बुधवार, 23 अप्रैल 2014

आदिवासी संघर्ष एवं संवैधानिक प्रावधान (मानवाधिकार के संदर्भ में) -अनीता देवी

आदिवासी संघर्ष एवं संवैधानिक प्रावधान (मानवाधिकार के संदर्भ में) -अनीता देवी


आदिवासी संघर्ष एवं संवैधानिक प्रावधान (मानवाधिकार के संदर्भ में)
          -अनीता देवी

आज आदिवासियों के सामने अनेक चुनौतियां मुंह उठाये खड़ी हैं। एक तरफ तो आधुनिक सभ्यता और औद्योगिक विकास के विविध आयाम हैं तो दूसरी ओर इनकी सांस्कृतिक धरोहरें, परंपराएं और रीति-रिवाज हैं। आदिवासी विकास में हिस्सेदारी जरूर चाहता है किंतु वह यह जानता है कि यदि उसने अपने संस्कृति को भुला दिया तो उसकी बुनियाद की चूलें हिल जायेंगी। सरकारी आदिवासी नीति आदिवासियों को कानूनी स्तर पर पूर्ण स्वतंत्रता देती है कि वे अपनी परंपरागत पहचान को बनाये रखें किंतु नीतिगर स्तर पर सरकारें इन संवैधानिक मूल्यों का सम्मान करती नजर नहीं आतीं।


 
भारतीय सामाजिक मान्यताओं के अनुसार वह मानव समुदाय जो आदिकालीन और प्राचीन परंपराओं के अनुसार अपने पारिवारिक, सामाजिक जीवन में व्यवहार करता है, आदिवासी है। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपने ही क्षेत्र में जन्म से लेकर मृत्यु तक चलने वाले संस्कार, रीति-रिवाज, ऋतुओं के आधार पर उत्सव तथा सामुदायिक पारस्परिकता निर्धारित करते हैं।
इतिहास की यात्रा में भारतीय समाज के परिवर्तनक्रम में यह संभव है कि आदिवासी समुदायों के मुख्य समाज की श्रेणी में आने की प्रक्रिया में उनकी संज्ञात्मक अवधारणा की परंपरा को जाति के रूप में पहचान दी जाने लगे, यद्यपि इससे उनका जातिगत समुदाय स्थापित हो जाना नहीं मान लेना चाहिए। इसकी प्रमुख वजह यह है कि अभी भी समुदाय के स्तर पर उनका नामकरण उनके आवासीय भूगोल, गोत्र, गणचिन्ह या वंश परंपरा के आधार पर ही जाना जाता है और यही उन समुदायों की मूल पहचान है।[1] प्रारम्भिक भारतीय समाज मुख्य रूप से चार वर्णों में बंटा था- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र। इन चारों वर्णों में प्रथम दो वर्ण अपने-अपने वर्ण में गोत्र के आधार पर विभाजित हैं। जिन्हें हाशिये के समाज के सबसे आखिरी पायदान पर रखा गया, उन्होंने अपना निवास स्थान प्रकृति के स्वछंद वातावरण में जंगलों-पहाड़ों की गोद में बनाया तथा अपनी दैनिक मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति भी जंगलों से की। इन्हें ही कालांतर में आदिवासी या जंगली नामों से संबोधित किया गया। समय परिवर्तन के पश्चात भारतीय संस्कृति और साहित्य में इन्हें राक्षस, असुर, दस्यु, वानर व निषाद तक कहा गया। यह आदिवासी मानव समुदाय भारतीय समाज की तथाकथित मुख्यधारा से भौगोलिक और सांस्कृतिक स्तरों पर अलग-थलग रहता आया है। मगर ये तथाकथित जंगली आदिवासी आदि-मानवता के सरोकारों को संरक्षित रखते रहें तथा प्रकृति और मानवेत्तर प्राणी जगत के साथ सहअस्तित्व, सामूहिकता, सामाजिकता, सांस्कृतिक रिश्तें कायम किये रहे हैं। कुल मिलकार भारत के ये आदिजन वक्त की रफ्तार से पैदा हुई हवाओं से बहुत कम प्रभावित हुए हैं।
