह शुद्धतावादी रवैया सिर्फ पाखंड और अव्यावहारिक ही कहा जायेगा। फिल्म में तमिलभाषियों की हिंदी का स्वागत करते हुए उसे प्रोत्साहित न करके उसका उपहासात्मक स्वांग प्रस्तुत किया गया है। नायक रोहित नायिका मीनाम्मा और उसके पक्ष के लोगों के हिंदी उच्चारण को बोकवासमानकर नकल करते हुए व्यंग्य करता है। हिंदी को अगर विश्वभाषा और राष्ट्रभाषा बनना है, तो शुद्धतावादी कट्टरपन छोड़कर अपना हृदय उदार बनाना होगा। भाषा के साथ-साथ मद्रासियों का खानपान भी इस उत्तर भारतीय आर्य नायक को नहीं पचता। सुबह उठते ही मद्रासी लोगों को ट्रेन में इडली-डोसा-भात ढकोसते देख हमारे इस नायक की आंखें खुली की खुली रह जाती है। मिठाई की हलवाईगिरी-दुकानदारी के पुष्तैनी पेशे के वारिस नायक की इस मद्रासी सादे खाने को लेकर व्यक्त घिन्न का अपना वर्गीय पहलू भी है।
तमिल समाज के चरित्रहनन की स्थिति वहां के समाज में महिलाओं की स्वतंत्रता और इज्जत को लेकर भी देखी जा सकती है। नायिका मीनाम्मा एक तमिल लड़की है। वह बालिग है और अपनी जिंदगी का फैसला स्वयं करने में यकीन रखती है। लेकिन उसका गॉडफादर बाप उसकी इच्छा के विरूद्ध अपने एक बाहुबली मित्र के लड़के टंगबली से उसका मंडपम करना चाहता है ताकि वह अपने इलाके में और भी ज्यादा बड़ी ताकत बन जाये। दक्षिण की इस मद्रासी लड़की को वहां के इस पितृसत्तात्मक समाज की बेड़ी से आजाद कराने का श्रेय उत्तर भारतीय आर्य नायक रोहित को दिया गया है। इसप्रकाइसप्रकार दक्षिण भारतीय समाज स्त्रियों के प्रति क्रूरता बरतने वाला व्यंजित होता है और उत्तर भारतीय नायक उनका तारणहार! रोहित का संदेश है कि हमें स्वाधीनता दिवस नहीं मनाना चाहिए क्योंकि हमारे समाज में स्त्री स्वतंत्र नहीं है। रोहित का सामना टंगबली जैसे पहाड़काय दक्षिण भारतीय मद्रासी से कराया जाता है जो मद्रासी पितृसत्ता की दैहिक ताकत का प्रतीक है। स्त्री सम्मान  और स्वाधीनता का हितैशी नायक इस महाबली पितृसत्ता के हाथों पीटा जाकर भी मीनाम्मा का साथ नहीं छोड़ता। मद्रासी मीनाम्मा द्वारा तमिल टंगबली को नकारकर रोहित का वरण करना आर्य नायक की विजय और सफलता का सूचक है। किंतु सवाल यह है कि क्या उत्तर भारतीय आर्य पितृसत्ता मातृ सत्तात्मक द्रविड़ संस्कृति की तुलना में स्त्री के प्रति तनिक भी सहृदय रही है?
फिल्म में आये लगभग सारे तमिल पात्रों को अपराधी समुदाय के सदस्यों के रूप में दिखाना हिंदी भाषी क्षेत्र में रोजगार आदि के कारण रहने वाले प्रवासी तमिलों के प्रति नकारात्मक सोच को जन्म देने वाला है। पहले भी दयावान (1988) जैसी हिंदी फिल्मों में तमिल गॉड फादर को अपराध जगत का बेताज सरगना दिखाया गया है। हिंदी सिनेमा के ये रूढ़ तमिल अपराधी चरित्र भी इस फिल्म में उपहास के पात्र बनकर अपनी गंभीरता और प्रभाव क्षमता खो बैठे हैं। हास्य का सृजन करने के लिए उनकी नकल और आंगिक प्रहसन को जरिया बनाया गया है।
वास्तव में रूढ़ीबद्ध घिसे-पिटे पात्र समस्या का मूल नहीं कहे जा सकते। इन पात्रों को लेकर भी मानवीयता और सद्भावना का पाठ तैयार किया जा सकता है। ऐसे पात्रों के पाखंड पर किया जाने वाला व्यंग्य रचनात्मक हास्य का हेतु बन सकता है। हिंदी की कई फिल्मों में राष्ट्रीय एकता और गंगा-जमुनी संस्कृति की अभिव्यक्ति ऐसे ही सांचे में ढले पात्रों का माध्यम बनाकर होती आयी है। परस्पर एक-दूसरे से गले मिलते, एक-दूसरे के त्यौहारों में शरीक होते ये पात्र उम्मीद जगाते हैं। भारतीय प्रायद्वीप के लोगों में अंतःस्तर पर जो एकता विद्यमान है, उसके व्यंजक वे धार्मिक-आध्यात्मिक प्रतीक ही हैं जो उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक व्याप्त है। यहां की पवित्र नदियां, मंदिर-मस्जिद-गुरूद्वारे और तीर्थ स्थल वह तंत्र बनाते हैं जिसमें राष्ट्र की आत्मा सांस लेती है। वैसे इस धार्मिक एकता की व्यंजना भी इस फिल्म में हुई है। रोहित के दादाजी की अस्थियों का एक हिस्सा गंगा में विसर्जित किया जाना था और दूसरा शेष हिस्सा रामेश्वरम् के समुद्र में। गंगा और रामेश्वरम् का यह धार्मिक-आध्यात्मिक रिश्ता हिंदी और तमिल जातियों के बीच तमाम विविधताओं के नीचे विद्यमान आध्यात्मिक एकता की दुहाई देता है। और रामेश्वरम् जाकर अपने दादाजी की अस्थियों का विसर्जन करने के कर्तव्य की पालना में उत्तर भारतीय नायक की प्रेरक और सहायक बनती है दक्षिण भारतीय नायिका।  
लेकिन बाज़ारवाद के लिए धर्म, अध्यात्म और धार्मिक पर्व भी अपनी विपणन नीति का एक हिस्सा बन गये हैं। हर बड़े धार्मिक त्यौहार के अवसर पर विशेषतः ईद और दीपावली पर त्यौहार की खुशियों को बॉक्स ऑफिस पर भुनाने के लिए हिंदी फिल्मकार अपनी फिल्मों के प्रदर्शन की तारीखें तय करते रहे हैं। चेन्नई एक्सप्रेस भी इसी बाज़ारवादी रणनीति के तहत ईद के पावन मौके पर सिनेमाघरों में उतारी गयी जिसका आर्थिक फायदा इस फिल्म को हुआ भी। फिल्म के कथानक में तमिल प्रदेश के एक मंदिर की पूरी रस्म का प्रसंग भी रखा गया है। और इसके साथ ही गंगा और रामेश्वरम् जैसे हिंदू धार्मिक प्रतीकों की चर्चा है। रामेश्वरम् का मंदिर भी फिल्म में आता है। लेकिन बाज़ारवाद से इतर हटकर इन चीजों को देखा जाये तो फिल्म हिंदू-मुस्लिम सौहार्द्र को भी अप्रत्यक्ष तौर पर बढ़ावा देती है। ईद एक मुस्लिम त्यौहार है लेकिन इस अवसर पर प्रदर्शित फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस हिंदू धार्मिक स्थलों और प्रतीकों को अपने कथानक का हिस्सा बनाती है। वैसे यहां मुस्लिम और हिंदू, दोनों दर्शकों को संतुष्ट करने का बाज़ारवादी प्रबंधन भी देखा जा सकता है।
आज के नवउदारवादी दौर के हिंदी सिनेमा में बाज़ारवाद किस कदर हावी है, इसकी एक प्रमाणिक बानगी चेन्नई एक्सप्रेस है। फिल्म में उपभोक्ता वस्तुओं के विपणन को साफ पकड़ा जा सकता है, चाहे इन्हें कथानक और छायांकन का हिस्सा बनाकर कितना ही तर्कसंगत ठहराने का दुस्साहस निर्देशक करता रहे। कल्याण रेलवे स्टेशन के बाहर कैमरा Bailley Water का विज्ञापपन वाला बड़ा सा कटआउट हमें दिखाता है। इससे पहले तेंदुलकर की क्रिकेटर छवि को भी हमें दिखासा जाता है। रोहित बने शाहरूख द्वारा तीन बार नोकिया के एक विशिष्ट मोबाइल फोन की मॉडल संख्या और उसकी कीमत बताना तो स्पष्टतः बाज़ारवाद के आगे फिल्म का हथियार डाल देना ही कहा जायेगा। वास्तव में चेन्नई एक्सप्रेस जैसी हास्य फिल्म करते-करते शाहरूख जैसे बड़े अभिनेता स्वयं हास्यास्पद त्रासदी बन जाते हैं।
तमिल संस्कृति और मलयालम अभिनेत्री दीपिका पादुकोन को भुनाकर चेन्नई एक्सप्रेस तमिलनाडु और केरल जैसे गैर हिंदी भाषी राज्यों के हिंदी विरोधी सिनेमाई बाज़ार में सेंध लगाने में सफल हो गयी है। चेन्नई और उसके आसपास के शहरी इलाकों तक सिमटा हिंदी सिनेमा का बाज़ार अब दूर-दराज के तमिल और मलयालम क्षेत्रों तक पहुंचने लगा है। इंटरनेट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस फिल्म ने अपने प्रदर्शन के आरंभिक 18 दिनों में यहां 8.55 करोड़ का व्यवसाय किया है। यह दक्षिण में किसी भी हिंदी फिल्म की सफलता से कहीं ज्यादा है। फिल्म की सफलता के लिए तमिलनाडु में अभिनेता शाहरूख खान ने आक्रामक प्रचार किया था और मीना हंटजैसी प्रतियोगिताओं का आयोजन तक किया गया। अभिनेता का निर्मात बन स्वयं फिल्म के प्रचार में उतरना 21वीं सदी के सिने बाज़ार में कला और बाज़ार के बीच बढ़ती नजदीकियों का ही सूचक है।    
