बुधवार, 23 अप्रैल 2014

सीमित वृत्त का विस्तार : समकालीन आदिवासी कवितायें डॉ. कर्मानंद आर्य




यदि हम संपूर्ण भारतीय साहित्य का अध्ययन करे तो हम पायेंगे कि साहित्य जिसे हम जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिविम्ब कहते हैंउसमें से एक बहुत बड़ा वर्ग गायब है। उसके साहित्य को या तो नकार दिया गया है या उसे असंस्कृत या लोक धारा का नाम देकर विलग कर दिया गया है। यह विलगाव केवल साहित्यिक नहीं है, उसे भाषाई, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक रूप से पीछे धकेल दिया गया है। किंतु विगत कुछ दशकों से जैसे शिक्षा का प्रसार बढ़ा है, लोक या जन में भी जागरूकता आई है। आज साहित्य में मुख्यधारा का मिथक टूट रहा है। दलित, आदिवासी, स्त्री विषयक साहित्य ही समकालीन साहित्य में मुख्य धारा का साहित्य बन गया है। विगत दशकों में अस्मितावादी साहित्य ने व्यापक रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। मुख्यधारा के बरक्स हाशिये की धारा का भी अपना साहित्य, कला और लोक संस्कृति होती है। आदिवासी साहित्य और संस्कृति ने हाशिये की धारा से मुख्य धारा में आने का अनवरत प्रयास किया है।

हिंदी साहित्य के इतिहास में पहली बार एक ऐसी युवा पीढ़ी आई है जिसमें बड़ी संख्या में दलित-आदिवासी रचनाकार शामिल हैं। दलित-आदिवासी कवियों में कई नाम तो ऐसे हैं जिनके बिना हिंदी की समकालीन कविता अधूरी प्रतीत होती है। कुछ खास जातीय समीक्षकों द्वारा हिंदी कविता में हमेंशा रुदाली का स्वर देखा देता है।कभी भाषा-छंद-अलंकार तो कभी अभिव्यक्ति के खोटेपन को लेकर। समय बदला है और समय के साथ साहित्य के प्रति लोगों की सोच भी बदली है। वे दिन और थे जब साहित्य को समाज के आगे चलने वाली मशाल के तौर पर देखा जाता था पर अब स्थितियां भिन्न हैं।आज साहित्य और समाज में मध्यवर्ग और हाशिये पर धकेल दी गई जातियों और समुदायों का उदय हो रहा है। यह हिंदी कविता के एक हजार वर्ष के इतिहास में अभूतपूर्व घटना है। समय का पहिया डोलता है और डोलने के साथ ही लंबी दूरी भी तय करता है। आज दलित आदिवासी कविता में ऐसे स्वर उभरे हैं जो सदियों से संतप्त थे। उन्हें अनपढ़ बनाये रखने की सामाजिक-धार्मिक कोशिशे थोथी हो रही थीं। अब दलित आदिवासी शिक्षित हो रहे हैं।
यदि आदिवासी साहित्य की बात की जाय तो प्रमुख रूप से तीन बिंदुओं पर ध्यान जाता है जिसके इर्द-गिर्द ही आदिवासी साहित्य विमर्श को केन्द्रित और संकुचित कर देने की कोशिशें की जा रही हैं। पहला, आदिवासी साहित्य लिखित नहीं है, यह लोक साहित्य है और अभी इसके शिष्ट साहित्य का प्रारंभिक दौर है। दूसरा, आदिवासी साहित्य और कलाएं अनगढ़ हैं जिन्हें भारतीय और विश्व साहित्य से सीखकर समन्वय बनाकर ‘सुघड़’ बनना है। यहां भारतीय से तात्पर्य हिंदी, बांग्ला, ओड़िया, तमिल आदि का ‘विकसित’ साहित्य है। तीसरा और अंतिम बिंदु यह है कि आदिवासी साहित्य प्रतिरोध का साहित्य है[1]। आज का आदिवासी रचनाकार इन स्थापनाओं का मुखर विरोध करता है। उन्होंने अपने प्रतिमान गढ़े हैं। अपने साहित्य और संस्कृति का मूल्यांकन भी किया है। पिछली साल दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले का केंद्रीय विषय था : देशज आवाजें- भारत के लोक और आदिवासी साहित्य का मानचित्रण और प्रकाशन। यह अकारण नहीं है इसकी प्रासंगिकता इस दौर में आदिवासी साहित्य, संस्कृति और जीवन की दशा-दिशा पर विचार करने का यह उपयुक्त अवसर है।
आज की प्राथमिक आवश्यकता है कि आदिवासी साहित्य की अवधारणा को मजबूती से रेखांकित किया जाय जिसमें व्यक्ति की बजाय सामूहिक जीवन-दर्शन की सनातन परंपरा रही है। उनके मिथक और ऐतिहासिक संदर्भों का अर्थ सिर्फ इन्सान और उसकी आत्मिक-भौतिक आवश्कतायें नहीं रहीं। यह शाश्वत सत्य है कि समाज और संस्कृति राजनीति का आधार होते हैं और जब समाज बदलता है तब राजनीति भी बदल जाती है। साहित्य इस समाज को बदलकर ही राजनीति से संघर्ष करता है। सातवें और आठवें दशक के बाद जब भारत में अस्मिता बोधी जमातों ने वर्चश्ववादी समुदाय को चुनौती देनी आरम्भ की राजनीति सहित सामाजिक संस्थानों में उनका दखल बढ़ा तभी से जातिवाद के द्वारा राजनीति और समाज के प्रदूषित होने का मिथ बनाया गया।उसने अस्मितावादी उभारों को चुनौती दी, मजेदार बात यह है कि उन्होंने खुद को ‘यूथ फॉर एक्वालटी’ जैसे नामों से संबोधित किया या फिर ‘आम आदमी पार्टी’ जैसे नए अवतारों में अवतरित हुए। भारतीय संदर्भों में यह धातव्य है कि द्विज विचारधारा या उसकी वाहक जातियां ऐसा व्यवहार करती हैं जैसे उनकी उपस्थिति संसार के कल्याण के लिए है। उसे चुनौती देने वाली विचारधाराएं या उसके वाहक समूह संकीर्ण और मानवता विरोधी हैं।वसुधैव कुटुम्बकम का उद्घोष करने वाले, बंधुत्व, स्वतंत्रता और समानता की बात करते हुए लोग उस परिवार में अपना हक़ मांगते हैं और खुद को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।