वेद भारतीय और विश्व साहित्य के प्रथम ग्रन्थ हैं और असुर शब्द यहीं प्रथम बार आया।[2] भारतीय समाज में आर्यों-अनार्यों के संघर्ष का इतिहास अत्यंत पुराना रहा है, जो आर्य थे उन्हें देवताओं की श्रेणी में रखा गया। भारतीय इतिहासवेत्ताओं के अनुसार जब भारत में आर्य जातियां बाहर से आयीं तो उनका संपर्क यहां के मूल निवासी अनार्यो से हुआ जिन्हें हम आदिवासी नाम से जानते हैं, किंतु भारत के मूल निवासियों के वंशजों को तलाशना कठिन ही नहीं असंभव है क्योंकि किसी भी अध्ययन में यह सिद्ध नहीं हुआ है कि भारत के मूल निवासी कौन हैं। पृथ्वी के किसी भी भू-भाग पर जो इंसान आदि मनुष्य के रूप में पैदा हुये, उनके वंशज उसी भू-भाग में वर्तमान तक रहते आयें- यह संभव नहीं है, भारत के प्रत्येक भू-भाग में आदिवासी निवास करते आयें हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जनजातियों की संख्या देश की कुल आबादी की 8.6 प्रतिशत है जो कि 2009 की जनगणना से 0.4 प्रतिशत अधिक है, अनुसूचित जनजातियों की संपूर्ण जनसंख्या 10,42,81,034 (104.3 मिलियन) हो गई है।[3] अनुसूचित जनजातियों की सर्वाधिक जनसंख्या वाले चार राज्य इस प्रकार हैं- (1) मध्य प्रदेश, (2) महाराष्ट्र, (3) ओडिसा, (4) राजस्थान। वहीं आदिवासी आबादी के लिहाज से ये चार केन्द्र शासित प्रदेश भी महत्वपूर्ण हैं- दमन एवं द्वीव, अण्डमान एवं निकोबार द्वीप समूह, लक्ष्यद्वीप एवं गोवा है। भारत के कुछ ऐसे राज्य भी हैं जहां जनजातियों की जनसंख्या नगण्य है, जैसे पंजाब, चण्डीगढ़, हरियाणा, दिल्ली।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासी समाज अपनी विविध संस्कृतियों एवं कलाओं के साथ अपनी विशिष्ट पहचान एवं अलग अस्तित्व बनाये हुए है जिसे नकारा नहीं जा सकता है, किंतु विडंबनापूर्ण बात है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में आज के समय में भी आदिवासी समाज उपनिवेशवादी तथा परायेपन की शोषणकारी जिंदगी जीने को मजबूर है। जो न केवल उनकी संस्कृति, पहचान या धर्म के लिए खतरा है बल्कि आज तो उनका अस्तित्व ही संकटमय है। विकास और औद्योगिकरण के नाम पर भारत सरकार ने आदिवासियों को अनेकों बार जल, जंगल और जमीन से बेदखल किया है, क्षतिपूर्ति के नाम पर जो सरकार ने जो उचित समझा, वही दिया परंतु वंचित समुदाय के स्वायत्त स्वर को उठने नहीं दिया। आदिवासी अंचलों में हस्तक्षेप व प्राकृतिक सम्पदा का दोहन ब्रिटिश काल में ईस्ट इण्डिया कंपनी भारत आगमन के साथ ही शुरू हो गया था।
जनजातियों का मूल संघर्ष जीवनयापन के संसाधनों जैसे जल, जंगल, जमीन  और पहचान की बेदखली के विरोध में है- औद्योगिकरण एवं शहरीकरण के कारण झारखण्डी आबादी का विस्थापन एक बड़ी समस्या है, जिसका समाधान तुरन्त तो नहीं हो सकता क्योंकि इसमें केन्द्र सरकार का जबरदस्त हाथ है।[4] स्वतंत्रता के पहले भी इस बेदखली का शिकार ज्यादातर आदिवासी समुदाय ही हुआ इसलिए संघर्ष की चेतना भी उसी में दिखायी पड़ती है। स्वतंत्रता के पश्चात् भारत सरकार विभिन्न योजनाओं और परियोजनाओं के बहाने आदिवासी समाज के विकास का दंभ भरती आयी है किंतु वास्तविकता यह है कि वर्तमान समय में माओवादी या नक्सलवादी आन्दोलनों ने ही आदिवासी समाज के लिए जल, जंगल व जमीन की समस्याओं की ओर भारत सरकार का ध्यान आकर्षित किया है तथा समस्याओं के समाधान के लिए विकास की आवश्यकता को महसूस कराया है। सरकार व मीडिया आदिवासी विकास का डंका पीट रही है किंतु सच तो यह है कि विकास के नाम पर केवल विस्थापन ही अधिक हो रहा है। आज चाहे केंद्रीय योजनाकार हों या प्रांतीय सरकारें सभी के अंदर यह धारणा घर कर गयी है कि विस्थापना के बिना विकास