पुरानी बोतल में नई शराब - पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में ब्रांड एक पण्य वस्तु की जैसे बेचा जाता है। वैसे भी कॉरपोरेट फिल्म निर्माण उद्योग में मौलिकता के लिए कोई स्थान नहीं होता। घाटे-मुनाफे का अंक गणित सिनेमा व्यवसायियों को सृजनात्मक उड़ान भड़ने का खुला आस्मां मुहैया नहीं कराता। सफलता के सिद्ध हो चुके फॉर्मूलों को लेकर निर्देशक उन्हें नये ढंग से दोहराने वाला यांत्रिक निर्माता मात्र बनकर रह जाता है। निर्देशक रोहित शेट्टी आर्थिक सफलता को ही फिल्म की सफलता का एकमात्र मानदंड मानते हैं। और इस फिल्म में उन्होंने नायक शाहरूख खान की सिनेमाई छवि को ही ब्रांड के रूप में भुनाने का प्रयास किया है। और नई बोतल में बाज़ार में उतारी गई इस पुरानी शराब (फिल्म) को कीर्तिमान तोड़ सफलता भी मिली है। शाहरूख खान की फिल्मोग्राफी बेचती यह फिल्म व्यक्तिपूजा की भारतीय मानसिकता को दूहने में पूरी तरह सफल रही है। लेकिन बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई इस फिल्म में शाहरूख खान अभिनय की नई ऊंचाइयां छूना तो दूर, अपना पुराना स्तर भी बरकरार नहीं रख पाये हैं। हिंदी सिनेमा का यह डूबता हुआ सूरज अपने पुराने दिनों के नॉस्टेलिजिया में स्वयं को दुहराने को अभिशप्त रहा है। जिसप्रकार उपभोक्त कंपनियां उपभोक्ता माल की गुणवत्ता से अधिक उसकी पैकेजिंग पर बल देती है, वैसे ही निर्देशक ने शाहरूख की पुरानी सफल फिल्मों के गीतों, संवादों और पात्रों आदि को चेन्नई एक्सप्रेस में नई साज-सज्जा के साथ दर्शक उपभोक्ताओं के सामने परोसा है। शाहरूख के सिनेमाई मिथक पर ही फिल्म में नक्काशी की गई है। शाहरूख की सिनेमाई नायक की छवि को आम आदमी की मुहर के साथ फिल्म में प्रस्तुत किया गया है। आम आदमी पार्टी की बढ़ती लोकप्रियता और आम आदमी के आंदोलन को मिल रहे व्यापक मीडिया कवरेज के कारण आम आदमी का मुहावरा आज राजनीति के साथ-साथ जनमानस में पुनः चल पड़ा है। फिल्म में रोहित का चरित्र इसी आम आदमी की दुहाई देता है कि इस आम आदमी के महत्व को कमतर करके न आंका जाये। लेकिन दूसरी ओर रोहित बने अभिनेता शाहरूख अपने नायकत्व की विशिष्टता को पुरानी सफल फिल्मों की स्मृति दिलाकर बारंबार स्थापित करने का प्रयास करते हैं। इसप्रकार फिल्म आम और खास का द्वंद्व पैदा करके अपने दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहती है। निर्देशक इस द्वंद्व का सृजनात्मक उपयोग करना चाहता तो यह फिल्म एक मील का पत्थर साबित हो सकती थी लेकिन यह द्वंद्व न किसी प्रकार का तनाव सृजित कर पाता है और न दर्शक को सोचने पर विवश करता है। निर्देशक तो बस शाहरूख को चाहने वालों को फिल्म में अपना शाहरूखहोने की संतुष्टि देकर आम आदमी की दुखती रग को भी साथ में सहलाकर अपना उल्लू सीधा करता नजर आता है। शाहरूख की रोमांटिक नायक की छवि को आम आदमी के फ्रेम में प्रस्तुत करने की इस सिनेमाई प्रबंधन नीति के तहत ही फिल्म में शाहरूख का व्यक्तित्व दुबले-पतले डरपोक व्यक्ति का रखा गया है जो पेशे से मिठाईवाला हलवाई है। फिल्म में वह अपने विरोधियों का सामना करने के स्थान पर भागता नजर आता है। वह चुलबुल पांडेय या सिंघम् भी हो सकता था लेकिन ये दोनों छवियां एक तो शाहरूख नामक इस सिने ब्रांड के साथ मेल नहीं खातीं और फिर चुलबुल पांडेय या सिंघम् बनकर वह आम आदमी के साथ तादात्म्य नहीं कर पाता। पुराने सफल गीतों और उनकी पैरोडी के बीच शाहरूख का रोमांटिक व्यक्तित्व आम आदमी की ताकत को सहलाने में सफल रहा है।
इसप्रकार चेन्नई एक्सप्रेस शाहरूख की छवि का अनुकरण करती है लेकिन अरस्तू के शब्दों में यह केवल शाहरूख की प्रतीयमान छवियों, गीतों और संवादों का ही अनुकरण है। अनुकरण के संभाव्य और आदर्श रूप इसमें नहीं दिखाई देते। अतः अनुकरण का अर्थ यहां सृजनात्मकता का व्यंजक न रहकर मात्र नकल तक सीमित रह जाता है। पूंजीवादी युग में कला जब यांत्रिक पुनरूत्पादन मात्र बनकर रह जाये तब कलाकार भी सृजक न रहकर प्रबंधक व्यवस्थापक मात्र बनकर रह जाता है। और ऐसा प्रबंधक पुरानी मिठाइयों को तो नयी प्रस्तुति के साथ बेचने में सफल हो सकता है, लेकिन वह कोई नयी मिठाई या नयी मौलिक कलाकृति प्रदान करने में असफल रहता है। आज चेन्नई एक्सप्रेस जैसी फिल्मों की व्यावसायिक सफलता कला और सृजन की कीमत पर सिद्ध होती है किंतु मरणासन्न पूंजीवादी युग का उत्तरआधुनिक दर्शन किसी मौलिकता का दावा भी नहीं करता।
पश्चिम के एक अन्य कला चिंतक लांजाइनस ने उदात्त कला के मार्ग में तीन दोषों की चर्च की है जो आडंबर की संस्कृति की देन हैं। ये तीन दोष होते हैं - शब्दाडंबर, भावाडंबर और बालेयता (पंडिताऊपन)। कला में आडंबर की यह तुच्छता सामंती वैभव-प्रदर्शन की दिखाऊ मानसिकता से संबद्ध रही है। आज सामंतवाद गुजर चुका है और पूंजीवाद का दौर है। लेकिन अप्सरा पूंजी पर टिका आज का यह अनुत्पादक पूंजीवाद मानवीय उद्यमशीलता से बहुत दूर जा चुका है। सर्वहारा और मध्यवर्ग के श्रम पर पलने वाला यह पूंजीवादी काला धन जब कॉरपोरेट घरानों के मार्ग से हिंदी सिनेमा में आने लगता है, तो पूंजी के आधिक्य के कारण सामंती आडंबर के तीनों दोष हिंदी के व्यवसायिक सिनेमा में भी दिखाई देने लगते हैं। चेन्नई एक्सप्रेस इन्हीं आडंबरों का कलात्मक उत्पाद है। अभिनेता शाहरूख के सफल गीतों और संवादों का अनियंत्रित प्रयोग पूरी फिल्म में व्याप्त हैं। इन गीतों और संवादों से फिल्म को सजाने के चक्कर में फिल्म में बड़बोलापन आ गया है। अभिव्यक्ति और वाणी की यही कृत्रिमता भावों की अनियंत्रित अतिशय प्रस्तुति में भी देखी जा सकती है।  वैसे तो हिंदी सिनेमा का मेलोड्रामिक चरित्र वाणी और भाव की अतिशयता का बेहूदगी का शिकार रहा ही है लेकिन यहां तो ज्यों का त्यों पुरानी फिल्मों से ढेर सारे तत्व उठा लिये गये हैं। रहा तीसरा आडंबर अर्थात् किसी विषय पर अपनी विद्वता का प्रदर्शन, तो इस दोश से भी फिल्म अछूती नहीं रह पायी है। फिल्म तमिल संस्कृति की प्रमाणिक प्रस्तुति का दावा करते नहीं अघाती। तमिलनाडु के विभिन्न स्थलों पर फिल्मांकन से लेकर तमिल सिने कलाकारों के चयन आदि की पृष्ठभूमि में यही उद्देष्य कार्यरत रहा है। किंतु तमिल संस्कृति का सम्मान करने के स्थान पर उसकी प्रस्तुति में अपरिपक्वता साफ नजर आती है। चाहे कथकली नृत्य के दृष्य हों या मंदिर रस्म या स्थानीय तमिल गायकों की नकल हो, सर्वत्र बालेयता (बचकानापन) जाहिर हो जाता है। प्रमाणिकता और गंभीरता के अर्जन हेतु जिस साधना पथ पर चलना होता है, उस पर चलने का धैर्य और समय आज की भागदौड़ वाली दुनिया में किसी के पास नहीं है और सिनेमा भी इसी गतिशील दुनिया का अंग है।  
संपर्क - चारू गोयल, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली। चल-दूरभाष - 8876515201, ईमेल पता - charugoel84@gmail.com