मनुष्य ने मनुष्य को बहुत सताया है। स्त्री के रूप में आधी मानवता और दलितों के रूप में एक बड़ा वर्ग जीता जागता उदाहरण है हमारे सामने। वर्तमान में हिन्दी साहित्य में स्थापित और चर्चित आदिवासी रचनाकार नहीं हैं, यह स्थिति सचमुच भयावह है। एक भी आदिवासी लेखक की याद नहीं आती है, जो हमारी हिन्दी के पाठ्यक्रमों में हो। क्या कारण हैं कि आदिवासी रचनाकार साहित्यिक विधाओं में उच्चतर स्थिति में नहीं हैं? क्या लेखन नहीं हैं? क्या प्रकाशन की स्थितियां नहीं हैं या सही समय पर समुचित प्रोत्साहन का अभाव है? मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य के आदिवासी हिन्दी लेखकों के संदर्भ में उपर्युक्त स्थितियों को परखने पर जो दृश्य सामने आता है, वह बेहद उलझा हुआ है।जो जन-समूह विजेताओं की पकड़ से बाहर रहे, खदेड़ दिए गए या बच कर दूरदराज दुर्गम जंगलों और पहाड़ों में शरण लेने को विवश हुए, वे आज के आदिवासी कहे जा सकते हैं। वैश्वीकरण की यह समस्त प्रक्रिया सार्वजनिक और निजी दोनों ही क्षेत्रों में अपना बहुआयामी वर्चस्व कायम करने का मार्ग प्रशस्त करती है।यह सब कुछ अंतत: उसी चालाक भद्रलोक के हित में होता है जिसने अधिसंख्यक जन को हाशिये पर धकेलने की साजिशें कीं।और यही वर्तमान पूंजी-केंद्रित इस देश का धन, धर्म और सत्ता का- यथार्थ है, जहां राष्ट्र-समाज इंडिया बनाम भारतमें विभाजित नज़र आता है![2]
आज आदिवासी साहित्य का दायरा बहुत बड़ा है। आज दसाधिक आदिवासी पत्रिकाएं आदिवासियों के मुद्दों को प्रमुख रूपों में उठा रही हैं। प्रजातंत्र के इस पैंसठ पड़ावों के बावजूद भी वह कौन से कारक हैं जो आदिवासियों को विद्रोही बना रहे हैं।वह कौन सा विकास है जो सिर्फ उनका शोषण ही नहीं कर रहा, उन्हें नष्ट भी कर रहा है। आज चाहे समाज हो या साहित्य उन्हें बड़ी हिकारत से देखा जा रहा है तो क्यों? आदिवासियों के संदर्भ को रेखांकित करने वाला  पहल’ का यह वक्तव्य देखा जाये तो फिर आदिवासियों की सही स्थिति को जाना जा सकता है - ‘मैं अपने वसीयतनामे में और बातें लिखना चाहता हूं, लेकिन मैं पस्त हो चुका हूं। मेरे शरीर की एक शिरा थक चुकी है। फिर मेरी हिंदी भी टुटपुंजिया है। मुझे अपने धर्म और देश के प्रति वफादार होना सिखाया गया था लेकिन अब तक मैं पूरा नास्तिक हो चुका हूं और अपने देश के खिलाफ मैंने हथियार उठा लिया है। अब मैं यह सोचता हूं कि यह रास्ता बरबादी की तरफ ले जायेगा, लेकिन मैं वापस नहीं लौट सकता। अगर यह बसीयत आप लोगों के हाथ लगे तो पढ़ियेगा और सोचियेगा कि आदिवासी लोग क्यों बागी हो रहे हैं।’[3]
जीवन के विविध पहलुओं से परिचय कराता आदिवासी विमर्श संघर्ष, उल्लास और आक्रमकता का साहित्य है। छल-कपट, भेद-भाव, ऊंच-नीच से रहित तथा सामाजिक न्याय का पक्षधर इस विमर्श का आधार आदिवासियों की संस्कृति, संघर्ष, भाषा, भूगोल तथा उसके जीवन की अनेक समस्यायें और प्रकृति के प्रति उनका आत्मिक लगाव है। हाल के वर्षों में हिंदी के जिन रचनाकारों ने आदिवासी जीवन-शैली और प्रतिरोध की संस्कृति को अपनी कृतियों, रचनाओं का आधार बनाया है उनमें प्रमुख रूप से संजीव, मैत्रेयी पुष्पा, श्री प्रकाश मिश्र, तेजिंदर, हबीब कैफ़ी, पुन्नी सिंह, मनमोहन पाठक, रणेंद्र, महुआ माजी, विनोद कुमार, पीटरपाल एक्का, वीर भारत तलवार, रमणिका गुप्ता, केदार प्रसाद मीणा, हरिराम मीणा, अश्विनी कुमार पंकज, रोज केरकेट्टा आदि का नाम लिया जा सकता है। पर यहां पर हम आदिवासी कविता लेखन पर मुख्यतः बात करने जा रहे हैं।
यदि आज के संदर्भ की आदिवासी कविता की बात की जाय और इन दो नामों का जिक्र न किया जाय तो बात बहुत अधूरी होगी। निर्मला पुतुल और अनुज लुगुन[4] जैसे कवि जिन्होंने हाशिये के लोगों के जीवन संघर्ष को उनसे जुड़ी प्रकृति और संस्कृति को कविता में जगह दिलाई है।
अनुज लुगुन हिंदी के कवि समाज के नए नागरिक हैं। उनकी नागरिकता अनेक दृष्टियों से रेखांकित किये जाने योग्य है। लगभग एक हजार साल की कवि परंपरा में वे पहले महत्वपूर्ण कवि हैं जो भारत के विस्तृत आदिवासी समाज के अनुभव लेकर कविता की दुनिया में आये हैं। उनकी कवि संवेदना मूलतः आदिवासी संवेदना है। आज के दलित आदिवासी कवियों में साफगोई और कलात्मकता का अद्भुत सम्मलेन दिखाई पड़ता है। ‘परिधि का विस्तार’ नमक अपने एक आलेख में हिंदी के प्रतिष्ठित कवि विश्वनाथ त्रिपाठी लिखते हैं कि ध्यान देने की बात है कि हिंदी क्षेत्र में समाजवादी आन्दोलन शिथिल हुआ है लेकिन कविता के क्षेत्र में फिर भी श्रम, संघर्ष और सौन्दर्य है तो इनमें इन कवियों की भूमिका है। सीमांत से आने वाले इन युवा कवियों ने सच्चे अर्थों में कविता की भाव परिधि का विस्तार किया है।’[5] ‘तत्सम’ से ‘तद्भव’ का जो वर्चश्ववादी सिद्धांत ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने जबरन थोपा था उसके उलट ‘तद्भव से तत्सम’ की प्रक्रिया ज्यादा प्रामाणिक और मजबूती से अपना स्थान बना रही है।