कार्य संभव नहीं है इसलिए लोगों को उजाड़ने की साजिश को अमलीजामा पहनाया जा रहा है। औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने रेल की पटरी बिछाने के लिए बड़ी संख्या में आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल किया था। किंतु आज भी आदिवासी समाज भयानक यातना के माहौल में जी रहा है और इसका सबसे बड़ा कारण है- भारत सरकार जो राष्ट्रहित और विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों वाले आदिवासी इलाकों पर बोलियां लगाने लगी है। इसका परिणाम यह हुआ कि रातों-रात देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को उनके खरीदे गये भू-भाग के पट्टे बांट दिये जाते हैं और उस अधिग्रहण क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले समुदायों को भूमि अधिग्रहण का नोटिश भेज दिया जाता है। और इसके विरोध में वहां का आदि वाशिंदा कुछ कहे, इससे पहले ही उस पर बंदूकों-बारूदों से हमला कर उसे खदेड़ दिया जाता है। इसका परिणाम आज यह है कि पिछले पैंसठ सालों में झारखण्ड की लगभग सत्तर प्रतिशत आदिवासी-दलित-अल्पसंख्यक आबादी लापता हो गयी है। आदिवासी समाज की समस्याओं और शिकायतों को सुनने से पहले ही अंग्रेजों द्वारा उनपर हमला कर दिया जाता था ताकि आदिवासियों में आने वाली संभावित जनजागृति के कारण अंग्रेजों को अमूल्य खनन पदार्थ से वंचित न होना पड़े! ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ अनेकों बार आदिवासी समुदायों ने कुर्बानी दी और अंततः इसका परिणाम यह हुआ कि बीसवीं सदी तक आते-आते अंग्रेजों ने संवाद का रास्ता अख्तियार किया और आदिवासी हितों की रक्षा के लिए अनेकों कानून बनाये गये। अंग्रेजों ने अपने संवाद को और पुख्ता करने के लिए ईसाई मिशनरियों का सहारा लिया और धर्म रूपी जाल बिछाकर धर्म सेवा को हथियार बनाया। आज वही सब साम्राज्यवादी अत्याचार स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक सरकारें कर रही हैं। आदिवासियों को प्राकृतिक संसाधनों के मालिकाना हक से बेदखल किया जा रहा है जिसके विरूद्ध आज भी उनका संघर्ष जारी है। राष्ट्रीय खनिज विकास प्राधिकरण छत्त्तीसगढ़ ने नागरनार में इस्पात मिल की स्थापना के लिए आदिवासियों की भूमि छीन ली। इसी तरह औद्योगिक व शहरी विकास के नाम पर ओडिशा के रायगड़ा में खनन कार्यों के लिए भूमि अधिग्रहण का दिसम्बर 2000 में आदिवासियों द्वारा भारी विरोध किया गया क्यों कि इनकी जीविका मुख्यतः भू-संसाधनों पर आधारित है तथा इनमें 90 प्रतिशत से भी अधिक लोग कृषि व अन्य सहायक कार्यों पर निर्भर है जमीन ही आदिवासी समाज की एक मात्र पारिवारिक, भौतिक संपत्ति है। अत: इससे इनका भावनात्मक संबंध जुड़ा है। भारत के स्वतंत्र होते ही विकास के नाम पर औद्योगिक प्रगति, नगरीय विकास एवं सिंचाई के लिए बड़े-बड़े बांधों का बनना शुरू हुआ और खनन उत्खनन भी व्यापक मात्रा में हुआ, वन्य जीव संरक्षण के नाम पर राष्ट्रीय वन्य जीव अभयारण्यों की स्थापना हुयी। इन सबके फलस्वरूप लाखों लोगों को विस्थापित होना पड़ा और वह क्रिया आज भी जारी है।