मूक आवाज़ हिंदी र्नल

अंक-7(जुलाई-सितंबर 2014)                                                                            बाज़ारवाद, संस्कृति और राष्ट्र का तानाबाना: चेन्नई एक्सप्रेस - चारू गोयल     ISSN   2320 – 835X
Website: https://sites-google-com/site/mookaawazhindijournal/
 




उत्तर-आधुनिक स्त्री-विमर्शी काव्य की प्रवृत्तियाँ - डॉ. रेनू यादव






हिंदी कवयित्रियों की लेखन प्रवृत्तियों के माध्यम से स्पष्ट है कि यह आधी आबादी की आधी आबादी के लिए चुनौती है। इस कविता की मैंशैली में आधी आबादी स्वतः ही एकसूत्र में बंध जाती है। कवयित्रियाँ समता, स्वतंत्रता और सद्भभावना आदि प्रजातांत्रिक मूल्यों की माँग के साथ-साथ अपनी अस्मिता स्थापित करना चाहती हैं, अथवा दूसरे शब्दों में कहें तो वे अपने पैरों के नीचे की ज़मीन के साथ-साथ अपनी पहचान चाहती हैं। अब वे अन्या और उपेक्षिता शब्द को खारिज करते हुए सत्ता के रणक्षेत्र में उतर आयी हैं अथवा कुरूक्षेत्र के युद्ध में बिना हथियार उठाये लड़ रही हैं तथा पुरूष मानसिकता को बदलने का निरंतर प्रयास कर रही हैं।
  
 ब औरत किसी आदमी के नाम से जुड़ी जमीन नहीं,
उसकी जिन्दगी सिर्फ उसकी है यही उसके जीवन का मूलमंत्र है
हथियार के बल पर और कब तक होगी सभ्यता की खरीद-बिक्री।
असमानता की जटा उधेड़कर नारी खोज रही है समता का सूत,
अब वह समझ गयी है कि उसका जीवन सिर्फ उसी का है,
उसी के लिए है[1]
            
स्त्री के विषय में उसके सुख-सुविधाओं से लेकर प्रत्येक समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सूक्ष्म से सूक्ष्मतम् चिंतन-मनन कर अस्वस्थ दृष्टिकोणों को स्वस्थता प्रदान करना ही स्त्री-विमर्श है।
स्त्री-विमर्श एक ज्वलंत मुद्दा है, किंतु हिन्दी साहित्य के इतिहास में स्त्री-लेखन की चुप्पी ने सुमन राजे को आधी आबादी के लिए हिन्दी साहित्य का आधा इतिहासलिखने हेतु विवश कर दिया। तब सामने आया कि स्त्री-लेखन की एक अविच्छिन्न धारा निरंतर प्रवाहित होती रही है, किंतु पुरूषवर्चस्ववादी इतिहास में उसे अपना स्थान प्राप्त ही नहीं हुआ। स्त्री-विमर्श के मुद्दे ने 60-70 के दशक में एक आंदोलन का रूप ले लिया। स्त्री-विमर्श ने उदारवादी, कट्टरपंथी, मनोविश्लेषणवादी, समाजशास्त्रीय एवं मार्क्सवादी आदि धाराओं से गुजरते हुए उत्तरआधुनिक युग में एक नया ही रूख ले लिया है। उसने अपनी पूर्ववर्ती धाराओं की विचारधारा से सीख लेकर स्वयं को परिमार्जित एवं परिष्कृत किया तथा जो अवधारणाएँ स्त्री-हित में थीं, उन्हें खुले मन से अपनाया है।
सिमोन द बोउवार की मान्यता - स्त्री स्त्री पैदा नहीं होती, स्त्री बना दी जाती है को उत्तर आधुनिक नारीवाद ने समझा तथा उदारवादी नारीवाद की जीवशास्त्रीय समानताओं एवं विषमताओं को समझते हुए अपना कदम आगे बढ़ाया। उग्र या कट्टरपंथी नारीवाद के इमेजेज ऑफ विमेनके सिद्धांत अर्थात् विवाह और मातृत्व से मुक्ति से उत्तर-आधुनिक नारीवाद सहमत नहीं है। शुलमिथ फायरस्टोन के गर्भ जैसे फिजूल अंग को काटकर फेंकनेजैसे विचारों का यह घोर विरोधी है। यह मानता है कि स्त्री-पुरूष एक दूसरे के पूरक हैं इसलिए विवाह, मातृत्व और परिवार सृष्टि के विकास में सहायक हैं, न कि बाधक। मनोविश्लेषणवादी नारीवाद के अंतर्गत यह नारीवाद लिंग की अवधारणाओं को तोड़ता है तथा स्त्री की निष्क्रियता को खारिज करता है तथा इरिगेरे के सेक्स संबंधी सिद्धांतों से सहमती रखता है, मार्क्सवादी और समाजवादी नारीवाद के श्रम तथा अर्थ के सिद्धांतों का यह हृदय से स्वागत करता है और अपनी अनुभूतियों को ठोस तथा स्थिर रूप प्रदान करता है।
          उत्तर-आधुनिक प्रमुख कवयित्रियाँ तथा काव्य कृतियां निम्नलिखित हैं
          अनामिका बीजाक्षर, अनुष्टुप, खुरदुरी हथेलियाँ। अनीता वर्मा एक जन्म में सब। कविता वाचक्नवी मैं चल तो दूँ। कात्यायनी सात भाइयों के बीच चम्पा, इस पौरूषपूर्ण समय में, जादू नहीं कविता। निर्मला गर्ग कबाड़ी का तराजू। नीलेश रघुवंशी घर निकासी, पानी का स्वाद। नेहा शरद  ख़ुदा से ख़ुदा तक। प्रभा खेतान सीढ़ियाँ चढ़ती हुई मैं, कृष्णधर्मा मैं, अहल्या। रमणिका गुप्ता   खूंटे, मैं आज़ाद हुई हूँ। स्नेहमयी चौधरी   पूरा गलत पाठ, अपने खिलाफ। सविता सिंह अपने जैसा जीवन, नींद थी और रात थी। सुनीता जैन   हो जाने दो मुक्त, कौन सा आकाश। सुनीता बुद्धिराजा   अनुत्तर। सुमन राजे उगे हुए हाथों के जंगल। सुशीला टाकभौरे यह तुम भी जानो, तुमने उसे कब पहचाना आदि।
      इन कवयित्रियों के काव्य का अध्ययन करने के पश्चात् निम्नलिखित प्रवृत्तियाँ स्पष्ट होती हैं 

1. अस्तित्व-बोध, अस्मिता की तलाश एवं स्थापना -
        
यदि अस्मिताका अर्थ आत्म-प्रतिष्ठाको लें, अपनी जागृत चेतना में प्रतिष्ठा, स्वयं विचार सकने की योग्यता और उसके अनुसार जीवनयापन करने की सामर्थ्य, तो कहा जा सकता है कि समाज में लगभग हम सभी अनात्म-प्रतिष्ठा, अस्मिता-विहीन ही अधिकांश होते हैं- अन्धेन नीयमाना यथांधा’”[2]
किंतु कवयित्रियों ने अस्तित्व-बोध की सजगता के कारण काव्य में महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। वे पुरूषवर्चस्ववादी सत्ता से मुक्त होकर स्वतंत्र जीवनयापन की इच्छुक हैं। अस्मिता बोध से ज्ञान और ज्ञान से आत्मविश्वास में वृद्धि के साथ वे घर, समाज और साहित्य में अपनी अस्मिता की तलाश करती हुई दिखाई देती हैं।
अपने-आप से पूछा है
मैंने
बार-बार
क्यों मैं हमेशा
अपने होने का प्रमाण
ढ़ूँढ़ती हूँ ?”[3]
X   X  X  X  X
मैं अपनी पहचान तक जाना चाहती हूँ
अपनी आत्मा तक
अपनी अस्मिता तक जाना चाहती हूँ मैं[4]
स्त्री का न तो कोई अपना घर है, न ही ज़मीन। उसकी पहचान उसके पिता, पति और पुत्र से होती है। सदियों से बनी ऐसी पहचान की नियति को कवयित्रियाँ तोड़ देना चाहती हैं
अपनी कल्पना में हर रोज/एक ही समय में स्वयं को/हर बेचैन स्त्री तलाशती है/घर प्रेम और जाति से अलग/अपनी एक ऐसी जमीन/जो सिर्फ उसकी अपनी हो/एक उन्मुक्त आकाश/जो शब्द से परे हो/एक हाथ/जो हाथ नहीं/उसके होने का आभास हो[5]
डॉ. दर्शन पांडेय के अनुसारअस्मिता वह नहीं जो अतीत को नकार कर केवल वर्तमान में जीने की प्रेरणा देती है। जहाँ गुजरा हुआ क्षण मैंकी सत्ता को जगाता है और आने वाले क्षण उसे पैनाते हैं, इसके विपरीत अस्मिता वह है जो मानव संबंधों की पहचान कराती है, पुरातन को जीर्ण-शिर्ण मानकर उसके त्याग को ही आधुनिक-बोध कहने में गर्व में नहीं तनती और प्रकृति के आनन्त्य में एकता के सूत्र खोजती है[6]
कवयित्रियाँ घर के चूल्हे-चौके तथा पुरूषों द्वारा मूल्यांकित मालजैसे संकुचित दृष्टिकोणों का विरोध कर पुरूषवर्चस्ववादी सत्ता से संघर्ष करती हुई दिखाई देती हैं तथा वे प्रमाणित करती हैं कि उनकी लड़ाई पुरूष वर्ग से नहीं बल्कि पुरूषवर्चस्ववादी मानसिकता से है। ब्रा बर्निंगजैसी घटना पुरूष जैसा बनने के लिए नहीं बल्कि उनकी सत्ता के प्रति गहरे आक्रोश के कारण घटी। एडलर के शब्दों में अधिकार भावनाके कारण घटी। वे पुरूषों की नकल करके नहीं बल्कि अपने गुणों तथा आत्मविश्वास के बल पर अपनी अस्मिता स्थापित करना चाहती हैं - अस्मिता में अस्तित्व बोध प्रधान रहता है। जबकि अस्तित्व में विद्यमानता का भाव स्पष्ट रूप से अनिवार्य है, जो वस्तु अथवा प्राणी इस दृष्टि में विद्यमान है, उसी का अस्तित्व स्वीकारा जा सकता है, और जिसका अस्तित्व होगा उसकी अपनी एक पहचान अवश्य होगी[7]
आज गंगा को अवतरित करने के लिए
शंकर की दरकार नहीं है।
गंगा खुद उतर आएगी धरती पर[8]