आदिवासी जीवन को लेकर जब कविता की बात की जाती है तो मौखिक परंपरा ही धरोहर के रूप में सामने आती है जो प्रमुख रूप से गेय परम्परा रही है। आधुनिक या समकालीन कविता की दृष्टि से आंचलिक भाषाओं में आबद्ध कविता के माध्यम से जीवन के विभिन्न पक्षों की अभिव्यक्ति होती रही है लेकिन हिन्दी भाषा में आदिवासी कविता अभी शुरूआती दौर में है। आदिवासी इलाको में बाहरी तत्वों की घुसपैठ सबसे बड़ी समस्या रही है। यहीं से आदिवासी जीवन की पवित्रता में प्रदूषण शुरू होता है और अंत में आदिवासी अस्तित्व का संकट। ग्रेस कुजूर की कविता के अंश- हे संगी क्यों घूमते हो/झुलाते हुए खाली गुलेल/क्या तुम्हें अपनी धरती की/सेंधमारी सुनायी नहीं दे रही?”[6] सेंधमारी तो सुनाई देती है लेकिन गूंगे बहरे लोग न सुन पाते हैं न देख पाते हैं। इस्पातिका[7] के आदिवासी विशेषांक में छपी मित्रेश्वर अग्निमित्र की कविता ‘कुछ किरचे-कुछ कहन’ की एक बानगी यहां धातव्य है। कविता उस फलक को तोड़ती है जो आदिवासियों को पिछड़ा और जाहिल समझने की हिमाकत करत है। कविता कहती है कि ‘सुनो रायसन/ कल इंसाफ का रास्ता जुड़ेगा जंगलों से/हस्तिनापुर से रोशनी चलकर उतरेगी/ सुवर्णरेखा तट के अमायनगर घाट पर/सीडब्लूजी की चकाचौंध में अंधी हुकूमत देख पायेगी/रोशनी के पार का अंधेरा, क्योंकि,/ सुनो रायसन भूख जाग रही है।[8]
सत्ताईस साल के मुंडा आदिवासी कवि अनुज लुगुन हिंदी कविता का नया और युवा चेहरा हैं। बहुत कम समय में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले इस कवि की कविता यह संकेत करती है कि हिंदी की समकालीन कविता अब ऐसी जगहों में पैदा हो रही है जो सत्ता के केन्द्रों से दूर हैं और जहां जूझते-संघर्ष करते, मर्मान्तक अनुभवों के बीच रहने वाले शोषित-उत्पीड़ित लोग हैं।[9] वर्तमान में संपूर्ण भारतीय समाज, राजनीति और साहित्य में उत्पीड़ित अस्मिताओं के मुक्तिकामी संघर्षों का दौर है। दलित, शोषित, आदिवासी, पिछड़ी जातियां अपने उत्थान के उपक्रम में लगी हुई हैं। बीसवीं सदी के आखिरी दशकों एवं इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक में भारत में नए सामाजिक आंदोलनों का उभार हुआ है। आज हाशिए की शक्तियां उदीयमान हो रही हैं। स्त्रियों, किसानों, दलितों, आदिवासियों और जातीयताओं की नई एकजुटता में ऐसी मांगें और मुद्दे उठाए जा रहे हैं जो स्थापित सैद्घांतिक और राजनीतिक मुहावरों के माध्यम से आसानी से समझे और सुलझाए नहीं जा सके थे।
यदि हम आदिवासी महिला रचनाकारों के साहित्य का अवगाहन करें तो हम पाएंगे कि उनके साहित्य के तीन आधार हैं। स्त्री होने के कारण लैंगिक आधार, आदिवासी होने के कारण जातीय आधार है और जंगली होने के कारण उनका देशीय आधार भी है। आदिवासी कविता में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुकी रचनाकार निर्मला पुतुल का नाम याद आता है। हिंदी कविता में आज उनका नाम बहुत आदर से लिया जाता है। उतनी दूर मत ब्याहना बाबा, एक बार फिर, अपनी ज़मीन तलाशती बेचैन स्त्री, आदिवासी स्त्रियां, बिटिया मुर्मू के लिए, आदिवासी लड़कियों के बारे में, चुड़का सोरेन से, कुछ मत कहो सजोनी किस्कू आदि बहुत सी कवितायें हमारा ध्यान खींचती हैं। यदि हम निर्मला पुतुल की कविताओं को देखें तो पाएंगे कि अंतर्वस्तु के धरातल पर वे सदा प्रतिरोध करती दिखाई देती हैं। स्त्री संवेदना के धरातल पर निर्मला पुतुल की कवितायेँ ‘अपनी जमीन, अपना घर, अपने होने का अर्थ तलाशती बेचैन स्त्री की दास्तां हैं[10] दरअसल निर्मला की कविता का मानचित्र उनके देश-काल के भूगोल-इतिहास-राजनीति-अर्थनीति से मिलकर बना है। स्त्री संवेदना से इतर भी उनकी कविताओं का व्यापक धरातल है जो आज के संदर्भ में विचारणीय है। उनकी कविता ‘ढेपचा के बाबू’ हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार तुलसीराम की आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ की पात्र ‘किसनू भौजी’ की लिखाई गई चिट्ठी की याद दिला देती है जिनके बारे में स्वयं तुलसीराम का मानना था कि उनके अंदर दुखड़ा सुनाने की अद्भुत वर्णात्मक शैली थी। पुतुल की ‘ढेपचा के बाबू’ को लिखी गई चिट्ठी अकाल में लिखाई गई किसनू भौजी की चिट्ठी की याद दिला देती है। दोनों में दुखों की प्रकृति की जो साम्यता है वह विस्मयकारी है। आजादी के चौंसठ साल बाद भी हाशिए के समाज को जीवन की आधारभूत सुविधाएं नहीं मिल पायीं हैं। दो जून की रोटी जब ठीक से मयस्सर न हो तो रोजगार के लिए पलायन के सिवा कोई दूसरा सहज विकल्प सामने नहीं रह जाता है। पलायन के उन अवसरों पर निर्मला पुतुल उन स्त्रियों के साथ होने वाली ज्यादतियों को रेखांकित करती हैं - पिछले साल धनकटी में खाली पेट बंगाल गई पड़ोस की बुधनी, किसका पेट सजाकर लौटी है गांव?’ निर्मला लिखती हैं ‘और हां पहचानो/अपने ही बीच की उस कई–कई ऊंची सैंडिल वाली/स्टेला कुजूर को भी/जो तुम्हारी भोली भाली बहनों की आंखों में सुनहरी जिंदगी का ख्वाब दिखाकर/दिल्ली की आया बनाने वाली फैक्ट्रियों में कर रहीं हैं कच्चे माल की सप्लाई।[11]