जनजातियों को अपने विकास के लिए हमेंशा से ही संघर्षरत रहना पड़ा है किंतु भारत के आदिवासियों की भिन्न-भिन्न समस्याएं रही हैं। एक तरफ उत्तर भारत के भोटिया खानाबदोश हैं तो दूसरी और धनबाद (बिहार) के आदिवासी समुदाय औद्योगिक क्षेत्रों में काम करते हैं और इसी कारण इनकी समस्याएं भी भिन्न हैं। भारत के विभिन्न राज्यों के विकास की तरह यहां की जनजातियों का विकास भी विभिन्न स्तर पर हो रहा है। यहां के मैदानी क्षेत्र के मीणा आदिवासियों ने पिछले कुछ दिनों में कुछ तरक्की की है। किंतु राजस्थान के आदिवासी आज भी विकास की दौड़ में अभी बहुत पीछे हैं। आज आदिवासियों के सामने अनेक चुनौतियां मुंह उठाये खड़ी हैं। एक तरफ तो आधुनिक सभ्यता और औद्योगिक विकास के विविध आयाम हैं तो दूसरी ओर इनकी सांस्कृतिक धरोहरें, परंपराएं और रीति-रिवाज हैं। आदिवासी विकास में हिस्सेदारी जरूर चाहता है किंतु वह यह जानता है कि यदि उसने अपने संस्कृति को भुला दिया तो उसकी बुनियाद की चूलें हिल जायेंगी। सरकारी आदिवासी नीति आदिवासियों को कानूनी स्तर पर पूर्ण स्वतंत्रता देती है कि वे अपनी परंपरागत पहचान को बनाये रखें किंतु नीतिगर स्तर पर सरकारें इन संवैधानिक मूल्यों का सम्मान करती नजर नहीं आतीं। एक तरफ भारतीय सभ्य मानसिकता चाहती है कि आदिवासियों की देश के प्रजातंत्र, समाजवाद धर्मनिरपेक्षता में सक्रिय भागीदारी हो। उनकी यह अपेक्षा कहीं न कहीं सत्य भी प्रतीत हो रही है जिससे आदिवासी व गैर आदिवासी के बीच विषमताएं कम होती दिख रही हैं। किंतु इनके जीवन निर्वाह की दशाएं चुनौतिपूर्ण और संघर्षपूर्ण बनी हुई हैं। सुनियोजित विकास कार्यक्रमों के नाम पर, प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से हुए लाभ के नाम पर उन्हें कुछ धनराशी देकर भाग्य व भगवान के भरोसे छोड़ दिया जाता है। बीते वर्षों में आदिवासियों का संपूर्ण जीवन जंगल पर निर्भर था किंतु लकड़ी के आर्थिक स्रोत बन जाने के कारण वन की कटाई में तेजी आयी जिसके कारण आदिवासियों के दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति बाधित हुई हैं और उनकी आर्थिक स्थिति पर दुष्प्रभाव पड़ा है। देश भर में आदिवासी समुदायों के सामने अस्तित्व रक्षा का सवाल खड़ा हो गया है। इनके अधिकार में भूमि बहुत कम ही रह गयी है और थोड़ी बहुत जो जमीन इनके कब्जे में है, उस पर भी सरकारी भूमि ग्रहण की छाया पड़ी हुई है। आदिवासी समुदायों का जीवन हिंदू समाज की तरह पुश्तैनी धंधों पर निर्भर नही है। गैर कृषि जीवन में प्रवेश करने से इनके सामने अनेक समस्याएं पैदा हो गयी है। जंगल की उपज ही इनका पुश्तैनी धंधा था अब यह धंधा इनके हाथ से निकलता जा रहा है- कृषि प्रधान आदिवासियों का प्रतिशत शनैः-शनैः कम होता जा रहा है। आदिवासी अर्थव्यवस्था में भिन्नताओें के आने से कई आर्थिक चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयारी आवश्यक हो गई है।[5] आर्थिक असमानताओं ने इनके समुदाय को छिन्न-भिन्न करके रख दिया है लोकतंत्र के बदलते परिवेश में इन्हें सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिला है लेकिन कुल आदिवासी जनसंख्या का अधिकतर भाग प्रचंड गरीबी में ही पैदा होता है और जीवन पर्यंत खटता, संघर्ष करता हुआ मृत्यु को प्राप्त करता है। वर्तमान में आदिवासियों में गरीबी और बेरोजगारी सबसे बड़ी ज्वलंत समस्या है। इस समस्या से निपटने के लिए सभी जनसमूहों द्वारा समाधान खोजा जाना चाहिए। आदिवासियों की समस्याएं और संघर्ष पंचायती राज, शिक्षा तथा सहकारिता को लेकर भी है। यदि भारतीय संविधान द्वारा गठित ये संस्थाएं अपने-अपने क्षेत्रों में ईमानदारी से काम करें तो आदिवासी इस योग्य हो जायेंगे की वे अपने व्यक्तित्व और जीवन के विकास के बारे में स्वयं निर्णय ले सकेंगे। एस. एम. इजलाल ने अपने अध्ययन में ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक शक्ति एवं नेतृत्व की विवेचना की है। उनके अनुसार पंचायतें अपने आपको एक शक्ति केन्द्र के रूप में विकसित करने में असफल रही हैं। वे आज भी बड़े जमींदारों के इशारे पर कार्य करती हैं।[6]