2. प्रजातांत्रिक मूल्यों की माँग
कवयित्रियों ने प्रत्येक प्राणी के हित में स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा की स्थापना करने की दृष्टि से समाज से निःसंकोच इन प्रजातांत्रिक अधिकारों की माँग की है। स्वतंत्रता और अस्मिता की जरूरत को यदि मुख्य माना जाएगा तो स्वतंत्रता की पहली अनिवार्यता होगी आत्म-संपन्नता और दायित्वबोध, स्वतंत्रता जीवन में मिले या पन्नों पर उसका एहसास जगाया जाए... इसका एक यही अर्थ निकलता है। आत्मसंपन्न व्यक्ति अपना अधिकार स्वयं कमा लेता है और दायित्व के प्रति सजग होता है[9]
कमल कुमार हिंसा का सार्वभौम समाजशास्त्र और मानवाधिकारों का स्त्री लेखननामक लेख में लिखती हैं – “किसी भी सामाजिक व्यवस्था में व्यक्ति की प्रतिष्ठा की पहली शर्त होती है उसकी स्वतंत्रता। स्वतंत्रता प्रतिफलित होती है आत्मसंपन्नता और भीतरी मूल्यवत्ता से[10] परंतु स्त्री की भीतरी मूल्यवत्ता का कभी मूल्यांकन नहीं हुआ। इसलिए ममता कालिया कहती हैं
क्या ये कभी अपनी तरह जीने की
आज़ादी पायेंगी
या इसी तरह आदर्शों के पुराने लत्ते
सीने-पिरोने में खप जायेंगी” ![11]
कवयित्रियों ने श्रम, शिक्षा, अर्थ, समाज, राजनीति एवं लेखन स्तर पर पुरूषों से समानता की इच्छा व्यक्त की है -उसका मृत्युदिवस अज्ञात है मेरे लिए/जैसा मेरा जन्मदिवस अज्ञात है[12]
ऐसी अज्ञानता के अंधकार में इन्होंने स्त्री-सशक्तिकरण का दीप प्रज्वलित किया है। डॉ. ऋषभदेव शर्मा के अनुसार, “स्त्री सशक्तीकरण का यह अभियान इस आकांक्षा से संचालित है कि समाज के सभी क्षेत्रों में स्त्री के अस्तित्व को मनुष्य के रूप में स्वीकृति प्राप्त हो। स्त्री और पुरूष की ऐसी समानता की व्यावहारिक प्रतिष्ठा आवश्यक है जिसमें स्त्री अन्या, द्वितीयक गौण, उपेक्षिता, अनुगामिनी या अनुचर नहीं, अनिवार्य और सहचर की भूमिका में हो[13]
किंतु सहचर की भूमिका से दूर चारपाई के चौसठ इंच पर पड़े-पड़े वह सोचती है
        एक समय हम/अंतहीन आकाश लिए बाँहों में/सोचा करते/कितना थोड़ा है यह भी बंधने को/आज चारपाई के चौसठ इंच/हमारे जीवन की गति/बाँध गये हैं बंदीगृह से[14]
स्त्री के भाग्य-विधाताओं की सत्ता लोलुपता अनेक रोक-टोक के साथ मानसिक शोषण के साथ-साथ शारीरिक शोषण करना नहीं भूलती। वे तो इस शोषण को प्रेम अथवा अपना अधिकार समझते हैं किंतु स्त्री की विवशता और मानसिक स्थिति अत्यंत दयनीय होती है। अधिकृतता के पीछे छिपी निर्दयता को बड़े ही मार्मिक ढ़ंग से व्यक्त करते हुए नेहा शरद कहती हैं
बँधा-बँधाया-सा हिसाब है ज़िन्दगी का
मन मिले ना मिले
रोटी के लिए
ये तन तो देना होगा
इच्छा हो या ना हो
साथ सोना मजबूरी है
यहाँ से निकलूँगी तो पता नहीं
फिर कहाँ जाऊँ
हर नये दिन के डर से
हर रात की बात माननी ही है
क्या करूँ मेरा धन्धा ऐसे ही चलता है[15]
            
स्त्रियों ने ऐसी जिन्दगी को अपना भाग्य तथा शोषक पुरूषों को अपना भाग्य-विधाता मान लिया तथा उसी में अपनी खुशियाँ ढ़ूँढ़ने लगीं। लेकिन जब उन्हें अत्याचारों और अपमानों की सच्चाई का पता चला तब उन्होंने मात्र अपने पति या पिता से ही नहीं बल्कि आधी दुनियाँ की हकीकत पुरूष-सत्ता से भी प्रश्न पूछा
इस घर में/एक सर्वहारा का जीवन जीते हुए/मैंने परिश्रम को ही माना पारिश्रमिक/तुम मेरी जगह होते/क्या करते सातों दिन श्रम/सुबह शाम के अनवरत क्रम/बिना अवकाश/बिना वेतन[16]
एलीनोर रूज़वेल्ट के अनुसार, “कोई भी आपकी इज़ाजत के बग़ैर आपको हीन (छोटा महसूस नहीं करा सकता[17]
अतः कवयित्रियों ने सहना बंद कर बोलना शुरू किया। इनके काव्य की सबसे अच्छी विशेषता यह रही कि वे मात्र नारी समाज के लिए ही नहीं बल्कि समाज के प्रत्येक शोषित-पीड़ित वर्ग के लिए चिंतित हैं तथा प्रत्येक के लिए मानवीय अधिकारों की माँग के साथ समता, स्वतंत्रता तथा सद्भभावना आदि मूल्यों की स्थापना करना चाहती हैं। सविता सिंह के अनुसार
बनाओ वैसा एक मकान/जिसमें हम सब रह सकें साथ/कोई भी न रहे अलग अकेले/छूटे किसी मामूली वजह से/छोटेपन से अपने/या फिर/बचने के लिए किसी फसाद से/कोई हो अपंग इस वजह से/या फिर कमज़ोर इसलिए भी[18]