बकौल अनुज : कल एक पहाड़ को ट्रक पर जाते देखा/उससे पहले नदी गई/अब खबर फैल रही है कि/मेरा गांव भी यहां से जाने वाला है/शहर में मेरे लोग तुमसे मिलें/तो उनका खयाल जरुर रखना/यहां से जाते हुए/मैंने उनकी आंखों में नमीं देखी थी। युवा कवि अनुज लुगुन की इन पंक्तियों में उस विचलित कर देने वाले आहट की पुकार है जो भूमंडलीकरण और बहुराष्ट्रीय निगमों की गतिविधि के कारण हमारे देश और समाज में घटित हो रहा है। उनमें हमारे पहाड़ों, नदियों और गांवों के ध्वस्त होने और साधारण जन के विस्थापन और शहरों के ओर पलायन की क्रूर कहानी दर्ज हुई है।[12]
यदि हम संपूर्ण भारतीय साहित्य का अध्ययन करे तो हम पायेंगे कि ‘साहित्य जिसे हम जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिविम्ब कहते हैं’ उसमें से एक बहुत बड़ा वर्ग गायब है। उसके साहित्य को या तो नकार दिया गया है या उसे असंस्कृत या लोक धारा का नाम देकर विलग कर दिया गया है। यह विलगाव केवल साहित्यिक नहीं है, उसे भाषाई, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक रूप से पीछे धकेल दिया गया है। किंतु विगत कुछ दशकों से जैसे शिक्षा का प्रसार बढ़ा है, लोक या जन में भी जागरूकता आई है। आज साहित्य में मुख्यधारा का मिथक टूट रहा है। दलित, आदिवासी, स्त्री विषयक साहित्य ही समकालीन साहित्य में मुख्य धारा का साहित्य बन गया है। विगत दशकों में अस्मितावादी साहित्य ने व्यापक रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। मुख्यधारा के बरक्स हाशिये की धारा का भी अपना साहित्य, कला और लोक संस्कृति होती है। आदिवासी साहित्य और संस्कृति ने हाशिये की धारा से मुख्य धारा में आने का अनवरत प्रयास किया है।
प्राथमिक अवस्था में मानव प्रेम-विश्वास और समानता पर आधारित सामूहिक जीवन जी रहा था। जीवन के इसी विकास क्रम में संपत्ति के प्रति मोह उत्पन्न हुआ तभी से मानव जीवन में शोषण की प्रक्रिया उत्पन्न हुई। शोषण की इसी प्रक्रिया में व्यक्तिवाद, वर्चश्व, दमन और सामाजिक विषमता का जन्म हुआ। यहीं से भोगवादी और व्यक्तिवादी संस्कृति का भी जन्म होता है। जन्म से ही भोगवादी, व्यक्तिवादी और प्रकृति पर अपना वर्चश्व करने की आकांक्षा वाली संस्कृति में और सामूहिकता और मानव को प्रकृति का अभिन्न हिस्सा मानने वाली आदिवासी संस्कृति के बीच कलह पैदा हुई। अनुज लुगुन की एक अन्य कविता अपनी संपूर्ण चेतना के साथ इस मुद्दे को उठाती है। उनकी कविता है ‘“अघोषित उलगुलान’ ”-अल सुबह दान्डू का काफ़िला/रुख़ करता है शहर की ओर/और सांझ ढले वापस आता है परिन्दों के झुण्ड-सा, /अजनबीयत लिए शुरू होता है दिन/और कटती है रात/अधूरे सनसनीखेज क़िस्सों के साथ/कंक्रीट से दबी पगडंडी की तरह/दबी रह जाती है/जीवन की पदचाप/बिल्कुल मौन!/वे जो शिकार खेला करते थे निश्चिंत/ज़हर-बुझे तीर से /या खेलते थे/रक्त-रंजित होली/अपने स्वत्व की आंच से/खेलते हैं शहर के /कंक्रीटीय जंगल में/जीवन बचाने का खेल/शिकारी शिकार बने फिर रहे हैं /शहर में/अघोषित उलगुलान में/लड़ रहे हैं जंगल।[13] आज का मनुष्य अपनी समृद्धि व सुख सुविधा को बढ़ाने के लिए प्रकृति शोषण की अदूरदर्शी नीतियों को अपनाकर संपूर्ण प्रकृति परिवार को असन्तुलित व प्रदूषित कर रहा है।इस प्रकार प्रकृति असन्तुलन का मुल कारण मनुष्य का आधुनिक व अदूरर्शी भौतिकवादी जीवनशैली को माना जा सकता है। भारत के अधिकांश भागों में आज भी भूमि एक ऐसा अहम संसाधन है जो जीवन के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक तंत्र का मूल आधार है।