प्रवाकर दास ने उभरते जनजातीय नेतृत्व का अध्ययन ओडिशा के एक जिले के संदर्भ में किया है। उनके अनुसार जनजातीय बहुल क्षेत्रों में वास्तविक नेतृत्व गैर जनजातीय उच्च जातियों के लोगों के हाथ में हैं। आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़ेपन की स्थिति के कारण जनजातीय नेतृत्व राजनीति में गैर जनजातीय नेतृत्व के साथ सहयोगी की भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जब हम अनुसूचित जनजाति मानवाधिकारों का अध्ययन करते हैं तो सर्वप्रथम हम संयुक्त राष्ट्र चार्टर 1945 की उद्देशिका में पाते हैं कि मूल मानव अधिकारों के प्रति मानव की गरिमा और महत्व के प्रति और पुरूषों और स्त्रियों तथा बड़े और छोटे राष्ट्रों के समान अधिकारों की बात की गयी।[7] इस बात से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि मानव की गरिमा में अनुसूचित जनजाति भी सम्मिलित है। मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा 1948 की उद्देशिका में भी सभी व्यक्तियों की गरिमा एवं समान अधिकारों की बात स्वीकार की गयी है। अनुच्छेद 27 के अंतर्गत सांस्कृतिक जीवन में भाग लेना प्रत्येक व्यक्ति का मानवाधिकार है। मानवाधिकार की सार्वभौमिक उद्घोषणा हांलाकि किसी भी राष्ट्र के लिए बाध्यकारी नहीं है लेकिन सभी राष्ट्रों से यह अपेक्षा करती है कि वह बिना किसी भेदभाव के मानवाधिकारों की अभिवृद्धि के लिए संरक्षण प्रदान करेगा। अत: इसका विधिक महत्व है। मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए एक ऐसे दस्तावेज की आवश्यकता महसूस की गयी जो राज्य पक्षकारों को उसमें उल्लिखित अधिकारों के प्रवर्तन के लिए बाध्य करे। इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए राजनीतिक अधिकारों से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा को अंगीकार किया गया। इस प्रसंविदा में प्राण का अधिकार, यातना और अमानवी व्यवहार से मुक्ति का अधिकार, दासता और बलात् श्रम से मुक्ति का अधिकार, स्वतंत्रता और दैहिक सुरक्षा का अधिकार, निरोधी के साथ मानवीय व्यवहार का अधिकार, संचरण और आवास के चयन का अधिकार, अन्यदेशियों का मनमाने निष्कासन के विरूद्ध अधिकार, ऋजु विचरण का अधिकार, विधि के समक्ष एक व्यक्ति के रूप में मान्यता का अधिकार, धर्म का अधिकार, शांतिपूर्ण सम्मेलन का अधिकार, राजनीतिक अधिकार (राज्य कार्य के संचालन में भाग लेने, मत देने और लोक पदों पर चयनित होने का अधिकार) आदि। इन अधिकारों से स्पष्ट है कि अनुसूचित जनजातियों को भी एक मानव होने के नाते उपरोक्त मानवाधिकार मिलने ही चाहिए किंतु आज भी आदिवासी समाज इन अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।
आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा एक महत्वपूर्ण प्रसंविदा है जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने 16 दिसम्बर 1966 को अंगीकार किया था। इस प्रसंविदा में उल्लेखित सभी अधिकार नस्ल, रंग, जाति, धर्म, भाषा, वंश, लिंग और राज्य जैसे किसी भी प्रकार के भेदभाव के बिना मानव मात्र को प्राप्त हैं। इसी प्रसंविदा के भाग तीन में कार्य का अधिकार, सामाजिक सुरक्षा का अधिकार, परिवार के संरक्षण और सहायता का अधिकार, पर्याप्त जीवन स्तर का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और सांस्कृतिक अधिकार प्रदान किये गये हैं। इन सब अधिकारों से अनुसूचित जनजाति को वंचित नहीं किया जा रहा है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों के संरक्षण का जो आन्दोलन चल रहा है, उसमें अधिकांश गतिविधियां जनजाति पद को संबोधित नहीं हैं, अपितु ‘देशज लोगों’ (INDIGENOUS PEOPLE) को लेकर है। और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चलायी जा रही इसप्रकार की गतिविधियों में भारत कोई सकारात्मक योगदान नहीं कर पाया है क्योंकि हम अभी यही तय नहीं कर पाये हैं कि इस देश में कौन ‘देशज लोग’ है और कौन नहीं। यद्यपि ‘देशज लोग’ और ‘जनजाति’ पदों में काफी समानताएं होती हैं, परन्तु उन्हें एक ही ऐतिहासिक श्रेणी नहीं माना जाना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की धारा 157 जो देशज लोगके अधिकारों को लेकर है, इसके अनुसार अनुसूचित जनजातियां अन्य जनसंख्या की अपेक्षा कम विकसित हैं। उनकी अपनी प्रथाएं और संस्कृतियां है परन्तु अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने 1989 में अपनी इस गलती को सुधार लिया कि ‘देशज लोग’ और जनजाति को सादृश्य (अनुरूप) माना जा सकता है। 1983 में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने देशज लोगों के निम्नलिखित मूल अधिकारों की मान्यता हेतु आह्वान किया-
1.वे अपने को स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्त कर सकें।
2.उनकी पदीय हैसियत हो और वे अपने प्रतिनिधि संगठन बना सकें।
3.वे जिस क्षेत्र में बसतें हैं, वहां अपने पारंपरिक आर्थिक ढ़ांचे तथा जीवन पद्धति को बनाये रख सकें। किंतु यह अधिकार उनके देश के आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक विकास में उनकी भागीदारी को न प्रभावित करे।
4.वे प्रशासन व शिक्षा के लिए, जहां संभव हो, अपनी भाषा के प्रयोग को बनाये रख सकें।
5.वे अपनी आस्था और धर्म की स्वतंत्रता का उपभोग कर सकें।
6.भूमि तथा प्राकृतिक संसाधनों तक उनकी पहुंच रहें विशेषकर भूमि और प्राकृतिक संसाधनों के उनके अधिकार, उनकी परंपरा और आकांक्षा से जुड़े हुये हैं।
7.वे अपनी शैक्षणिक व्यवस्था का निर्माण, संचालन और नियंत्रण कर सकें।
1985 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक स्वैच्छिक कोष की स्थापना की। उसका उद्देश्य देशज लोगों के प्रतिनिधियों को सहायता प्रदान करना था ताकि वे देशज लोगों के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यकारी दल से मिल सकें।