3. स्वानुभूति एवं मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति
कवयित्रियों ने अपने काव्य में स्वानुभूति के माध्यम से स्त्री की व्यथा कथा को सहज ही कह दिया है। चूँकि इनकी सीमा-रेखा घर की चौखट तक रही, घर के अंदर चौका-बर्तन से लेकर परिवार का पालन-पोषण ही इनका संसार रहा,  इसलिए अधिकतर अनुभूतियाँ घर से जुड़ी हैं तथा जिन कवयित्रियों ने घर से बाहर कदम रखा उन्होंने नए मूल्यों एवं पुराने मूल्यों के बीच घर, बाहर एवं भीतरी संसार को रचने का प्रयास किया हैं। इनकी अपनी स्वानुभूति समस्त नारी जगत की अनुभूति का प्रतिनिधित्व करती हैं। इनकी पीड़ा और संवेदना समस्त नारियों की पीड़ा और संवेदना की छूती हैं। ये प्रबुद्ध कवयित्रियाँ जिन समस्याओं का उल्लेख करती हैं वे अधिकतर सांस्कृतिक संदर्भ की है जिनसे जीवन यथार्थ प्रभावित होता ही है। लेकिन अब से व्यापक संदर्भ की, मेहनतकश और कामगार नारियों के आर्थिक सामाजिक और इनसे भी गहरे यौन-शोषण की समस्याओं के संबंध में अपनी रचनाओं में संवेदनशीलता के नए आयाम रच रही हैं[19]
यौन-शोषण जैसे घृणित अपराध के पश्चात् स्त्री की व्यथा का प्रतिनिधित्व करते हुए निर्मला पुतुल अपराधियों से प्रश्न पूछते हुए कहती हैं
            कैसे मिटा पाओगे/मेरी यातनामय गूंगी चीत्कार/क्या करोगे क्रूर नजरों और नजरानों का/निपट अकेले जूझ रही हूँ जिनसे/मेरी नाभी में उठते शूल को? मन सिंहासन पर विराजमान/इंसाफ मांगती स्त्री के उठते/बलात्कारिक सवालों को/कैसे मिटा पाओगे?”[20]
इनकी संवेदना प्रत्येक शोषित, पीड़ित, बच्चे, बूढ़ों और भिखारियों से भी जुड़ती हैं। ये कवयित्रियाँ जानती हैं कि स्त्रियाँ मूक होकर अपने कर्तव्य में रत् रहती हैं, लेकिन इनकी चुप्पी के पीछे शोषण के विरूद्ध आग जलती है। एक कामगार स्त्री की शक्ति का परिचय देते हुए स्त्री-शक्तिमें सुनीता जैन लिखती हैं
औरतें जब चढ़ती हैं एक-एक सीढ़ी,/सर पर छह ईंटे रख,/गर्भ में पलते शिशु को/सँभालती, सँभल-सँभल/वे नारा लगा रही होती हैं/शोषण के प्रतिपक्ष में निस्वर।
औरतें लड़ती हैं अपनी लड़ाई/प्रतिदिन अपने-अपने स्तर पर,/वे नहीं बाँचती स्त्री शक्ति का/एक भी आखर ![21]
स्त्री पुरूष के अत्याचार से पीड़ित पति के अतिरिक्त एक मात्र सहारा वह अपने पुत्र में ढ़ूढ़ती है। वह भूल जाती है कि पुरूष सत्ता में पलने-बढ़ने के कारण उसका पुत्र भी सत्ता की मानसिकता लिए बढ़ेगा। उसके पास पुत्र एकमात्र ऐसा हथियार होता है जिसके माध्यम से वह अपने समस्त अत्याचार का बदला ले लेना चाहती है। वह सोचती है कि पुत्र ही उसे न्याय प्रदान करवायेगा तथा उसकी देख-रेख के साथ उसे समाज में ससम्मान स्थापित करने का प्रयास करेगा। किंतु पुत्र अपनी आकांक्षाओं की उड़ान में मां के साथ सामंजस्य न स्थापित कर पाने के कारण माँ को प्रताड़ित करने लगता है। माँ की रोक-टोक उसे अपनी प्रगति में बाधक दिखायी देने लगती है। किंतु माँ की ममता की डोर खुशी-खुशी हर व्यथा सह लेने को तैयार होती है।
तुम्हें हक़ है कि मुझे सताओ
तुम्हें हक़ है कि मुझे तड़पाओ
तुम्हारी वजह से मैं चीखी हूँ, चिल्लाई हूँ
रात-रात जगी हूँ, करवट भी न लेने पायी हूँ
तुम्हें हक़ है मेरे बच्चे
सिर्फ इसीलिए कि मैं तुम्हारी माँ हूँ” ?[22]
कवयित्रियों की चीख और संवेदनाएँ संपूर्ण साहित्य जगत् में मौन बनकर पसरी रहीं, परंतु उत्तरशती में आकर उनकी चीख शब्दजाल को तोड़कर सहज ही काव्य में व्याप्त हो गई। उन्हें आशा है कि भविष्य में मौन और चीख, दोनों को सही स्थान प्राप्त होगा तथा उनकी संवेदनाओं का सहृदय स्वागत होगा, आज भले ही ये चीख बेवस टहल रही हैं लेकिन इनका अपना महत्व हैं, इन्हें अवश्य अधिकार प्राप्त होगा -
            ये किसकी चीख की तरह पसरे हैं जंगल ?/एक चीख मेरे भी भीतर दबी है!/उसका बस चले अगर तो/मेरी पसलियाँ तोड़ती निकल आए बाहर!/ये चीख मेरी आदिवासी रूप सी की तरह/अब तक किले के तहखाने में/टहल रही है बेबस।[23]   

4. व्यक्ति-सत्य एवं समष्टि-सत्य
           शांति का रूप विशाल है.../और ये चुप्पी/लघुता का अहसास लिए है/बिन बोले सब बयान करती है/बंद मुँह से/सारे भेद खोलती है/ये वो खामोशी भी नहीं/जो अपने में भाव भरे हैं/सिर्फ एक बन्द जुबान है/जिसे शर्म आती है/अपनी ही बात फ़ाश करने में[24]
जीवन में व्यक्ति तभी तक लघुता का एहसास लिए जीवित रह सकता है जब तक वह व्यक्ति सत्य को हीन भावना से देखे। किंतु जब लघुता का एहसास अधिकार भावना से जुड़ जाता है तब व्यक्ति-सत्य एक अहम् मुद्दा बन जाता है। व्यक्ति-सत्य अहम् मुद्दा बनने के पश्चात् ही स्त्रियों ने चुप्पी तोड़ी उसे मूल्यों से जोड़कर अपनी पीड़ा, छटपटाहट को सर्वजन हिताय में समाहित कर दिया।
          दूर तक सदियों से चली आ रही परंपरा में/उल्लास नहीं है मेरे लिए/कविता नहीं/शब्द नहीं/शब्द भले ही हो रोशनी के पर्याय रहे हों औरों के लिए/जिन्होंने नगर बसाये हों/सभ्यताएँ बनायी हों/युद्ध लड़े हों/शब्द लेकिन छिपकर/मेरी आँखों में धुँधलका ही बोते रहे हैं/और कविता रही है गुमसुम/अपनी अपरिचित असहायता में/छल-छद्म से बुने जा रहे शब्दों के तंत्र में/इन नगरों के साथ निर्मित की गयी एक स्त्री भी- जिसकी आत्मा बदल गयी उसकी देह में[25]
देह से ऊपर उठकर स्त्री अपनी देह की प्राकृतिक संरचना से पुरूष वर्ग को चुनौती देने लगी। पुरूष सत्ता के पाखण्डी स्त्रियों को निष्क्रिय समझते रहे, किंतु स्त्रियों ने अपनी देह और गुणों के नैसिर्गिक बल से पुरूषों के षड़यंत्र को निष्फल किया। उन्होंने मात्र अपना दृष्टिकोण बदलने के बजाय पूरे समाज का दृष्टिकोण बदलना अधिक श्रेयस्कर समझा। व्यक्ति सत्य ही समष्टि सत्य है  को महत्व देते हुए भी व्यक्ति सत्यके अतिरिक्त समष्टि-सत्यभी कुछ है, इसे भी समझा तथा दोनों को अपनाया। किसी भी आंदोलन की सफलता समष्टि-सत्य को समझे बिना नहीं हो सकती। कवयित्रियों ने समष्टि-सत्य में से खामियों को बिलगाते हुए अच्छाइयों में व्यक्ति-सत्य को समाहित कर आंदोलन को एक नया रूप दिया है, साथ ही स्त्री-पुरूष सहित समस्त समाज को समता के धरातल पर एक साथ रखकर सृष्टि के विकास में सहायक बनना ही सर्वोपरि सत्य माना। पहचाननामक कविता में सुनिता बुद्धिराजा कहती हैं
मैं तुम्हारा सत्य हूँ
तुम्हारी ही आभा
पहचान कर देखो
मैं तुम्हारा नाम हूँ
अस्तित्व तुम्हारा
मानकर देखो
मैं, तुम हूँ
तुम, मैं हो
यही हमारा अस्तित्व है[26]

5. रूढ़ि-विरोध और धर्म, नैतिकता, परंपरा व इतिहास का नई दृष्टि से मूल्यांकन
महापुरूषों के महाजाल में
मेरा बौना व्यक्तित्व फँसा था
अस्तित्व के कै टके
सवाल अब यह उठा था[27]
प्रत्येक कवयित्रियों ने रूढ़ि-विरोध के साथ-साथ धर्म, नैतिकता, परंपरा और इतिहास में छिपे बुराइयों का विरोध किया है। पुरूषों द्वारा सृजित धर्म, नैतिकता आदि ने स्त्री के पैरों में स्वर्ग-नरक तथा पाप-पुण्य की बेड़ियाँ लगा दीं, जिसके कारण स्त्री का अस्तित्व खतरे में पड़ गया। इसलिए ममता कालिया कहती हैं
           तुमने मिथक का इतिहास मिलाया/उसमें धर्म का छौंका लगाया/और चूहा मार दवा सा मेरे गले के नीचे उतार दिया।/मैं जीने लगी वेद, पुराण और मनुस्मृति।/मुझे सीता, सावित्री, उमा और अनुसूया की तरह बनना अधिक भाया।/मैंने शकुंतला जितना जोखिम भी नहीं उठाया,/लक्ष्मीबाई को मैंने चेतना से हकाल दिया।/विरोध का विचार तक जेहन से निकाल दिया।/मैं परम्परा के सुरक्षाचक्र में समा गई/नेतृत्व की जगह मैंने समर्थन चुना/और केन्द्र की जगह नेपथ्य।/संवाद की जगह सहमति ने ले ली।/सत्या की जगह मैं प्रियंवदा बन गई।/मैं सीता की तरह सताई जाने को सौभाग्य समझने लगी/पार्वती की तरह/मैं बौड़म पुरूषों को परमेश्वर मान बैठी/गुमनामी और गुलामी/मुझे गले गले डुबोती गई/मैं फिर भी नहीं चेती/जड़ता के आनंद में जी भर कर लेटी। कालिया, ममता खाँटी घरेलू औरत पृ. 88
धर्म, नैतिकता, इतिहास एवं परंपरा के विरोधी स्वरों में ममता कालिया, रमणिका गुप्ता, सुशीला टाकभौरे का स्वर बुलंद हुआ, किंतु सुनीता जैन जैसी कवयित्रियों ने धर्म, नैतिकता आदि को स्त्री की पराधीनता में साधक नहीं माना। इसके अतिरिक्त अनामिका और कात्यायनी आदि कवयित्रियों ने समन्वयवादी मार्ग को प्रश्रय दिया कि साहित्य सदैव कई-कई धाराओं को साथ लेकर चलता है। इसलिए जो बुरा है उसे अलग कर अच्छाई को अपना लेना चाहिए।
रमणिका गुप्ता और सुशीला टाकभौरे के मन में धार्मिक ग्रंथ जैसे वेद, पुराण, मनुस्मृति, महाभारत, रामायण के प्रति गहरा आक्रोश है कि देवी कहे जाने वाली पौराणिक स्त्रियों का अस्तित्व देवताओं के कारण खतरे में रहा, इसलिए किस प्रकार इन धर्मग्रंथों को महत्व दिया जाय? ‘खुंटेनामक काव्य संकलन में रमणिका गुप्ता लिखती है
कहते हैं
मेरे पिता ब्रह्मा ने
मेरे रूप-यौवना से आकर्षित हो
मुझी से ब्याह रचा लिया था।
बस
शास्त्र मुझे मायाकहने लगे
और पिता चूँकि पुरूष था
वह ब्रह्मा ही बना रह गया[28]

