बुधवार, 23 अप्रैल 2014

निराला का विद्रोही स्वर -चारू गोयल






       निराला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि न केवल उन्होंने परंपरा से विद्रोह किया वरन् स्वयं अपनी उपलब्धियों से भी विद्रोह किया जिनको कालांतर में परंपरा बनना था। उनके काव्य-विकास के तीन चरण- तत्सम, तद्भव, देशज - बहुत कुछ इसी मनोवृति को प्रतिफलित करते हैं। इस मनोवृति के लिए उनका काव्य-वैविध्य भी जिम्मेदार माना जाता है।



प्रसाद और निराला छायावाद के प्रतिस्पर्द्धी प्रवर्तक हैं। दोनों में लगभग वैसा ही संबंध है, जैसा इतिहास में परंपरा और विद्रोह के बीच होना चाहिए। 1936 के पत्र में निराला प्रसाद को उपनिषदों से नीचे उतारना चाहते हैं। यहां उपनिषदों से अभिप्राय काव्य और दर्शन की उस परंपरा से है जिसके प्रति सीधा विद्रोह निराला को अभीष्ट है। वे हिंदी कविता की एक हज़ार वर्ष लम्बी परंपरा से अलग हटकर  मुक्त छंद लिखते हैं। ब्राह्मण की बनाई शुद्ध घी की कचौड़ी को छोड़ वे तेल की गरम पकौड़ी में रस लेते हैं और अभिजात कुल की रूपसी की बजाय उनका ध्यान काली कहारिन पर केंद्रित होता है। यह चतुर्मुखी विद्रोह प्रसाद से निराला का अलग स्वभाव है- व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों स्तरों पर। इसीलिए डॉ० प्रेमशंकर का निष्कर्ष है की निराला आरंभ से ही क्रांतिकारी रहे हैं और उनकी विद्रोही भावना इसी का एक मुख्य तत्व है। निराला के काव्य-व्यक्तित्व को रेखांकित करते हुए डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी कहते हैं की यह विलक्षण बात है कि उनमें क्लासिकी रोमांटिक तथा आधुनिक तत्व घुले-मिले हैं। निराला में प्रसाद, निराला और अज्ञेय तीनों घुले-मिले हैं। अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों की जीवंत उपस्थिति एक कवि में एक विलक्षण संयोग है। यह संयोग निराला के क्रांतिकारी स्वछंदतावाद के कारण संभव हुआ है। उनकी क्रांति की यह आंकाक्षा और विद्रोह की भावना 1923 में प्रकाशित धारा से लेकर सांध्यकाकली में प्रकाशित शिवतांडव वाली कविता तक अनेक रूपों में भावबोध के अनेक स्तरों पर अभिव्यक्त हुई है।
       आलोचकों ने एक स्वर से स्वीकार किया है कि छंद के संदर्भ में निराला का विद्रोह अधिक स्पष्ट एवं मुखर है। एक ओर उनकी चिंता थी कि उनके गीत सामान्य जन और कलावंतों के होठों पर वैसे ही बस जाएं जैसे अब तक ब्रजभाषा में रचित ख्याल के बोल और पदों की स्थिति रही है। दूसरी ओर परंपरित छंद को तोड़कर उसे नए ढंग से बनाने में उनका विशेष ध्यान रहा। तीसरी ओर छंद विधान के आंतरिक स्वरूप को नए-नए ढंग से व्यवस्थित करने की तीव्र उत्सुकता थी। सबसे महत्व की बात है कि मुक्तछंद को उन्होंने जातीय मुक्ति के व्यापक संदर्भ से जोड़ा। उन्होंने लिखा है कि मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है। मनुष्यों की मुक्ति कर्मों के बंधन से छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छंदों के शासन से अलग हो जाना। उनके अनुसार मुक्त छंद से स्वाधीन चेतना फैलती है। ध्यातव्य है कि यह ‘मुक्त छंद’ है न कि ‘छंद मुक्त’। निराला की कविता का अपना एक आंतरिक छंद है और आंतरिक लय है। छंदों की रीतिबद्धता को तोड़ना एक क्रांतिकारी कदम है। इसप्रकार मुक्त छंद समूचे स्वछंदतावाद की आत्मा है।