भारतीय संविधान में समता का अधिकार अनुच्छेद 14 से 18 तक में दिया गया है, जो कहता है कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति को समानता का अधिकार है। अनुच्छेद 14 में समता का सामान्य नियम दिया गया है जो व्यक्तियों के बीच अयुक्तियुक्त विभेद को वर्जित करता है। इससे यह बात अवश्य स्पष्ट होती है कि समता के अधिकार में अनुसूचित जनजातियों का भी अधिकार सम्मिलित है। उनके साथ कोई भी भेद-भाव नहीं किया जा सकता।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 46 में राज्य को निर्देश दिया गया है कि वह जनता के दुर्बलतर हिस्से विशेषतया अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित आदिम जातियों की शिक्षा तथा आर्थिक हितों की विशेष सावधानी से व्यवस्था करे तथा सब प्रकार के शोषण से उनका संरक्षण करे। मूल अधिकार के अनुच्छेद 15(4) के अंतर्गत भी राज्य किन्हीं सामाजिक तथा शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए वर्गों या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है। संसद अपने उन राज्यों को जिन्हें उसके अनुसार सहायता की आवश्यकता है, अनुच्छेद 275 के अधीन सहायता अनुदान के रूप में ऐसी राशि प्रदान करती है। यह राशि भिन्न-भिन्न राज्यों के लिए भिन्न-भिन्न स्तर पर नियत की जाती है। उन राज्यों को विशेषत: केन्द्रीय अनुदान दिया जाता है जो अनुसूचित जाति एवं आदिम जातियों के कल्याण या अनुसूचित क्षेत्रों में प्रशासन स्तर की उन्नति के प्रयोजन के लिए भारत सरकार के अनुमोदन से हाथ में ली गयी योजनाओं को कार्यान्वित कर रहे हों। अनुच्छेद 164 के अंतर्गत ओडिशा, बिहार और मध्य प्रदेश राज्यों में आदिम अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए एक विशेष मंत्री के उपबंध की बात की गयी है। किंतु आजादी के 65 वर्ष बीत जाने पर भी, एक विशेष मंत्री के होने के बावजूद भी आदिम जातियों के अधिकारों को सही मायनों में संरक्षण प्रदान नहीं किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 330, 332, 334 में लोकसभा तथा विधान सभाओं में अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी है। संविधान के 65वें संशोधन द्वारा 338 में संशोधन करके अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिये एक राष्ट्रीय आयोग के स्थापना का उपबंध किया गया है परन्तु यह आयोग आदिम जातियों के हक और अधिकार की रक्षा करने में असफल रही है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों पर होने वाले अत्याचारों के निवारणार्थ सत्र 1989 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम पारित किया गया।
2006 में भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जनजाति समूह के कल्याण के लिए अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पारंपरिक जंगल निवासी अधिनियम’ की पहल की गयी। इस अधिनियम का उद्देश्य यह है कि सदियों से रह रहे जंगल निवासी के ऊपर हो रहे अत्याचार को समाप्त किया जाये। और लगभग एक करोड़ आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन का लाभ पहुंचाया जाये। किंतु इस अधिनियम के लागू होने के बाद भी वन विभाग की मनमर्जी और सनक समाप्त नहीं हुई है और अनुसूचित जनजातियों पर अत्याचार होता रहा है। जिस जमीन पर वे सदियों से खेती करते आ रहे थे, जिस जंगल से वे सदियों से लकडि़यां व जड़ी-बूटी के उत्पादन को इकट्ठा करते आ रहे थें, उससे ही उन्हें वंचित किया जा रहा है।
निष्कर्ष एवं सुझाव:-
आदिवासियों की पहचान वर्तमान समय में आम भारतीयों से हटकर है। इसका सबसे बड़ा कारण उनका अपने परंपरागत संस्कृति से लगाव व जुड़ाव है किंतु शहरीकरण एवं औद्योगिकरण ने उनके जीवनयापन में काफी बदलाव ला दिया है। भारतीय संविधान ने अनुसूचित जाति का दर्जा देकर उन्हें एक विशेष नागरिक के रूप में समाज में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है। भारत के आदिवासियों को पिछड़ी और आदिम अवस्थाओं में रहने के कारण अपने विकास के लिए हमेंशा से युद्धरत रहना पड़ा है और यह संघर्ष आज भी लगातार जारी है।