सीता जीवनपर्यंत परीक्षा देती रहीं, अहिल्या के साथ कुकर्म इन्द्र ने किया परंतु श्राप अहिल्या को मिला। पतिव्रता, त्याग, बलिदान के नाम पर उन्हीं धर्म ग्रंथों के सहारे स्त्री को उन्हीं जैसा बनने की सलाह दी जाती है। अतः सदियों से चली आ रही परंपरा स्त्री की जकड़न बन गई।
दूसरी ओर सुनीता जैन, कात्यायनी और अनामिका आदि कवयित्रियों ने सीता, सति, सावित्री, दुर्गा आदि देवियों को स्त्री-विमर्श की प्रथम नायिका माना है। क्योंकि दुर्गा ने दुष्टों का संहार किया, सति ने अपने पिता का विरोधकर यज्ञकुण्ड में स्वयं को भस्म कर दिया, सीता ने राम का विरोध कर धरती में समा जाना उचित समझा तो सावित्री ने यमराज से अपने पति को छीन लिया। इसलिए ये नारियाँ शक्ति की परिचायक हैं। स्त्रियों को चाहिए कि जो चीजें उन्हें पराधीन बनाए उसे तोड़ दें तथा जिनसे वे प्रगति कर सकती हैं उन्हें अपना लें। सत्य, शील, सेवा-शुश्रुषा, कर्तव्य-परायणता आदि का सम्मान करते हुए अपने लिए बने घातक बन्धनों का खण्डन कर दे। सुशीला टाकभौरे के अनुसार
कब मिलेगा पशुतुल्य मानव को
अधिकार
कब बदलेंगे कर्मकाण्ड
कब मिलेगा सामाजिक न्याय
पूछो उससे
अन्यथा
कर दो उसके टुकड़े-टुकड़े[29]
      
6. पितृसत्ता एवं लैंगिक वर्चस्व का विरोध
            पैदा होते ही/मेरी मैंमर जाती है। और रह जाती है एक लाश/एक नारी।/पुत्री से बहन और बहू तक की यात्रा तय कर/माँ की मंजिल पर पहुँचते-पहुँचते/मैं कई बार मर लेती हूँ /और किसी न किसी के कंधे पर/ढ़ोयी जाती रही हूँ[30]
पितृसत्ता में स्त्री संपत्ति की भाँति किसी न किसी पुरूष के नाम से जीवित होती है। पुत्री, बहन, पत्नी और माँ के रूप में उसकी पहचान तो होती है किंतु वह स्वयं कौन है अथवा उसका अपना नाम क्या है ? इसका पहचान उसे स्वयं नहीं हो पाता। किंतु संपत्ति की अवधारणा समझ में आने के पश्चात् उसका अदृश्य अस्तित्व समाज के पटल पर प्रत्यक्ष आने के लिए तड़फड़ा उठा। अतः सुनीता बुद्धिराजा उच्छ्वासप्रकट करते हुए कहती हैं
क्योंकि तुम
मुझे नाम नहीं दे सकते
हे पिता !
मैं आकाश के इस अनंत विरान में
घनदामिनी-सी
छटपटाती हूँ[31]

पिता से अपनी पहचान न मिलने का कष्ट तब और बढ़ जाता है, जब माता-पिता अपनी ही संतानों में भेद-भाव करने लगते हैं। खान-पान, घर का कामकाज, शिक्षा, नौकरी आदि में पुत्र सफलता के शिखर पर पहुँच जाता है, परंतु पुत्री असफलता के उच्च  शिखर को टटोलती कहीं दूर से आ रहे भाइयों के प्रकास को टुकुर-टुकुर देखती रहती है।
                                        
कैसा बना ये अपना, बेगाना-सा
दिल पर अपना हाथ रखकर मुझको ये समझाना
साथ खेले, साथ पढ़े
साथ बढ़े
ये क्यूं कर हुआ कि मैं हुई अलग
और वो हुआ जुदा [32]

माता-पिता से अपने बच्चों को सबसे अधिक न्याय की आशा होती है किंतु आशा टूट जाने पर जीवन का प्रत्येक मोड़ नीरस लगने लगता है। वह विवाहोपरांत पति में भी पिता का भय देखने लगती है तथा पति भी उसी सत्ता का प्रतिनिधि होने के कारण पत्नी से प्रेम करने के नाम पर जोर-जबरदस्ती करने में नहीं चूकता। मैरो वेश्या और विवाहिता में समानता-असमानता दर्शाते हुए कहती हैं – “एक वेश्या और एक विवाहिता में सिर्फ एक ही अंतर है, वैसे दोनों ही अपने को पुरूष के हाथों बेच देती हैं। अंतर केवल क़ीमत और समझौते की अवधि का है। दोनों के लिए रति-क्रीड़ा एक प्रकार की सेवा है[33]
         बंधा-बँधाया-सा हिसाब है ज़िन्दगी का/मन मिले ना मिले/नये दिन के डर से/हर रात की बात माननी है/यहाँ से निकलूंगी तो पता नहीं/फिर कहाँ जाऊँ/इच्छा हो या न हो ये सब मैं करूँगी/संग डोर जो बँधी है/सुनूँगी, सहूँगी और वहीं पर रहूँगी/क्या करूँ/बेमन खूँटें से बँधी ब्याहता जो हूँ[34]
वैवाहिक जीवन में यौन-शोषण को समाज अपराध की भावना से नहीं देखता तथा पुरूष को ऐसे शोषण की खुली वैधानिक छूट प्राप्त हो जाती है। जिसका लाभ पति पत्नी के ऊपर हाथ-लात चलाकर भी उठा लेता है तथा पत्नी उस गहरे एकांत क्षण में भी प्रेम की एक बूँद तलाश करने की इच्छा से प्रत्येक वार को अपना कर्तव्य और धर्म समझ कर सह जाती है। ऐसी प्रताड़ना से उत्पन्न मार्मिक वेदना का चित्रण ममता कालिया करती है
           कोई उनसे पूछे/क्यों किया करते थे वे प्रहार/बात से नहीं/हाथ से नहीं/लात से/बगैर सूचना/घात से/खास उस दिन जब लीला सोचती/कि उसने सब्जी स्वादिष्ट बनाई है/साम्यवाद के समर्थक थे वे/क्यों नहीं कहा उन्होंने,/किसी घनिष्ठ क्षण,/‘इधर आओ तुम्हारी लात की मार देखूँ।/वे तो आजीवन चूसते रहे उसे/बोटी की तरह/मिलती रही जो उन्हें/दाल-रोटी की तरह[35]
निरंतर यंत्रणा भोगते रहने से भावशून्य हो जाना स्वाभाविक है तथा संतानोत्पत्ति उसकी विवशता। हैप्पिनेस एण्ड हैल्थ इन वुमनहुडमें सायरन फुलर्टनलिखते हैं – “...विवाह के करार पर दस्तखत उस सबसे महत्वपूर्ण सौदे पर दस्तखत है जिसमें आपकी हिस्सेदारी होगी... दो में से एक मुखिया को गृहस्थी के व्यवस्थापक निदेशक का काम करना होगा बेहतर हो कि यह काम पति करे; हालाँकि कभी-कभी ऐसा भी होता है कि पशुशक्ति इसके लिए उसकी एकमात्र अर्हता होती है।...  बच्चे कम्पनी के नए निवेश होते है; और निदेशकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि निवेशों पर बढ़िया लाभ मिले[36]
यह लाभ पुत्र-प्राप्ति से ही समझा जाता है तथा पुत्रियाँ निष्क्रिय एवं बोझ। नेहा शरद की कड़वाहट और दुःख उनकी कविता से स्पष्ट होता है
मैं एक मशीन हूँ
सिर से पाँव तक ढकी
एक लाश हूँ
और दुँगी और लाशों को जन्म[37]        
उत्तरशती में बदलते समय के साथ संतानोपत्ति की वर्जना के प्रति दृष्टिकोण भी बदला। अतः अब कवयित्रियाँ पुत्रियों को स्वेच्छा से तथा पति की इच्छा के विरूद्ध भी जन्म देने के लिए तैयार हैं तथा उनका पालन इस प्रकार कर रही है कि वे समाज में हिम्मत के साथ सभी समस्याओं का सामना कर सकें।