आज आदिवासियों में चेतना जगी है वह नई-नई विचारधाराओं और क्रान्तियों से परिचित हुआ है, जिनके परिप्रेक्ष्य में वह अपनी नई पुरानी स्थितियों को तोलने लगा है। उसमें अपने होने न होने, अपने हकों के अस्तित्व की वर्तमान स्थिति, अपने साथ हुए भेद-भाव व अन्याय का बोध भी जगा है। यही बोध उसके साहित्य में झलक रहा है।[14] आदिवासी साहित्य अस्मिता की खोज, लोगों द्वारा किए गए और किए जा रहे शोषण के विभिन्न रूपों के उद्घाटन और आदिवासियों पर मंडराते संकटों और उनके मद्देनज़र हो रहे प्रतिरोध का साहित्य है। यह उस परिवर्तनकामी चेतना का रचनात्मक हस्तक्षेप है जो देश के मूल निवासियों के वंशजों के प्रति किसी भी प्रकार के भेदभाव का पुरजोर विरोध करती है और उनके जल, जंगल, जमीन को बचाने के हक में उनके आत्मनिर्णयके अधिकार के साथ खड़ी होती है। ऐसी परंपरा आदिवासी क्षेत्रों में वर्षों से चलती आ रही है। यह मानवीय जीवन से घनिष्ठ संबंध रखने वाला सबसे बड़ा संकट बना हुआ है। हिंदी के नवोदित कवि अनुज लुगुन कविता में आदिवासी की आंख खोलते हैं।
आदिवासी साहित्य और संस्कृति के बारे में डॉ. रमणिका गुप्ता लिखती हैं की यह सही है कि आदिवासी साहित्य अक्षर से वंचित रहा, इसलिए वह उसकी कल्पना और यथार्थ को लिखित रूप में न साहित्य में ही दर्ज कर पाया और न इतिहास में ही। हां, लोकगीतों, किंवदंतियों, लोककथाओं तथा मिथकों के माध्यम से उसकी गहरी पैठ है।[15] आज नागपुरी, कुरमाली और खोरठा जैसी क्षेत्रीय भाषाओं और मुंडारी, कुडु़ख, संताली और खड़ि‍या जैसी जनजातीय भाषाओं में साहि‍त्‍य की प्रमुख वि‍धाओं में यह लगातार लि‍खा-पढ़ा जा रहा है, कि‍ताबें छप रही हैं, पत्रि‍काएं नि‍कल रही हैं। मुक्त व्यापार और मुक्त बाजार के नाम पर मुनाफे और लूट का खेल आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन हथियाने से भी आगे जाकर उनके जीवन को दांव पर लगा कर खेला जा रहा है। विकास के नाम पर अपने पुश्तैनी क्षेत्रों से बेदखल किए गए आदिवासी जाएं तो कहां जाएं? आदिवासी लेखन अपने देश काल परिस्थिति में साहित्य और संस्कृति के संरक्षण के लिए लगा हुआ है। यदि हम उनके लेखन को देखें तो हम पायेंगे की उनका संपूर्ण लेखन और चिंतन परंपरा अपनी परम्पराओं के प्रति बहुत सचेत है। इन समूहों ने अपने शोषण के लिए अपनी खास अस्मिता को कारण बताया और उस शोषण और भेदभाव के खिलाफ संघर्ष के लिए उस संबंधित अस्मिता वाले समुदाय को साथ लेकर अपनी मुक्ति के लिए सामूहिक अभियान चलाया। चूंकि इस प्रक्रिया में शोषण और संघर्ष का आधार सामुदायिक पहचान है, इसलिए इसे अस्मितावाद की संज्ञा दी गई। युवा झारखंडी कवि अनुज लुगुन की यह कविता संपूर्ण लोक चेतना को व्यंजित करती हुई अपनी संपूर्ण उर्जा के साथ अभिव्यक्त है- “लड़ रहे हैं ये /नक्शे में घटते अपने घनत्व के खिलाफ़/जनगणना में घटती संख्या के खिलाफ़/गुफ़ाओं की तरह टूटती/अपनी ही जिजीविषा के खिलाफ़/इनमें भी वही आक्रोशित हैं/जो या तो अभावग्रस्त हैं/या तनावग्रस्त हैं/बाकी तटस्थ हैं /कोई नहीं बोलता इनके हालात पर/कोई नहीं बोलता जंगलों के कटने पर /पहाड़ों के टूटने पर/नदियों के सूखने पर”।[16] प्रकृति एक विराट शरीर है और हम उसी शरीर के अभिन्न अंग। जिसप्रकार मानव शरीर के किसी एक अंग में खराबी आ जाने से पूरे शरीर के कार्य में बाधा पड़ती है, उसी प्रकार प्रकृति के घटकों से छेड़छाड़ करने पर प्रकृति की व्यवस्था नष्ट हो जाती है। आज उसे संरक्षित करने की जरुरत है।
आम आदमी अपनी देशज व्यवस्था की वापसी के लिए बेचैन है। इसी गूंज की ये पंक्तियां हैं कि गांव छोड़ब नाही, जंगल छोड़ब नाही, माय-माती छोड़ब नहीं, लड़ाई छोड़ब नाही।[17] ‘तद्भव’ के दलित विशेषांक में ‘आदिवासी साहित्य की उपस्थिति’ शीर्षक अपने आलेख में नवल शुक्ल ने आदिवासी समाज में साहित्य की विकसित परंपरा का उल्लेख करते हुए दलित साहित्य की चर्चा के साथ ही आदिवासी साहित्य के ज्वलंत प्रश्नों को उजागर करने का प्रयास किया है। उन्होंने लिखा है कि इसमें जीवन संघर्ष, जीवनानुभाव और सहज अभिव्यक्ति इस तरह संचित और सतत विद्यमान है, जैसे पानी में हाइड्रोजन और आक्सीजन।[18] कर्मानंद आर्य की कविता आदिवासियों के उस दर्द को बयां करती है जिसमें आज तक उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला है। उन्हें विस्थापित किया गया, उनसे उनका जंगल, जमीन, जल छीन लिया गया और बदले में मिला सिर्फ आश्वासन। कर्मानंद आर्य की कविता ‘डरो नहीं मेरी कविता तुम्हारे खिलाफ नहीं है’ में इंगित करते हैं कि जिंदगी की जंग लड़ते-लड़ते बंद मुट्ठी में भीगे हुए ख़त अचानक स्याह हो जाते हैं/उस दोराहे पर जहां पहलवानछाप बीड़ी का धुआं मेरी धमनियों में फैल जाता है/और मुझे सांस लेने में दिक्कत होती है/मैं कहता हूं डाक्टर मुझे दिक्कत हो रही है/ तुम कहते हो सब ठीक हो जाएगा।[19] यह ठीक होने की प्रक्रिया और इंतजार में ही आदिवासी लगातार मारे जा रहे हैं।