1.पश्चिम बंगाल, ओडिशा, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में भूमि अधिग्रहण के लिए भारत सरकार द्वारा बनाये गये कानून का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
2.भारत में अधिककतर राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां आदिवासी बहुल क्षेत्रों में है क्योंकि वहां खनिज संपदा भरपूर मात्रा में पायी जाती है। भारत सरकार को इसके इस्तेमाल के बदले वहां के मूल निवासियों के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, रोजगार और स्वच्छ जल की व्यवस्था करनी चाहिए। इसके साथ ही साथ उन्हें अपनी संस्कृति को संरक्षित रखने व गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत करने के अवसर उपलब्ध कराये जायें।
3.आदिवासियों के पलायन एवं अलगाव के कारण उनका जो संपर्क नक्सलवादियों से हो रहा है, उसे रोकने के उपाय करना आवश्यक हैं।
4.बिरसा मुण्डा व सिदो-कान्हू के नेतृत्व में हुए 19वीं सदी के झारखण्ड विद्रोह के बाद अंग्रेजी सरकार द्वारा बनाए गए छोटानागपुर टेनेंसी ऐक्ट और संथाल परगना टेनेंसी ऐक्ट में बिना संशोधन किये ही कठोरता से इन्हें लागू करा जाना चाहिए।
5.आदिवासियों के प्रति पुलिस-प्रशासन में मानवीयता और परिपक्वता जागृत करनी चाहिए।
6.राजनीति में आदिवासी समाज की भागीदारी को पूर्ण रूप से सुनिश्चित किया जाये।
7.राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बने विभिन्न प्रावधानों के द्वारा आदिवासी समाज के हितों की रक्षा की जाये।

संदर्भ सूची:-
  1. हरिराम मीणा, आदिवासी कौन, इस्पातिका शोध पत्रिका, आदिवासी विशेषांक
  2. डॉ. रामदयाल मुण्डा, आदिवासी अस्तित्व और झारखण्डी अस्मिता के सवाल
  3. सम-सामयिक घटना चक्र, अतिरिक्तांक, 2013
  4. प्रकाश चन्द्र मेहता, आदिवासी विकास एवं प्रथाएं, डिस्कवरी पब्लिशिंग हाउस
  5. एस. एम. इजलाल, पॉलिटिक्स पावर एण्ड रूरल लीडरशीप इन इण्डिया, कामनवेल्थ पब्लिशर्स
  6. संयुक्त राष्ट्र चार्टर, बनारस लॉ एजेन्सी

संपर्क - अनीता देवी, शोधार्थी, हिंदी विभाग, बनारस, हिंदू विश्विद्यालय, वाराणसी,
ईमेल - anil.bhu0101@gmail.com



[1] हरिराम मीणा, आदिवासी कौन, इस्पातिका शोध पत्रिका, आदिवासी विशेषांक, पृष्ठ-61
[2] डॉ. रामदयाल मुण्डा,, आदिवासी अस्तित्व और झारखण्डी अस्मिता के सवाल, पृष्ठ-13
[3] सम-सामयिक घटना चक्र, अतिरिक्तांक, 2013, पृष्ठ-11
[4] डॉ. रामदयाल मुंडा, आदिवासी अस्तित्व और झारखण्डी अस्मिता के सवाल, पृष्ठ-102
[5] प्रकाश चन्द्र मेहता, आदिवासी विकास एवं प्रथाएं, डिस्कवरी पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृष्ठ- 63-64
[6] एस. एम. इजलाल, पॉलिटिक्स पावर एण्ड रूरल लीडरशीप इन इण्डिया, कामनवेल्थ पब्लिशर्स, नई दिल्ली, 1988
[7] संयुक्त राष्ट्र चार्टर, बनारस लॉ एजेन्सी, पृष्ठ-1

मूक आवाज़ हिंदी जर्नल

अंक-5                                                                                                                                               ISSN 2320 – 835X

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