7. यौन वर्जनाओं का स्खलन तथा सच्चे प्रेम की तलाश
उत्तरशती के हाहाकार में धर्म, नैतिकता के साथ-साथ एकनिष्ठता, पतिपरमेश्वर से भी कवयित्रियों का विश्वास टूट गया। इनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की अपने देह से कुछ भावनाएँ जुड़ी होती हैं। गगन गिल स्त्री देह को एक भाव मानती है। अतः देह मात्र पर स्त्री का ही अधिकार होना चाहिए। स्त्री-पुरूष दोनों की काम इच्छा समान होती है, जो एक नितांत निजी अनुभव है, इसलिए इसमें प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए। रमणिका गुप्ता स्त्री को स्वेच्छा से पुरूष की सहचरी बनने की सलाह देती है, न कि बलपूर्वक।
निर्मला गर्ग तो पुरूष में प्रेम का अभाव देखकर प्यासी ही लौट आती हैं, तो ममता कालिया के लिए प्यार घिसते-घिसते चपटा हो गया है
तालाब पर उगी है हरी हरी
काई जल हमें नहीं दिखता
हम सूखे गले लौट आते हैं[38]

X  X  X  X  X

प्यार शब्द घिसते घिसते
चपटा हो गया है,
अब हमारी समझ में
सहवास आता है[39]
         
कवयित्रियों ने कामेच्छा को शरीर की जरूरत माना है तथा उसे चरित्र से अलग कर निःसंकोच अपनी बातें प्रस्तुत की हैं। वे सरल एवं सहज शब्दों में अपने प्रेम की अभिव्यक्ति करने लगी हैं। वे पुरूष के छद्मी व्यवहार से स्वयं को अलग करते हुए मन और आत्मा से प्रेम पियूष को पीना चाहती हैं।
मैंने तुम्हें चाहा
पर पाया नहीं
तुमने मुझे पाया
पर चाहा नहीं[40]

X  X  X  X  X

कितने तो पास आ जाते हो
तुम मेरे
उस वक्त
जब तुम मुझसे बहुत दूर
चले जाते हो
पास होते हुए भी
कभी
मेरे समीप आओ न ![41]
         
उत्तरशती की कवयित्रियाँ दिवास्वप्न नहीं देखना चाहतीं, वे यथार्थ के धरातल पर प्रेम की बूँदों को तलाश करती दिखाई पड़ती हैं। यदि प्रेम है तो वे प्रेमी की आत्मा, सहचरी, भार्या सबकुछ बनने के लिए तैयार हैं अन्यथा उधर मुड़कर देखना भी पसंद नहीं करतीं।

8. स्त्री समस्याओं का सूक्ष्मतम् यथार्थ-चित्रण  -
जहाँ स्त्रियों को माहवारी, सहवास, प्रेम आदि विषय पर बात करने में संकोच होता था, वहीं उत्तरशती की कवयित्रियों ने अपने काव्य में इन्हीं विषयों को सूक्ष्मता से उकेरा है। क्योंकि स्त्री एक मानव है तथा मानव की सच्चाई छुपाकर उसे मानव श्रेणी में गिना ही नहीं जा सकता तथा सच्चाई से मुँह मोड़कर किसी भी आंदोलन को सफल नहीं बनाया जा सकता।
प्रथम स्राव एक लड़की के लिए बहुत बड़ी सच्चाई है जब विभिन्न हलचलों और पीड़ाओं को झेलते हुए शारीरिक परिवर्तन के साथ उसमें यौवनावस्था की कोपलें फूटती हैं। अनामिका प्रथम स्रावनामक कविता में लड़की की मानसिक ऊहा-पोह, पीड़ा तथा परिवर्तन को एक साथ बहुत ही प्रशंसनीय ढ़ंग से प्रस्तुत करती हैं
            उसकी सफेद फ्रॉक/और जाँघिए पर/किस परी माँ ने काढ़ दिए हैं/कत्थई गुलाब रात-भर में ?/और कहानी के वे सात बौने/क्यों गुत्थम-गुत्थी/मचा रहे हैं/उसके पेट में ?/अनहद-सी बज रही है लड़की/काँपती हुई।/लगातार झंकृत हैं/उसकी जंघाओं में इकतारे।/चक्रों-सी नाच रही है वह/एक महीयसी मुद्रा में/गोद में छुपाए हुए/सृष्टि के प्रथम सूर्य-सा/लाल-लाल तकिया[42]
यौवनावस्था की हलचलें, मधुर-मधुर स्वप्नों में खोना, अनजाने प्रेम के प्रति आकर्षण, प्रेम होना आदि विषय पर भी कवयित्रियों ने विचार किया है। कात्यायनी की लड़कियाँ हॉकी खेलती पायी जाती हैं तो रमणिका गुप्ता की स्त्रियाँ हिम्मत के साथ कोलियरी खदानों में खटने के पश्चात् घर पर अपने मलकट्टा की प्रतीक्षा करती हैं। अनामिका की स्त्रियाँ घर की साफ सफाई का, पूरे घर का खयाल रखती हैं, तो निर्मला पुतुल की औरतें अपने हाथों दोना-पत्तल बनाकर अपना गुजारा करती हैं। किंतु सभी कवयित्रियों का सबसे सशक्त मुद्दा देहहै। दैहिक शोषण के प्रति कड़वाहट उनके काव्य में प्रत्येक स्थान पर दिखाई देता है। पुष्पिता देह का निर्गुण और सगुणनामक कविता में लिखती हैं
           देह के/अंतर्मन की भीत्ति पर/टांग देता है/कई स्वप्न कैलेंडर/कैलेंडर की छाती पर/होते हैं प्रणय के जीवन्त छाया चित्र/गतिशील चलचित्र/पग-तल में होता है जिनके/वर्ष-चक्र-तिथियाँ, दिवस, मास[43] ममता कालिया के अनुसार – “तेरी यह पाँच फुटी देह तेरी है दुश्मन फैसला हर बात का बिस्तर पे ही होना है[44] यद्यपि स्त्रियों के लिए सौंदर्य का विशेष महत्व है किंतु कवयित्रियों ने दैहिक सौंदर्य से अधिक मानसिक सौंदर्य को महत्व दिया है। मानसिक कलह के कारण उन्हें सजना-संवरना व्यर्थ लगता है
          अंदर से बाहर तक/प्रश्नों से भरी मैं/लगातार एक गुस्सा जीती हूँ/वैसे तो मुझे/हँसने और बाल सँवारने के कई ढ़ंग आते हैं/और हाल ही, मैं/जिमखाना क्लब की सदस्य भी बनी हूँ,/पर अब/अपने अंदर खलबलाती खीझ को रोक पाना/मुश्किल है।/और वह अक्सर/चेहरे में एक हिस्सा रेत मिला जाती है[45]
स्त्री की अपनी प्राकृतिक संरचना के साथ-साथ समाज से जुड़ी समस्या उसके लिए अत्यंत घातक होती है। दहेज प्रथा, पर्दा-प्रथा, बाल-विवाह जैसी समस्याओं ने उसकी रीढ़ तोड़ दी है। दहेज प्रथा से चिंतित माँ की समस्या को दर्शाते हुए नेहा शरद कहती हैं
         बिचारी बीसवीं सदी/पैबन्द लगी लाल साड़ी में/सपने हजार लिये बैठी है/भगवान करे/तो सपने साकार हों/वर्ना अपनी बेटी के/दहेज के लिए भला ये/क्या जुटा पायेगी” ?[46]
स्त्रियों की समस्याओं को महत्व न देना अथवा छोटी-मोटी कहकर नज़रअन्दाज कर देना आदि विषयों पर ही कवयित्रियों ने गम्भीरता से चिंतन किया है।

9. मानवीय अधिकारों की माँग एवं क्रांति-भावना

वे चिल्ला रही हैं पूरे ज़ोर से
सड़क पर, संसद में, सभाओं में,
उनसे नहीं होगी भूल।
वे बदल देंगी सारी व्यवस्था समूल।
उनकी माँग है
बराबर का हक़
बराबर का नाम
बराबर की शिक्षा
बराबर का काम।
वे मेरे सीमित सपनों में संशोधन लाएंगी।
और मेरी चुप्पी को निर्भय उद्बोधन में बदल देंगी[47]         
स्त्री को संविधान में अधिकार प्राप्त हो गया है लेकिन समाज में वह अभी भी मानवीय श्रेणी से नीचे हैं। जब तक उसने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी थी तब तक उसे कोई भी अधिकार प्राप्त नहीं था परंतु उसकी आवाज़ परिवर्तित होते ही अनेक पुरूषों ने उसकी हाँमें हाँमिलानी शुरू कर दी। पुरूष षड्यन्त्र को समझते हुए निर्मला गर्ग कहती हैं
उन्हें चाहिए युद्ध
शीर्ष पर रहने के लिए
वे करते हैं शांति-यात्राएँ
शीर्ष पर रहने के लिए[48]
          