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के आचार्य प्रो. आशीष त्रिपाठी लिखते हैं कि महानता के कथित परिप्रेक्ष्यों को छोड़ दिया जाए तो कबीर, रैदास, हीराडोम, अछूतानन्द, नागार्जुन, त्रिलोचन, अनामिका, कात्यायिनी और नीलेश रघुवंशी की उपस्थिति से हिंदी कविता जैसे नए अनुभवों और नए सवालों से दो चार होती है, वैसे ही इस नए आमद से। भारतीय राष्ट्र और लोकतंत्र जैसे हाशिये की अब तक अनसुनी आवाजों के आगमन से ज्यादा संवादी हो रहा है, वैसे ही इन समाजों के कवियों के आगमन से हिंदी कविता।[20] अनुज की कविता चिड़ियाघर में जेब्रा की मौत’ एक मिशाल है कि कैसे साहित्य, संस्कृति मनुष्य के खूनी पंजों में कैद होकर रह गये हैं – चिड़ियाघर में जेब्रा की मौत पर/रोने के लिए कोई और नहीं था/सिवाय उसके एक और साथी जेब्रा के/जिसे रखा गया था उसके साथ/ केवल प्रजनन के उद्देश्य से,/वह डर कर दुबका हुआ था एक कोने में/ भयानक अकेलेपन और अजनबीपन में/उसकी आंखें देख रही थी फ्लैशबैक में वह दृश्य/जब वह झुण्ड के झुण्ड अपने दल के साथ/दिन भर चौकड़ी भरा करता था/जहां चरने के लिए खुला मैदान था/प्यास मिटाने के लिए उन्मुक्त नदी थी/और एक जंगल था आत्मिक विश्रांति के लिए। इस पृथ्वी पर जीवनोपयोगी कार्यकलाप का भविष्य भी संकट में दिखाई पड़ रहा है। विकास की अंधाधुंध दौड़ ने पर्यावरण सुरक्षा को महज एक नारे तक सीमित कर रखा है। हम अपने को अनुकूल बनाये रखने के मामले में बहुत अधिक पीछे रह गये है।
मणिपुर के पूर्वी भाग में तांखुल आदिवासी रहते हैं। उनके एक गीत में एक मां का अपने बच्चे के प्रति एक उद्बोधन है- वैद्य बटोर रहा है, जंगल से जड़ी बूटी/रो मत मेरे बबुआ/बाबा तेरा ला रहा है नारियल/तेरे लिए रंगून से/रो मत मेरे बबुआ। कितनी वेदना यहां तान्खुल आदिवासी के काव्य में संचरित हो रही है। इसी तरह से झारखण्ड के कुडुख समुदाय का एक गीत बाहरी हमले से कैसे सावधान करता है- यह भूमि चहुं ओर से/पहाड़ पर्वत से घिरी-घिरी है/मत बेचो भाई दिकुओं के हाथ/यह भूमि हमारी भांति-भांति/खनिज लवणों से भरी पड़ी है/मत बेचो भाई दिकुओं के साथ।[21] आदिम जमातों के पास अपूर्व साहित्य का खजाना सुरक्षित है, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी इन्होंने वाचिक परम्परा में ज़िन्दा रखा। खोज करने पर इनकी जीवन शैलियों, पर्वों, त्योहारों, उत्सवों, अनुष्ठानों, मंत्रों एवं लोकथाओं और लोकगीतें से पूरा का पूरा इतिहास मिल सकता है, जिसका अभाव तथाकथित भारतीय संस्कृति के साहित्य में रहा है। आज आदिवासी भाषाओँ का अनुवाद मुख्यधारा की भाषाओं में हो रहा है। आदिवासी भाषाओं के सांस्कृतिक उत्थान और और अनुवादित साहित्य के बारे में डॉ. रमणिका गुप्ता लिखती हैं कि दलित, आदिवासी और स्त्रीविमर्श जैसे सबाल्टर्न साहित्य आने के बाद तो जैसे मुहिम ही चल पड़ी गैर हिंदी भाषा भाषियों के साहित्य को हिंदी में अनूदित कर जनसामान्य तक पहुचाने की है। इस प्रकार अनुवाद के माध्यम से जहां झारखंडी आदिवासी भाषियों से हिंदी को नए मुहावरे, प्रतीक, तेवर, स्वर और नए प्रतीक मिले, वहीं हिंदी का आदिवासी साहित्य भी सामान्यजन तथा गैर आदिवासियों तक अपनी पहुंच बनाने में सफल हुआ।[22]
आदिवासियों ने तो सपने में भी यह नहीं सोचा कि उनके साथ ऐसा होगा। वे तो उन्मुक्त प्रकृति की गोद में रहे हैं - प्रकृति की भाव-भंगिमाओं के साथ गाते-नाचते। इसी उन्‍मुक्‍तता के रहते अभावों भरी जिंदगी की भी उन्होंने परवाह नहीं की। समृद्ध प्राकृतिक परि‍वेश में सीमित आवश्‍यकताओं के साथ एक लंबी, वि‍शुद्ध और सांस्कृतिक परंपरा रही है। आदिवासी जीवन की कल्पना प्रकृति के बिना सम्भव नहीं, प्रकृति के साथ छेड़छाड़ आदिवासी के लिए आत्यंतिक पीड़ा की बात है। पर्यावरण प्रेमियों के साथ आदिवासी कविता भी सुर मिलाती है। ग्रेस कुजुर कहती हैं- इसलिए फिर कहती हूं/न छेड़ो प्रकृति को/अन्यथा यह प्रकृति करेगी भयंकर बगावत/और तब/न तो तुम होंगे/न हम होंगे। धरती उजड़ी जंगल उजड़े रह गया क्या शेष? ये हालात मानवेतर प्राणियों के लिए भी खतरे की घंटी है। जीवन का आधार रही यह प्राकृतिक संपदा, उनकी पुश्तैनी भूमि और सांस्कृतिक धरोहर उनसे छीनी जा रही है, जिसके लिए वे कतई तैयार नहीं और कोई माने या न माने वे इसके लिए कभी तैयार हो भी नहीं सकते। यह गंभीर संकट केवल आदिवासी वर्ग को झेलना पड़ रहा है। प्रकृति एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का निकट संबंध रहा है जो अब गड़बड़ा रहा है। आदिवासी स्वभाव से बहुत भोले होते हैं, सब तरह से वंचित। वे नहीं समझ पाते उन चालाकियों को, जो उनके विरूद्ध रची जाती रही हैं। किंतु आज आदिवासी कविता बाहरी लोगों की साजिशों को पहचानने लगी है। निर्मला पुतुल लिखती है- इन खतरनाक शहरी जानवरों को पहचानो चुड़का सोरेन...../इस पेचदार दुनिया में रहते/तुम इतने सीधे क्यों हो चुड़का सोरेन?और ये वो लोग हैं जो हमारे बिस्तर पर करते हैं/हमारी बस्ती का बलात्कार/और हमारी ही जमीन पर खड़ा हो पूछते/हमसे हमारी औकात!