       मुक्तछंद केवल काव्य के बाह्य कलेवर का परिवर्तन नहीं है, बल्कि एक क्रांतिकारी सामाजिक बदलाव का भी सूचक है। निराला की उद्दाम कल्पना, प्रखर भावावेग, निर्बंध यौवन, निस्सीम प्राणवत्ता छंदों के बंधन में समाहित नहीं हो सकती थी। निराला के कवि-व्यक्तित्व के विकास में मुक्तछंद की विशिष्ट स्थिति है। इसका कारण यह है कि वे अपने काव्यजीवन का आरंभ जूही की कली से मानते हैं। यह समूचे हिंदी काव्य-क्षेत्र में मुक्तछंद की प्रथम रचना है। (वैसे इसका रचनाकाल विवादास्पद है।)
       निराला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि न केवल उन्होंने परंपरा से विद्रोह किया वरन् स्वयं अपनी उपलब्धियों से भी विद्रोह किया जिनको कालांतर में परंपरा बनना था। उनके काव्य-विकास के तीन चरण- तत्सम, तद्भव, देशज - बहुत कुछ इसी मनोवृति को प्रतिफलित करते हैं। इस मनोवृति के लिए उनका काव्य-वैविध्य भी जिम्मेदार माना जाता है।
       निराला को अपने समकालीनों द्वारा मुक्तछंद को लेकर काफी खरी-खोटी सुननी पड़ी थी। रबर छंद’, ‘केंचुआ छंद आदि विशेषणों से इसको नवाज़ा गया। शुक्ल जी ने शालीन भाषा में इसे बेमेल चरणों की विलक्षण आजमाइश कहा। निराला ने मुक्तछंद अपनी सुविधा के लिए नहीं अन्वेषित किया था वरन् अपने काव्य प्रवाह में गति लाने के लिए किया था। निराला सूरदास के बाद हिंदी के प्रथम छंद प्रयोक्ता हैं। तुलसीदास में निराला ने छः पंक्तियों का छंद चुना है जो छायावाद में इकलौता प्रयोग है।
       परिमल की चार कविताएं क्रांतिगीत की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। महाराजा शिवाजी का पत्र’, ‘आवाहन’, ‘जागो फिर एक बार और बादल राग इन्हें एक शीर्षक देने का परामर्श बच्चन सिंह ने दिया - युद्ध राग। पहली कविता में जयसिंह को अत्याचार और साम्राज्यवाद के खिलाफ जाने के लिए कहा गया है। ह्वान में अत्याचार के विरूद्ध शक्ति के अकुंठ नृत्य का आह्वान है। जागो फिर एक बार में कैव्यं मा स्म गमः पार्थ त्यक्त उत्तिष्ठ भरतर्षभः की याद दिलायी गयी है।
       बादल राग विप्लव राग है। प्रत्येक खंड में बादल को अलग-अलग ढंग से संबोधित किया गया है। ये सम्बोधन अपने आप में क्रांतिमूलक हैं- निर्बंध, उच्छृंखल, प्रचंड, सव्यसाची, गुड़ाकेश इत्यादि। इसकी आवेगमयता में पौरूष है और पौरूष में क्रांतिकारी बदलाव का लक्ष्य निहित है। लेकिन इस कविता तक निराला की धारणा है कि क्रांति के लिए किसी मसीहा का होना अनिवार्य है। इसीलिए किसान, बादल का मसीहा के रूप में स्वागत करते हैं और विश्वास करते हैं कि बादल ही हमारी स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन लाने में समर्थ है। यानी क्रांति का अग्रदूत वही है। किसानों में यह बोध नहीं है कि क्रांति का नायक वे स्वयं बन सकते हैं। यहां इस क्रांतिकारी आत्मबोध का अभाव है। ऐसी ही समझ निराला के बारे में डॉ० केदारनाथ सिंह भी रखते हैं। सर्वहारा के नायकत्व में, किसान-मजदूर की अगुवाई में क्रांति विकसित हो सकती है, ऐसा विश्वास बेला में ही व्यक्त हुआ है-
आज अमीरों की हवेली
किसानों की होगी पाठशाला’
या
‘सारी संपत्ति देश की हो
सारी संपत्ति देश की बने।’
       यहां क्रांति का वह स्वरूप है जो समाजवाद की ओर उन्मुख है। यह गांधीवादी सत्ता-परिवर्तन नहीं है क्योंकि निराला निर्देश देते हैं -कांटा कांटे से कढ़ाओनये पत्ते में अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते किसानों एवं उनकी कठिनाइयों का चित्रण है। इनकी क्रांति का मिज़ाज वेदांती क्रांतिकारियों से भिन्न है। निराला की धारणा है कि क्रांति की सार्थकता जनता की भौतिक समृद्धि में है। पर एकमात्र सार्थकता नहीं।
जागो, जीवन धनिके!
विश्व पण्य प्रिय वणिके!
      