पुरूषसत्ता के पराधीन रहकर उन्हीं के विरूद्ध लड़ना नारी के लिए अत्यंत दुष्कर कार्य था। किंतु नारी सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं साहित्यिक क्षेत्र में कभी डर-डरके तो कभी निर्भीक होकर आगे बढ़ती रहीं तथा आज सफल हो रही है। समता, स्वतंत्रता तथा सद्भावना आदि मूल्यों के माध्यम से वे एक सुखी संसार की स्थापना करना चाहती हैं, जिसमें उन्हें न तो पुरूष द्वारा सृजित हानिकारक पुराने मूल्य चाहिए और न ही उनकी सहानुभूति। उन्हें चाहिए बस आज़ादी... और आज़ादी। वे कहती हैं -
          समझ में नहीं आता/जो चीज़ सबको बड़ी आसानी से मिल जाती है/मेरे लिए इतनी दुर्लभ क्यों है।/क्या मैं कुछ कम मनुष्य हूँ/या, वे/कुछ ज्यादा/क्या मुझे हमेशा मोहलत की तरह मिलेगी जिन्दगी/या बख्शीश में/जाओ,/उनसे कह दो/मैं न कैदी हूँ न भिखारी/मेरा हक़ है/एक समूची साबुत आज़ादी[49]
10. भाषा-शैली
कवयित्रियों की भाषा जातीय स्मृति से संपन्न सरल, संस्लिष्ट एवं क्षेत्रीय शैली पर आधारित रहती है। वे गूढ़ से गूढ़ रहस्य को बनावटीपन से दूर सीधे सरल शब्दों में सहज ही कह जाती हैं। उदाहरण के लिए अनामिका की कविता
            मेरा ब्लाउज/मेरे बच्चे का गुल्लक है।/कहीं से भी घूमता-टहलता हुआ आता है/और बड़े निश्चित भाव से/पोस्ट वहाँ कर जाता है/चकमक पत्थर,/सीपी,/सिगरेट की पन्नियाँ,/खिलौनों के नट-बोल्ट/सारे अखोर-बखोर[50]
अनामिका की कविता में बिहारी पुट, मैथिली बोली का हरापन और अंग्रेजी के सहज शब्द दिखाई देते हैं। रमणिका गुप्ता के काव्य में झारखण्ड में मजदूरों के साथ अधिक समय बिताने के कारण मजदूरों की भाषा का मेल-जोल भी मिल जाता है, जैसे कामिन, कचनार। तो निर्मला पुतुल के काव्य में आदिवासी शब्दों का सामृध्य है ।
कवयित्रियों की अधिकतर शब्द-संपदा घरेलू वस्तुओं से जुड़ी हैं, जैसे रोटी, बेलन, चौका, बर्तन, कलछुल, सिन्दुर, फूलदान आदि। माया प्रसाद लड़की की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए लिखती हैं
पतीली में सींझते चावलों-सी
खदबदा लेना
उफनना मुनासिब नहीं है
आटे-सी गूंथी जाना
रोटी-सी सिकती रहना...
औरत होना ?”[51]
स्त्रियों की सीमा घर की चारदीवारी तक ही रही, इसलिए इनकी भाषा पतीली, रोटी, आटा आदि से समृद्ध हुई तथा अब यदि घर के बाहर निकली हैं, तो ब्यूटी पार्लर, बीयर, पब, सिगरेट आदि तक पहुँच पायी है।
इनकी भाषा बिना लाग लपेट, स्त्रियोचित्त बिम्बों-प्रतीकों के साथ प्रहारक होती है, जिससे विरोधी वर्ग कम से कम एक बार अवश्य तिलमिला उठता है। इन्होंने स्वानुभूति एवं शोषकों के प्रति आक्रोश को गद्यात्मक कविता एवं पद्य दोनों रूपों में अत्यंत सराहनीय ढ़ंग से अभिव्यक्ति किया है।
निष्कर्ष हिंदी कवयित्रियों की लेखन प्रवृत्तियों के माध्यम से स्पष्ट है कि यह आधी आबादी की आधी आबादी के लिए चुनौती है। इस कविता की मैंशैली में आधी आबादी स्वतः ही एकसूत्र में बंध जाती है। कवयित्रियाँ समता, स्वतंत्रता और सद्भभावना आदि प्रजातांत्रिक मूल्यों की माँग के साथ-साथ अपनी अस्मिता स्थापित करना चाहती हैं, अथवा दूसरे शब्दों में कहें तो वे अपने पैरों के नीचे की ज़मीन के साथ-साथ अपनी पहचान चाहती हैं। अब वे अन्या और उपेक्षिता शब्द को खारिज करते हुए सत्ता के रणक्षेत्र में उतर आयी हैं अथवा कुरूक्षेत्र के युद्ध में बिना हथियार उठाये लड़ रही हैं तथा पुरूष मानसिकता को बदलने का निरंतर प्रयास कर रही हैं। अनामिका के शब्दों में कहें तो वे अपने काव्य के माध्यम से पुरूषवर्चस्ववादी-मानसिकता को मांझने की प्रक्रियामें सफल हो रही हैं, तथा सदियों से चले आ रहे सत्ताधारी इतिहास में अपनी जगह बना रही हैं।
संपर्क - डॉ. रेनू यादव, रिसर्च/फेकल्टी असोसिएट, भारतीय भाषा एवं साहित्य विभाग (हिन्दी,  गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, यमुना एक्प्रेस-वे, कासना के पास, गौतम बुद्ध

नगर, ग्रेटर नोएडा (उ.प्र.)201312, दूरभाष 09560406181, 09395343511,










    
 






[1] सुमन राजे,  हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास, पृ. 309
[2] यशदेव शल्य - भारतीय परम्परा में नारी अस्मिता, संपा. बी.बी.कुमार - चिंतन-सृजन, अक्टू.-दिस., 2004. पृ.-18
[3] सुनीता बुद्धिराजा, अनुत्तर, पृ. 28
[4] कात्यायनी, इस पौरूषपूर्ण समय में, पृ. 64
[5] निर्मला पुतुल, नगाड़े की तरह बजते शब्द, पृ. 9-10
[6] डॉ. दर्शन पाण्डेय - नारी अस्मिता की परख, सं. सुरेश चन्द्र गुप्त, प्रसाद के नाटक और भारतीय अस्मिता, पृ.12
[7] डॉ. दर्शन पाण्डेय - नारी अस्मिता की परख, सं. सुरेश चन्द्र गुप्त, प्रसाद के नाटक और भारतीय अस्मिता, पृ.12
[8] रमणिका गुप्ता, खूँटे. पृ. 29
[9] राजी सेठ - स्त्री सृजन और अस्मिता बोध, संपा. राजेन्द्र यादव, हंस, मार्च, 2000. पृ. 32  
[10] कमल कुमार - हिंसा का सार्वभौम समाजशास्त्र और मानवाधिकारों का स्त्री लेखन, संपा. डॉ. राजकमल राय और  डॉ. यतीन्द्र तिवारी, हिन्दी-अनुशीलन, पृ. 35
[11] ममता कालिया, खांटी घरेलू औरत, पृ. 45
[12] निर्मला गर्ग, कबाड़ी का तराजू, पृ. 78
[13] डॉ. ऋषभदेव शर्मा, संपा. स्त्री सशक्तीकरण के विविध आयाम, पृ. 5
[14] ममता कालिया, खांटी घरेलू औरत, पृ. 45
[15] नेहा शरद, ख़ुदा से ख़ुद तक, पृ. 30

[16] ममता कालिया, खाँटी घरेलू औरत. पृ. 42
[17] शिव खेड़ा, जीत आपकी, पृ. 195
[18] सिंह, सविता अपने जैसा जीवन, पृ. 62
[19] रमणिका गुप्ता, स्त्री-विमर्शः कलम और कुदाल के बहाने,  पृ. 81-82
[20] निर्मला पुतुल - अगर तुम मेरी जगह होते, पाण्डुलिपि, पृ. 31
[21] सुनीता जैन, खाली घर में, पृ. 49

[22] नेहा शरद, ख़ुदा से ख़ुद तक, पृ. 46
[23] अनामिका खुरदरी हथेलियाँ पृ. 43
[24] नेहा शरद, ख़ुदा से ख़ुद तक, पृ. 38
[25] सविता सिंह, अपने जैसा जीवन, पृ. 10

[26] सुनीता बुद्धिराजा, अनुत्तर पृ. 19
[27] कालिया, ममता खाँटी घरेलू औरत पृ. 21
[28] रमणिका गुप्ता, खूँटे 44
[29] सुशीला टाकभौरे, यह तुम भी जानो, पृ. 33
[30] रमणिका गुप्ता, खूँटे 46
[31] सुनीता बुद्धिराजा, अनुत्तर पृ. 99
[32] नेहा शरद, ख़ुदा से ख़ुद तक, पृ. 29
[33] सिमोन द. बोऊवार, स्त्रीः उपेक्षिता, अनु. प्रभा खेतान, पृ. 274
[34] नेहा शरद, ख़ुदा से ख़ुद तक, पृ. 30
[35] ममता कालिया, खाँटी घरेलू औरत पृ. 25
[36] जर्मेन ग्रीयर, बधिया स्त्री, अनु. मधु बी. जोशी पृ. 212 (‘हैप्पीनेस एंड हैल्थ इन वुमनहुड,  1937,  पृ. 40-41)
[37] नेहा शरद, ख़ुदा से ख़ुद तक, पृ. 22
[38] निर्मला गर्ग, कबाड़ी का तराजू पृ. 72
[39] ममता कालिया, खाँटी घरेलू औरत, पृ. 96
[40] ममता कालिया, खाँटी घरेलू औरत, पृ.9
[41] सुनीता बुद्धिराजा, अनुत्तर पृ. 24
[42] अनामिका, अनुष्टुप, पृ. 28-29
[43] पुष्पिता, अक्षत, पृ. 15
[44] ममता कालिया, खाँटी घरेलू औरत पृ. 91
[45] ममता कालिया, खाँटी घरेलू औरत, पृ.40
[46] नेहा शरद, ख़ुदा से ख़ुद तक, पृ. 23
[47] ममता कालिया, खाँटी घरेलू औरत पृ.81
[48] निर्मला गर्ग, कबाड़ी का तराजू पृ. 60
[49] ममता कालिया, खाँटी घरेलू औरत पृ. 28-29
[50] अनामिका, दूब-धान, पृ. 115
[51] रमणिका गुप्ता, स्त्री-विमर्शः कलम और कुदाल के बहाने, पृ. 63

मूक आवाज़ हिंदी र्नल
अंक-7 (जुलाई-सितंबर 2014)                                                                                                                    ISSN   2320 – 835X
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