पत्र-पत्रि‍काओं में छि‍टपुट लि‍खने वाले युवा कवि‍यों-कवयि‍त्रि‍यों की कतार अब लंबी होती नज़र आ रही है। आदिवासी भाषाओं के नवोन्‍मेष के लि‍ए समर्पित रचनाकारों की सूची लंबी है। पीटर शान्‍ति‍ नवरंगी, रामदयाल मुंडा और हरि‍ उरांव के नाम-काम भुलाये नहीं जा सकते। संताली कवयि‍त्री नि‍र्मला पुतुल की कवि‍ता पुस्‍तक 'नगाड़े की तरह बजते शब्‍द' बहुत चर्चा में रही है। उनकी बाहमुनी कविता की चंद पंक्तियों पर गौर करें तो ‘तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते हैं पेट हजारों/पर हजारों पत्तल भर नहीं पाते पेट तुम्हारा। बाहमुनी के अलावा उनकी बहुत सारी कवितायेँ, जैसे ‘आदिवासी स्त्रियां’, ‘बिटिया मुर्मू के लिए’,आदिवासी लड़कियों के बारे में’,चुड़का सोरेन से’ ‘कुछ मत कहो सरोजिनी किस्कू’ और ‘पहाड़ी बच्चा’ आदि सैकड़ो कवितायेँ हमारा ध्यान आकर्षित करती हैं। पि‍छले वर्षों में मोतीलाल और महादेव टोप्‍पो की कई कवि‍ताएं भी खूब सराही गयीं। बिटिया मुर्मू आदिवासी स्त्री की पीड़ा भी बयां करती हैं कि स्त्री और पुरुष की शारीरिक बनावट के आधार पर काम में बंटवारा समझ आ सकता है, लेकिन आदिवासी पुरुष समाज ने कार्य का बंटवारा शारीरिक बनावट या क्षमता के आधार पर न करके, स्त्री पर अधिकार जताने के दृष्टिकोण से, कड़े-कड़े नियम-क़ानून बनाकर उन्हें कुछ कामों से वर्जित कर दिया, जैसे हल चलाना, घर का छप्पर छाना या धनुष छूना अर्थात् ज़मीन और घर जो आज की परिभाषा में संपत्ति के प्रतीक हैं, पर आदिवासी पुरुष समाज का ही अधिकार रहे। आदिवासी चाहते हैं की वे मिथकों में, प्रतीकों में, साहित्य में दिकू कलम द्वारा विकृत की गई अपनी छवि को, उनके षडयंत्र को उजागर करें और साबित करें कि हम तो रक्षक थे, राक्षस नहीं थे। दानवीर थे दानव नहीं, महाबलिपुरम के राजा थे हमारे पूर्वज। एक सीधा दमन किया जाता है हथियारों से किंतु दूसरा है सांस्कृतिक उत्पीड़न। वर्चश्ववादी ताकतें चाहती हैं आदिवासियों को मुख्यधारा में लाओ।
चर्चित आदिवासी नाम वाहरू सोनबडेलिखते हैं कि आज आदिवासी संस्कृति पर चारों ओर से आक्रमण हो रहा है। आदिवासी संस्कृति को भेद करके नष्ट करने की कोशिश की जा रही है। शोषण, भेदभाव, और व्यक्तिगत हितों पर आधारित मुख्यधारा की संस्कृति पर आधारित होकर आदिवासी भी व्यक्तिगत आधार पर आचार-विचार करने लगे हैं।[23] आज हम स्वयं को ग्लोबल गांव का नागरिक होने पर गर्व अनुभव करते हैं। आर्थिक उदारीकरण और विकास के नाम पर हम प्रकृति का लगातार दोहन करते आ रहे हैं। साहित्य सबको जागरूक करता है। परिणाम सामने है। विकास की इस अंध अवधारणा ने मनुष्यों को मानव से दानव बना दिया है। विकास का यही परिणाम सामाजिक असंतुलन के रूप में हमारे सामने है। विगत दशकों में इसपर व्यापक रूप से चर्चा हो रही है। इसप्रकार की चर्चाओं से अब कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रह गया है।
आदिवासियों में पहचान के आन्दोलन और अपनी संस्कृति, भाषा, जल, जंगल, जमीन और लाठा-जलावन को बचाने की मुहिम का हिस्सा नहीं तो और क्या हैं? वे अपने समाज की विकृतियों को भी दूर कर आज के समाज के समकक्ष सशक्त होकर खड़ा होना चाहते हैं। निर्मला पुतुल चुड़का सोरेन को सावधान करती हैं कि तुम्हारे पिता ने कितनी शराब पी/ ये तो मैं नहीं जानती/ पर शराब उसे पी गई वे आदिवासी लड़कियों को फुसलाकर भगा ले जाते मैदानी लोगों के बारे में चुड़का को सतर्क करती हैं- वह कौन-सा जंगली जानवर था चुड़का सोरेन/जो जंगल में लकड़ी बीनने गई/तुम्हारी बहन मुंगली को उठाकर ले भागा। निर्मला पुतुल अपने समाज की विकृतियों से भी टकराती हैं, जब वे 'सजोनी किस्कू' की व्यथा-कथा कहती हैं या 'चुड़का सोरेन' के पिता को हंडिया पीकर बेखबर होने के खतरों से सचेत करती हैं- देखो तुम्हारे ही आंगन में बैठ तुम्हारे ही हाथों बनी हंडिया/ तुम्हें पिलाकर कोई कर रहा है/तुम्हारी बहनों से ठिठोली।इसीप्रकार  ये वे लोग हैं/जो हमारे ही नाम पर लेकर गटक जाते हैं/हमारे ही हिस्से का समुद्र आज वंचितों के शोषण के खिलाफ खड़ी हुई मुहिम में सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन के अलावा साहित्यिक आंदोलनों ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है। इसीप्रकार की एक और कविता है जीतेंद्र कुमार की लिखी छोटा-सा हाथ छोटा-सा हाथ/उछालता हुआ लड़का सिर्फ/होता है सिर्फ/एक छोटा-सा हाथ/बाहर निश्चय ही सारी दुनिया होती है/मगर दिमाग में/दिमाग में होता है एक छोटा-सा हाथ/मेरे हाथ में फंसा हुआ/पहले मुझे दरिया से डर लगता था/अब अलगाव से/उसमें भी होता है/ एक छोटा-सा हाथ।[24]