निराला की क्रांति संबंधी कविताएं औसत प्रगतिवादियों से भी भिन्न हैं। प्रगतिवादियों ने पूंजीवाद के खिलाफ बहुत लिखा, मगर सामंतवाद एवं साम्राज्यवाद का विरोध नहीं किया। निराला ने प्रेमचंद की तरह सामंतवाद के खिलाफ भी बहुत लिखा। इस तरह निराला की क्रांति संबंधी समझ अपने समकालीनों की तुलना में उन्नत है और सम्यक् भी।
       दरअसल, निराला का सम्पूर्ण काव्य-व्यक्तित्व विरूद्धों का सामंजस्य की उस अवधारणा से विकसित हुआ है जिसे शुक्ल जी ने आनंद की साधनावस्था की उच्चतम रचनाभूमि का कारक तत्व स्वीकार किया है।
       निराला ने मुक्तछंद का प्रवर्तन किया है तो तुलसीदास में सबसे कठिन छंद और तुकविधान का भी प्रयोग किया है। राम की शक्तिपूजा में तत्सम शब्दों का आग्रह है तो कुकुरमुत्ता में ठेठ देसी भंगिमा है। श्रृंगार गीतों में प्रणय की उद्दाम स्थितियों का उन्मुक्त अंकन है। उन्होंने ऐसे दृश्यों की सृष्टि की जैसी प्रसाद ने आंसू और लहर के गीतों में भी नहीं की है। निराला की उद्घोषणा है कि-
तुमसे लाग लगी जो मन की
जग की हुई वासना बासी।
      
इसके बरअक्स आदि से अंत तक उन्होंने भक्ति-गीतों की ऐसी श्रृंखला प्रस्तुत की है जो अभूतपूर्व है एवं जो समकालीन साहित्य में भी अद्वितीय है, अनुपम है। अपने जीवन और लेखन दोनों में ही विद्रोही होने के बावजूद उनके प्रिय कवि हैं मर्यादावादी तुलसीदास। निराला की तुलना ऊपरी तौर पर व्हीटमेन से की जाती है। दोनों ही मुक्तछंद के प्रवर्तक हैं, पहले व्हीटमेन, बाद में निराला। पर निराला मे विरूद्धों का सामंजस्य देखते हुए व्हीटमेन की ये पंक्तियां याद आती हैं-
क्या कहा, मैं अपना खंडन करता हूं
ठीक है तो, मैं अपना खंडन करता हूं
मैं विराट हूं- मैं समूहों को समोये हूं।
       निराला ने कहीं ऐसा घोषित नहीं किया है पर उनका काव्य स्वयं इसका अनेक स्तरीय प्रमाण है। निराला ने छायावाद की ही सीमाओं का अतिक्रमण नहीं किया है बल्कि अपनी सीमाओं का भी अतिक्रमण किया है। अपनी अवधारणाओं का भी खंडन किया है। यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात है। उनका यही रचनात्मक वैशिष्ट्य उन्हें छायावादियों में ही नहीं बल्कि आज के रचनाकारों में भी भिन्न वजूद देता है। लिहाजा अभी न होगा मेरा अंत की तर्ज पर कहने को मन करता है कभी न होगा उनका अंत
संदर्भ-सूची:
1. रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2005
2. रामस्वरूप चतुर्वेदी, प्रसाद-निराला-अज्ञेय, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2009
3. डॉ. प्रेमशंकर, नयी कविता की भूमिका, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 1988
4. नन्ददुलारे वाजपेयी, हिंदी साहित्य बीसवीं शताब्दी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1985
5. रामविलास शर्मा, परंपरा का मूल्यांकन, राजकमल प्रकाशन,दिल्ली,2004 

संपर्क – चारू गोयल, शोधार्थी, दिल्ली विश्विद्यालय, दिल्ली-7, दूरभाष – 9968418448,
ईमेल - charugoel84@gmail.com
               




मूक आवाज़ हिंदी जर्नल
अंक-5                                                                                                       ISSN   2320 – 835X
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