मनुष्य आज भी प्रकृति के विनाश कार्य में लगा हुआ है। जंगल कटते जा रहे है, नदियां प्रदूषित हो रही है, ग्लेशियर पिघल रहे है, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। ये ऐसे कारण हैं जिनसे ग्लोबल वार्मिंग एवं अन्य आपदाएं बढ़ती जा रही है। पुनः आदिवासी कवि अनुज याद आते हैं – बाज़ार भी बहुत बड़ा हो गया है/मगर कोई अपना सगा दिखाई नहीं देता/यहां से सबका रुख शहर की ओर कर दिया गया है/कल एक पहाड़ को ट्रक पर जाते हुए देखा/उससे पहले नदी गई/अब ख़बर फैल रही है कि/मेरा गांव भी यहां से जाने वाला है।[25] हमारे आसपास की प्रत्येक वस्तु जड़, चेतन, प्राणी, हमारा रहन-सहन, खान-पान, संस्कृति विचार आदि सभी कुछ संस्कृति के ही अंग हैं। आदिवासी अस्मिता और अस्तित्व के लिए इतना गहरा संकट इससे पहले नहीं पैदा हुआ। जब सवाल अस्तित्व का हो, तो प्रतिरोध भी स्वाभाविक है। सामाजिक और राजनीतिक प्रतिरोध के अलावा कला और साहित्य के द्वारा भी प्रतिकार की आवाजें उठीं हैं और वही समकालीन आदिवासी कविता का मुख्य स्वर हो गया – मैं गीत गाना चाहता हूं/मैं उस फसल का सम्मान लौटाना चाहता हूं/जिसकी जड़ों में हमारी जड़ें हैं/उसकी टहनियों में लोटती पंछियों को घोंसला लौटाना चाहता हूं/जिनके तिंनकों में हमारा घर है/उस धरती के लिये बलिदान चाहता हूं/जिसने अपनी देह पर पेड़ों के उगने पर कभी आपत्ति नहीं की/नदियों को कभी दुखी नहीं किया/और जिसने हमें सिखाया कि/गीत चाहे पंछियों के हों या जंगल के/किसी के दुश्मन नहीं होते। आज हम कह सकते हैं कि यह दौर आदिवासी विमर्श और आदिवासी साहित्य की अवधारणा के निर्माण का दौर है और यह होना भी चाहिए।

      संपर्क - डॉ. कर्मानंद आर्य, सहायक प्रोफेसर, भारतीय भाषा केंद्र, बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय, गया परिसर, गया (बिहार), दूरभाष – 8092330929, ईमेल - karmanand@cub.ac.in 

 

[1]वंदना टेटे, आदिवासी साहित्य:परंपरा और प्रयोजन, प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन, रांची, झारखण्ड
[2]हरिराम मीणा, हाशिये का समाज और राज, जनसत्ता, सोमवार, 11 मार्च, 2013
[3]‘पहल-91’ जनवरी 2013, पत्रिका-आमुख उदयभानु पाण्डेय की कहानी, दिफू,असम 2012
[4]अनुज लुगुन, अघोषित उलगुलान (भारत भूषण अग्रवाल सम्मान से पुरस्कृत) आईनेक्स्ट, रांची, 04 अगस्त 2011, पृष्ठ 03
[5]विश्वनाथ त्रिपाठी, परिधि का विस्तार, द पब्लिक एजेंडा, जनवरी 2014, वर्ष-6 अंक 23, पेज 31
[6]हरिराम मीणा (संपादक), एक और जनी शिकार, समकालीन आदिवासी कविता, पेज20
[7]अविनाश कुमार सिंह (संपादक), शोध-पत्रिका, जमशेदपुर, जनवरी-जून 2012
[8]इस्पतिका, जनवरी-जून 2012
[9]मंगलेश डबराल, पलाश की आग का समय, द पब्लिक एजेंडा, जनवरी 2014, वर्ष-6 अंक 23, पेज 30
[10]नगाड़े की तरह बजते शब्द, इस्पतिका, जनवरी-जून 2012, पेज-225 
[11]नगाड़े की तरह बजते शब्द, इस्पतिका, जनवरी-जून २०१२, पेज-२२७
[12]मंगलेश डबराल, पलाश की आग का समय, द पब्लिक एजेंडा, जनवरी 2014, वर्ष-6 अंक 23, पेज 30
[14]तद्भव दलित अंक अंक-14, पृष्ठ-36
[15]आदिवासी स्वर और नई शताब्दी, डॉ. रमणिका गुप्ता, पेज 10
[17]वंदना टेटे (संपादक), झारखण्ड भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा, अंक- 1, मार्च-मई 2010, पृ. 31
[18]तद्भव, दलित विशेषांक, अंक-14, पृष्ठ-36
[19]www.karmanandarya.blogspot.com
[20]आशीष त्रिपाठी, आदिवासी विमर्श और हिंदी साहित्य, पृष्ठ-205
[21]राजेंद्र कुमार, आदिवासी अस्मिता और उसकी अभिव्यक्ति के स्वर,आदिवासी विमर्श और हिंदी साहित्य, पृष्ठ-23 
[22]रमणिका गुप्ता, रेतपथ, प्रवेशांक, जुलाई-दिसंबर, 2013, पृष्ठ-49
[23]अंतिम जन, अंक- 10, नवम्बर 2012,  गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति
[24]सीरज सक्सेना, मिट्टी से संवाद, जनसत्ता 1मार्च, 2013

मूक आवाज़ हिंदी र्नल
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